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राम मंदिर विवाद: श्री श्री रविशंकर विवाद सुलझाने खुद गए हैं या भेजे गए हैं?

बीजेपी इस मुद्दे पर श्री श्री को लेकर दूरियां बना रही है ताकि सबका साथ सबका विकास के परमो धर्म: सिद्धांत पर ध्रुवीकरण की आंच न आ सके

Updated On: Nov 16, 2017 08:12 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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राम मंदिर विवाद: श्री श्री रविशंकर विवाद सुलझाने खुद गए हैं या भेजे गए हैं?

राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद पर 5 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने वाली है. लेकिन सुनवाई से पहले आर्ट ऑफ लिविंग के प्रमुख आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर एक कोशिश के जरिए इतिहास को बदलने की भी कोशिश कर रहे हैं.

वो राम मंदिर मुद्दे का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालना चाहते हैं. वो मध्यस्थ के रूप में हिंदू और मुस्लिम पक्षों से मुलाकात कर रहे हैं. उनका मानना है कि कोर्ट के फैसले से कोई भी एक पक्ष प्रभावित होगा और वो चाहते हैं कि संघर्ष के बिना इस विवाद का हल निकले.

हालांकि उनके पास कोई फॉर्मूला या प्रस्ताव नहीं है लेकिन वो मध्यस्थता के जरिए सबकी बात सुन रहे हैं और उनका कहना है कि उनकी कोशिश को राजनीति और कोर्ट से अलग रखा जाए.

श्री श्री की कोशिश काबिल-ए-तारीफ मानी जा सकती है. इसलिए भी कि फिलहाल यूपी में चुनाव का माहौल नहीं है और दूसरी बात ये भी कि राम मंदिर के मसले पर अबतक 8 कोशिशें पहले हो चुकी हैं जिनका कोई नतीजा नहीं निकला.उसके बावजूद श्री श्री ने राम मंदिर मुद्दे को लेकर एक नायाब कोशिश की. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर श्री श्री के एक्टिव होने की वजह क्या है?

जब पहले से ही ये मुद्दा कोर्ट में विचाराधीन है तो ऐसे में बातचीत की शुरुआत कर श्री श्री इस मुद्दे को फिर से क्यों गरमा रहे हैं? ये सवाल लखनऊ के सियासी गलियारों में भी गूंज रहा है तो अयोध्या में सरयू किनारे संतों के बीच भी उठ रहा है.

Mukhtar Abbas Naqvi

केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी

श्री श्री की इस पहल को लेकर केंद्र सरकार भी अपनी किसी भूमिका से इनकार कर रही है. केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि श्री श्री की मध्यस्थता से केंद्र का कोई सरोकार नहीं है और अगर बातचीत से कोई समाधान निकलता है तो अच्छी बात होगी.

उधर लखनऊ में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी श्री श्री से मुलाकात के बाद अब कह रहे हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है.

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श्री श्री का आत्मविश्वास कहता है कि एक बार सफल होने के लिए वो सौ बार फेल होने के लिए भी तैयार हैं.

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी कह रहे हैं कि श्री श्री को मध्यस्थता से नोबल पुरस्कार हासिल नहीं होने वाला तो समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान श्री श्री के प्रयासों को ढोंग बता रहे हैं. आजम खान आरोप लगा रहे हैं कि श्री श्री धर्म को चुनाव के लिए मुद्दा बना रहे हैं.

खास बात ये है कि बीजेपी और कई संत ही श्री श्री की मध्यस्थता पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं. यहां तक कि उन पर आरोप तक लगाया जा रहा है कि वो लोगों को लड़ाने की जमीन तैयार कर रहे हैं.

श्री श्री ने इस मामले में राम मंदिर मामले में पक्षकार नृत्य गोपालदास से भी मुलाकात की. इससे पहले वो दिगंबर अखाड़ा, विनय कटियार, राजाराम चंद्र आचार्य, हिंदू महासभा के स्वामी चक्रपाणि से मुलाकात कर चुके हैं.

आखिर इतने विरोध के बावजूद श्री श्री की इस पहल के पीछे क्या है? क्या श्री श्री को वाकई केंद्र और संघ का कोई समर्थन हासिल नहीं है? क्या वाकई इस वक्त राम मंदिर मुद्दे को लेकर श्री श्री की मध्यस्थता की एक जरूरत है या फिर भविष्य में कोर्ट के फैसलों के देखते हुए इसकी जरूरत महसूस की जा रही है?

