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कौन थे 'बासवन्ना' जिनके बनाए लिंगायत ने कर्नाटक की राजनीति गरमा दी

बासव ने समझा कि जाति व्यवस्था व्यक्तियों को भ्रष्ट बना देती है. उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया. जानिए उनके बारे में कुछ और रोचक जानकारियां

FP Staff Updated On: May 15, 2018 01:19 PM IST

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कौन थे 'बासवन्ना'  जिनके बनाए लिंगायत ने कर्नाटक की राजनीति गरमा दी

बासवन्ना यानी कर्नाटक में लिंगायत धर्म के प्रणेता. एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाले बासव ने बचपन से ही अपने माता-पिता को अंधविश्वासों का पालन करते देखा. साथ ही उन्होंने महसूस किया कि धर्म के नाम पर पढ़े लिखे ब्राह्मण भी वही बुरे काम कर रहे हैं, जो दूसरी जातियों के बिना पढ़े-लिखे लोगों के लिए आम हैं. इन्हीं कुरीतियों को मिटाने के लिए बासव ने हिंदू धर्म से अच्छी बातें लेकर, बुराइयां वहीं छोड़कर एक नए संप्रदाय की स्थापना की, जिसे लिंगायत संप्रदाय के नाम से जाना गया. कर्नाटक चुनावों से ठीक पहले ही इस संप्रदाय को धर्म का दर्जा दिया गया है. ऐसे में यह जानना भी बहुत रोचक है कि कौन थे ये बासवन्ना जिन्होंने धार्मिक बुराइयां मिटाईं और खुद एक नए धर्म के संस्थापक बन गए.

ब्राह्मण जाति में जन्मे थे बासवन्ना

बासवन्ना का जन्म कर्नाटक के बागेवाड़ी जिले में हुआ था. उनके माता-पिता मदारास और मदलाम्बे थे. ये लोग कर्नाटक के कम्मे ब्राह्मण थे. कम्मे ब्राह्मणों को आराध्य ब्राह्मण भी कहा जाता है. भगवान शिव की भक्ति करने वाले ये ब्राह्मण शैव संप्रदाय के होते हैं. इनमें से कुछ वीरशैव होते हैं, यानी घर का हर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत शिवलिंग की पूजा करता है. लेकिन ये लोग अपने शरीर पर कहीं भी शिवलिंग को धारण नहीं करते हैं. यह शिवलिंग उनके पूजागृह में रखा होता है. इसी समुदाय में बासवन्ना का जन्म हुआ था.

जन्म के बाद ना रोए, ना हिले-डुले थे बासवन्ना

इतिहासकारों का मानना है कि बासवान्ना का जन्म सन 1131 में कार्तिक शुद्ध पूर्णिमा के दिन आधी रात को हुआ था. कहा जाता है कि जन्म के बाद यह नवजात शिशु एकदम स्थिर था. ना तो रोया, ना ही हिला-डुला. माता-पिता घबरा गए. उसी समय वहां से ईश्नाया गुरु नाम के संत गुजर रहे थे. वो मदारास के घर आए. परेशान माता-पिता को देखकर उन्होंने तुरंत जन्में उस बच्चे को गोद में उठाया और बहुत प्यार से उस बच्चे को देखने लगे. उन्होंने गुनगुने पानी से भीगे एक सूती कपड़े से बच्चे का चेहरा पोंछा, उसके माथे पर भस्म लगाया, और रुद्राक्ष और शिवलिंग की माला शिशु के गले में डाल दी. बच्चे के कानों में उन्होंने पंचाक्षरी मंत्र पढ़ा और बोले, 'आओ बासव, आ जाओ'. इतना सुनते ही वो बच्चा हिलने-डुलने लगा. लगा कि उस पुकार से किसी मृत में जान आ गई. उसी दिन से उस बच्चे का नाम बासव पड़ गया जिसे भक्त बासवन्ना बुलाते हैं.

8 साल की उम्र में जनेऊ तोड़ी और घर से भाग गए

जैसा कि बहुत से ब्राह्मणों के परिवारों में होता है, बासव के माता-पिता ने 8 साल की उम्र में उसका यज्ञोपवीत करवाने की सोची. इसके लिए बासव के बाल काटे गए और उसे पूजा और हवन के बीच उन्हें जनेऊ पहनाया गया. यह सब बासव की इच्छा के बिलकुल विरुद्ध था. संस्कार के दौरान ही बासव ने अपना जनेऊ तोड़कर फेंक दिया और घर से भाग गए. भागकर वो उन्हीं ईशान्या गुरु के गुरुकुल पहुंचे जिन्होंने उसे बासव नाम दिया था. वहां करीब 10 साल रहकर कर्म-कांड, धर्म, वेद, उपनिषद और ग्रंथों की शिक्षा ली. हिंदू धर्म के लोगों को अन्धविश्वास, बलि और बहुत सी बुराइयों में लिप्त देखकर बासव को बहुत दुख होता था.

