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कट्टरपंथी कौन हैं- भारतीय मुसलमान या मुस्लिम संस्थाएं?

1983 में बहुचर्चित शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया था

Updated On: May 29, 2017 02:22 PM IST

Afsar Ahamad

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कट्टरपंथी कौन हैं- भारतीय मुसलमान या मुस्लिम संस्थाएं?

बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक पर हुई सुनवाई के दौरान बेहद हैरान करने वाली कुछ बातें देखने को मिलीं. बहस के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से ये कहा गया कि वो निकाहनामे में ही तीन तलाक न देने की शर्त डाल सकते हैं. बाद में बोर्ड की ओर से इस संबंध में एक हलफनामा भी दायर किया गया.

मजमून ये था कि वो तीन तलाक को हर स्तर पर रोकने की कोशिश करेंगे. इसमें लड़की चाहे तो शादी के वक्त निकाहनामे में तीन तलाक न देने की शर्त जोड़ सकती है. ये भी कहा गया तुरंत तीन तलाक शरिया के मुताबिक नहीं है.

ये सारी बातें बेहद हैरान कर देने वाली हैं. वह इसलिए कि अब तक हमने 1983 का शाह बानो गुजारा भत्ता केस देखा है, तीन तलाक का शायरा बानो केस देखा है. किसी भी मामले में बोर्ड या फिर कोई भी मुस्लिम बॉडी झुकती नजर नहीं आई.

ऐसा क्यों हुआ. ये सवाल बेहद महत्वपूर्ण है. आजादी के बाद से एक नहीं कई ऐसे मसले आए जहां मुस्लिम बॉडी उदार रवैया अपना सकती थीं लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मुस्लिम बॉडी के इस रवैये की मुस्लिम समाज ने भारी कीमत चुकाई है.

बीते 70 सालों में मुस्लिम समाज के उदारवादी आंदोलन तकरीबन गायब ही रहे हैं. समाज पर चंद कट्टरपंथी समूहों ने कब्जा कर लिया. और उन्हें इसके लिए राजनीतिक समर्थन भी मिलता रहा.

मुस्लिम समाज पर चंद कट्टरपंथी लोगों ने कब्जा जमा लिया है

मुस्लिम समाज पर चंद कट्टरपंथी लोगों ने कब्जा जमा लिया है

मुस्लिम समाज की सोच दकियानूसी है

मुस्लिम वोटों के लिए संविधान तक में बदलाव कर दिया गया लेकिन समाज में बदलाव टैबू ही रहा. आज जब ये आरोप लगते हैं कि मुस्लिम समाज की सोच दकियानूसी है तो इसकी बड़ी वजह बीते 70 सालों में इन मुस्लिम बॉडियों की मनमानी है. इसमें न सिर्फ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड दोषी है बल्कि देवबंद, बरेलवी और नदवा भी ऐसी किसी भी कोशिश को न होने देने के लिए जिम्मेदार हैं.

अगर ये संगठन और मदरसे मानते हैं कि उनका रवैया सही है तो उन्हें कोर्ट में घुटने नहीं टेकने चाहिए थे. और अगर उन्हें लगता है कि वो गलत हैं तो उन्हें पूरे भारतीय मुस्लिम समाज से शाह बानो, शायरा बानो पर अब तक की अपनी जिद और कट्टरपंथी सोच के लिए माफी मांगनी चाहिए.

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1983 में बहुचर्चित शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया था लेकिन तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम वोट जाने के भय से 1986 में संसद में कानून लाकर उस फैसले की अहमियत खत्म कर दी. इसे आम मुसलमानों की कम, मुस्लिम संगठनों की जीत के तौर पर ज्यादा देखा जाना चाहिए.

उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा ए हिंद दोनों इस मामले में शाह बानो के खिलाफ खड़े थे. तब से लेकर शायरा बानो तीन तलाक केस तक मुस्लिम संस्थाओं का रूढ़िवादी रवैया बरकरार है.

और इसे बरकरार रखने में कांग्रेस भी उतनी ही जिम्मेदार है जितने ये मुस्लिम संगठन. उस वक्त अगर कांग्रेस इन संगठनों के दबाव और मुस्लिम वोट जाने के डर से झुकती तो आज हालात कुछ और होते. पर ऐसा हुआ नहीं.

समाज पर रूढ़िवादी चोला चढ़ा रहे इसके लिए बोर्ड और तमाम मुस्लिम संगठनों ने समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों का सहयोग लेने में भी गुरेज नहीं किया. नतीजा सबके सामने है.

मुस्लिम समाज की पहचान कट्टरपंथी के रूप में होने लगी. ये माना जा सकता है कि मुस्लिम समाज पर अब हर दिन जो निशाना लगाया जाता है उसमें राजनीति ज्यादा है, कोई ईमानदार मकसद कम है लेकिन समाज का सबसे अधिक नुकसान इन्हीं संगठनों ने पहुंचाया है.

शाह बानो

शाह बानो

मुस्लिम समाज को पुरुष अधिकारों को लेकर लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी

बहरहाल दबाव में ही सही ये संगठन झुके हैं और जरूरी बदलाव के लिए तैयार हुए हैं. उम्मीद है कि इस्लाम का हवाला देकर ये मुसलमानों को अब कट्टरपंथ की काली कोठरी में डालने से बचेंगे.

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इसका एक दूसरा पहलू भी है वो ये कि मुस्लिम समाज आखिर कब कोई उदारवादी आंदोलन शुरू करेगा. कब इसके अंदर से ही कोई उठ खड़ा होगा और कहेगा- बहुत हुआ, अब हम अपनी मांओं, बहनों, बेटियों की भी सुनेंगे.

इस्लाम में नुक्ते की नुक का इस्तेमाल उन्हें नुकसान पहुंचाने में नहीं करेंगे. मुस्लिम समाज को पुरुष अधिकारों को लेकर कोई तो लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी. ये ठीक है तुरंत तलाक के मामले कम हैं लेकिन सती प्रथा की तरह ये मुस्लिम समाज पर काले दाग की तरह ही हैं. इसे जितना जल्दी साफ कर दिया उतना अच्छा है.

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