भगवान राम, लक्ष्मण और मां सीता की वेशभूषा में कलाकारों का स्वागत करते सीएम योगी. (पीटीआई)

भगवान राम, लक्ष्मण और मां सीता की वेशभूषा में कलाकारों का स्वागत करते सीएम योगी. (पीटीआई फाइल फोटो)

अयोध्या फिलहाल शांत बनी हुई है. योगी की दिवाली के बाद से अयोध्या में भी हालात सामान्य दिख रहे हैं. कोर्ट में सुनवाई को लेकर सबकी नजर भी कोर्ट पर ही टिकी हुई है. ऐसे में अचानक श्री श्री का देश के सबसे गर्म मुद्दे के साथ अवतरित होना अपने आप में एक मुद्दा बन जाता है. खासतौर से तब जबकि मंदिर-मस्जिद के विवाद को सुलझाने की पुरानी कई कोशिशें बेकार गई हों.

शिया वक्फ बोर्ड ने विवाद को सुलझाने के लिए एक प्रस्ताव दिया जिसे सुन्नी वक्फ बोर्ड ने खारिज कर दिया. शिया वक्फ बोर्ड ने कहा कि मंदिर अयोध्या में बने जबकि अयोध्या और फैज़ाबाद के बाहर मस्जिद बने. जबकि शिया पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि वो मस्जिद के मुद्दे पर मस्जिद के साथ है भले ही उनके सुन्नियों के साथ बाबर, अकबर और हुमायूं को लेकर विवाद क्यों न हों. ऐसे में शिया वक्फ बोर्ड का फॉर्मूला दोनों ही पक्षों ने खारिज कर दिया. लेकिन सवाल ये है कि आखिर शिया वक्फ बोर्ड भी श्री श्री की ही तरह अचानक इतना सक्रिय क्यों हो गया?

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क्या एक बार फिर अयोध्या का मुद्दा देश में आने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक भूमिका निभाने के लिए तैयार किया जा रहा है? क्या यूपी में मंदिर मुद्दे का गुजरात की सियासत के साथ कोई भीतरी कनेक्शन है?

सुब्रमण्यन स्वामी ट्वीट कर राम मंदिर पर अपनी राय से हलकान मचा ही चुके हैं. उन्होंने कहा था कि राम मंदिर का हल नहीं निकला तो अयोध्या में साल 2018 में राम मंदिर बना दिया जाएगा.

हालांकि श्री श्री की पहल को राजनीतिक चश्मे से देखें तो इसके भले ही कई मायने दिखाई दें लेकिन उनकी पहल के पीछे सुप्रीम कोर्ट का वो बयान आधार का काम कर जाता है जिसमें कोर्ट ने दोनों पक्षों से बातचीत के जरिए ही मंदिर-मस्जिद विवाद सुलझाने की अपील की है.

अब जबकि 5 दिसंबर से सुनवाई शुरू हो रही है. कुल 13 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं. ऐसे में केंद्र की परोक्ष कोशिश ये हो सकती है कि श्री श्री के जरिए ही सही इस मामले का आपसी सहमति से कोई समाधान निकल जाए ताकि आंदोलन की सफलता का सेहरा भी हिंदूवादी संस्थाओं और संत समाजों के नाम रहे. जबकि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी मानते हैं कि बातचीत या मध्यस्थता से यह मसला हल नहीं हो सकता. वहीं विश्व हिंदू परिषद ने श्री श्री की समझौता वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

इसके बावजूद श्री श्री कह रहे हैं कि सभी की सहमति से अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण होगा. यानी एक तरफ आपसी सहमति बनाने की पहल की जा रही है तो दूसरी तरफ मंशा साफ भी दिखाई देती है कि मंदिर तो बनेगा ही और अगर उसमें सबकी सहमति बन जाए तो वो सोने पे सुहागा होगा.

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ऐसे में मंदिर-मस्जिद विवाद सुलझाने की ये प्रक्रिया अदालती सुनवाई से पहले 6 दिसंबर से पहले के इतिहास को जिंदा करने की कवायद ज्यादा लग रही है ताकि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इसके सियासी फायदे की जमीन तैयार की जा सके.

Ayodhya

दीगर बात ये है कि भगवा विचारधारा का तमगा लगने के बावजूद बीजेपी इस मुद्दे पर श्री श्री को लेकर दूरियां बना रही है ताकि सबका साथ सबका विकास के परमो धर्म: सिद्धांत पर ध्रुवीकरण की आंच न आ सके लेकिन राजनीतिक जानकार गुजरात के प्रचंड चुनाव को देखते हुए राम मंदिर पर श्री श्री की पहल को अलग रख के नहीं देख सकते.

गोधरा की साबरमति एक्सप्रेस में अयोध्या के कारसेवक भी सवार थे जिसे इतिहास बदल नहीं सकता. इसलिए अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद पर कोई भी पहल भले ही सौहार्दपूर्ण फॉर्मूले की बात करे उसका एक रास्ता गुजरात की सियासत के अग्निपथ से जरूर गुजरेगा.

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