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राजा के मंत्री से समाज-सुधारक बनने का सफ़र:

गुरुकुल से शिक्षा लेने के बाद बासव राजा के दरबार में काम करने लगे थे. उनका व्यक्तित्व हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करता था. धर्म के साथ उन्हें समाज का आइना देखने का मौका यहीं से मिला. उन्होंने पाया कि हिंदू धर्म में वर्ण-व्यवस्था बहुत फैली हुई थी. पूरा समाज 4 वर्गों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों में बंटा हुआ था. माना जाता था कि ब्राह्मण जन्म से लेकर कर्म के मामले में शूद्रों से उच्च हैं. बासव से समझा कि ये जाति व्यवस्था व्यक्तियों को भ्रष्ट बना देती है. उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया.

उस समय तक औरतों की स्थिरी बहुत खराब थी. औरतों के घर से बाहर निकलने में भी पाबंदी थी. उस समय बासव ने खुले-आम औरतों की बराबरी की बात की.

सभी धार्मिक आडंबरों और अंधविश्वासों का भी उन्होंने खुलकर विरोध किया. 'ईश्वर एक है' का नारा देकर उन्होंने हिंदू धर्म के 33 करोड़ देवी-देवताओं के कॉन्सेप्ट को ही हिला दिया.

बहुत से लोग उनका विरोध करने लगे लेकिन कई ऐसे थे, जिन्हें बासव की यह बातें सही और रोचक लगने लगीं. बासव कहते थे कि कर्म ही पूजा है. धीरे-धीरे उन्होंने लिंगायत संप्रदाय की स्थापना इसी प्रण के साथ की कि उसमें वो कोई भी बुराई नहीं होगी जो हिंदू धर्म में थी.

क्या है लिंगायत धर्म:

बासव ने अपने अनुयायियों से कहा कि अगर वो लोग उनका अनुसरण करना चाहते थे तो उन्हें यह 7 बातें माननी पड़ेंगी:

1. चोरी नहीं करना 2. हत्या हीं करना 3. झूठ नहीं बोलना 4. क्रोध से दूर रहना 5. एक-दूसरे के साथ सहयोग करना 6. दुख का सामना करना 7. अहंकार से डोर रहना

सालों से ब्राह्मणों के नीचे दबे हुए शूद्रों को बासवन्ना की बातों से उम्मीद मिली. हर रोज लाखों लोग बासवन्ना के घर आने लगे. उनके घर में हर मेहमान को मुफ्त में भोजन करवाया जाता था. उनकी ख्याति फैलती गई और बासवन्ना धीरे-धीरे भगवान बन गए.

लिंगायत परंपरा में दफ़नाते हैं शव

लिंगायत परंपरा में निधन के बाद शव को दफ़नाया जाता है. दो तरह से दफ़नाने की परंपरा है. एक बिठाकर और दूसरा लिटाकर. दोनों में से किस विधि से दफनाना है, इसका चयन परिवार करता है. लिंगायत परंपरा में मृत्यु के बाद शव को नहलाकर बिठा दिया जाता है. शव को कपड़े या लकड़ी के सहारे बांध जाता है. जब किसी बुज़ुर्ग लिंगायत का निधन होता है तो उसे सजा-धजाकर कुर्सी पर बिठाया जाता है और फिर कंधे पर उठाया जाता है. इसे विमान बांधना कहते हैं. कई जगह लिंगायतों के अलग कब्रिस्तान होते हैं.

मूर्ति पूजा का विरोध

बासवन्ना ने वेदों को ख़ारिज कर दिया. वे मूर्ति पूजा के भी खिलाफ थे. लिंगायत समुदाय भगवान शिव की पूजा नहीं करते, लेकिन अपने शरीर पर ईष्टलिंग धारण करते हैं. ये अंडे के आकार की गेंदनुमा आकृति होती है जिसे वे धागे से अपने शरीर पर बांधते हैं. लिंगायत इस ईष्टलिंग को आंतरिक चेतना का प्रतीक मानते हैं. लिंगायत समाज में अंतर्जातीय विवाह को मान्यता नहीं दी गई है.

वीरशैव और लिंगायत में विरोधाभास

मान्यता ये है कि वीरशैव और लिंगायत एक ही लोग होते हैं. लेकिन लिंगायत लोग ऐसा नहीं मानते. उनका मानना है कि वीरशैव लोगों का अस्तित्व समाज सुधारक बासवन्ना से भी पहले से था. वीरशैव भगवान शिव की पूजा करते हैं. इस विरोधाभास की कुछ वजहें भी हैं. बासवन्ना ने अपने प्रवचनों के सहारे जो समाजिक मूल्य दिए, कालांतर में वे बदल गए. हिंदू धर्म की जिस जाति-व्यवस्था का विरोध किया गया, वो लिंगायत समाज में ही आ गया.

(साभार न्यूज 18)

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