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केएम जोसेफ: उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन पलटकर रातों रात सुर्खियों में आए

2016 में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा था, कहीं कोई निरंकुशता नहीं है और राष्ट्रपति कभी राजा नहीं होता. राष्ट्रपति बहुत अच्छे इंसान हो सकते हैं लेकिन वे गलत भी हो सकते हैं

FP Staff Updated On: Apr 26, 2018 05:11 PM IST

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केएम जोसेफ: उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन पलटकर रातों रात सुर्खियों में आए

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की कॉलेजियम की सिफारिश मंजूर कर ली गई है. जबकि उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसेफ के मामले में फैसला अभी अटका हुआ है. जस्टिस जोसेफ के नाम को मंजूरी नहीं देने के सरकार के फैसले पर चारों ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है.

यहां जान लेना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम ने 10 जनवरी को जस्टिस जोसेफ और इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफारिश की थी. हालांकि सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम से कहा कि जस्टिस के एम जोसेफ को शीर्ष अदालत में पदोन्नत करने की अपनी सिफारिश पर फिर विचार करे. कॉलेजियम ने 10 जनवरी को जस्टिस जोसेफ और इंदु मल्होत्रा को शीर्ष अदालत का जज नियुक्त करने की सिफारिश की थी. जिसके बाद इंदु मल्होत्रा के नाम पर मंजूरी तो मिल गई लेकिन जस्टिस जोसफ का मामला फंस गया.

आइए जानते हैं कौन हैं जस्टिस जोसेफ जिनकी नियुक्ति को लेकर इतना विवाद खड़ा हो गया है.

केएम जोसेफ का पूरा नाम कुट्टिल मैथ्यू जोसेफ है जो उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस हैं. 31 जुलाई 2014 को उत्तराखंड का चीफ जस्टिस बनने से पहले वे केरला हाई कोर्ट में 9 साल जज रहे हैं. 59 साल के जोसेफ का जन्म 17 जून 1958 को अथिरमपुझा में हुआ था. इन्होंने अपनी कानूनी शिक्षा लोयला कॉलेज, चेन्नई में पूरी की.

केएम जोसेफ तब अचानक चर्चा में आए जब उन्होंने अप्रैल 2016 में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को पलट दिया और मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार फिर से बहाल की. तब रावत की सरकार लगभग एक महीने तक बर्खास्त रही थी.

27 मार्च 2016 को केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में धारा 356 लगाकर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था. हरीश रावत इसके खिलाफ उत्तराखंड हाई कोर्ट गए थे. अपने फैसले में जस्टिस के एम जोसेफ और वीके विष्ट ने कहा था कि 'यह मामला ऐसी स्थिति दर्शाता है जैसे 356 का उपयोग कानून से इतर किया गया हो.'

तब के अपने फैसले में उत्तराखंड कोर्ट ने यह भी कहा था कि गवर्नर केंद्र सरकार का एजेंट नहीं होता. कोर्ट ने कहा, भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब धारा 356 के तहत गवर्नर और स्पीकर के अधिकारों पर दोहरी मार पड़ी.

जस्टिस जोसेफ और विष्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा था, भारत में मोटी चमड़ी वाली सरकारों के कई उदाहरण हैं. राष्ट्रपति शासन के अलावा फ्लोर टेस्ट और बहुमत जानने का कोई बहुत अच्छा विकल्प नहीं है. जस्टिस जोसेफ ने यह भी कहा था कि अगर भ्रष्टाचार ही पैमाना हो तो शायद ही कोई सरकार भारत में अपना 5 साल कार्यकाल पूरा करे. कहीं कोई निरंकुशता नहीं है और राष्ट्रपति कभी राजा नहीं होता. राष्ट्रपति बहुत अच्छे इंसान हो सकते हैं लेकिन वे गलत भी हो सकते हैं, जज भी गलत हो सकते हैं.

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