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सोनू निगम मामला: पलक झपकते फतवा क्या सोचने पर मजबूर नहीं करता?

बहुत से मुसलमान भी इन बेतुके फतवों को गंभीरता से नहीं लेते

Akshaya Mishra Updated On: Apr 22, 2017 01:38 PM IST

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सोनू निगम मामला: पलक झपकते फतवा क्या सोचने पर मजबूर नहीं करता?

क्या आपने पहले कभी सैयद शाह आतिफ अली अल कादरी नाम के किसी शख्स का नाम सुना था? अगर नहीं तो अब उसे जान लीजिए. यह पश्चिम बंगाल का वही शख्स है जिसने लाउडस्पीकर के जरिए अजान के खिलाफ बोलने पर गायक सोनू निगम के खिलाफ फतवा जारी किया.

इसने सोनू निगम का मुंडन करने वाले और फटे जूते का माला पहनाने वाले को दस लाख रुपए का इनाम देने का एलान किया.

फतवे के बाद सोनू निगम ने खुद ही अपना सिर मुड़ा लिया और इस मुस्लिम धर्मगुरु से दस लाख रुपए की मांग की.

अब कादरी बहाने बनाने में जुटा है ताकि उसे इनाम की रकम न चुकानी पड़े. खैर, सबको पता है कि यह फतवे नाम पर सिर्फ तमाशा था. वक्त-बे-वकत मुफ्ती बगैर सिर पैर के फतवे जारी करते रहते हैं.

कादरी के फतवे का भी कोई मतलब नहीं है. इस तरह के फतवे किसी विषय पर विचार भर होते हैं. वे किसी भी तरह से बाध्यकारी नहीं होते. बहुत से मुसलमान भी इन फतवों को गंभीरता से नहीं लेते.

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कितने ही बेतुके मुद्दों पर जारी किए फतवे

बावजूद इसके यह सवाल तो है ही कि कादरी जैसे लोग लोग पलक झपकते ही फतवा क्यों जारी कर देते हैं? 2005 टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के खिलाफ फतवा जारी किया गया था और उन्हें मैच के दौरान सलीके से कपड़े पहनने की हिदायत दी गई थी.

सानिया पर आरोप था कि वे अपने लिबास से नौजवानों का नैतिक पतन कर रही हैं. 2005 में ही उत्तर प्रदेश में एक ऐसा मामला सामने आया जहां ससुर ने अपनी बहू के साथ बलात्कार किया था.

इस्लामी अदालत ने ससुर को अपनी बहू से शादी करने का फतवा जारी किया. फतवे के मुताबिक बलात्कार के बाद महिला का पति स्वत: ही उसका बेटा बन गया.

कुछ साल पहले मंबई के एक मुस्लिम संगठन ने संगीतकार ए आर रहमान के खिलाफ फतवा जारी किया था. रहमान ने पैगंबर साहब पर बनी एक फिल्म में संगीत दिया था.

कश्मीर में क्षतिग्रस्त मस्जिदों का पुनर्निर्माण करने पर 2207 में इंडियन आर्मी के खिलाफ भी फतवा जारी किया गया था. इस तरह के बेतुकों फतवों की लिस्ट बहुत लंबी है.

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ये बात-बात पर फतवे जारी करने का मकसद क्या है?

इन फतवों में न तो कोई गंभीरता होती है और न ही इन्हें सम्मानजनक तरीके से लिया जाता है. ऐसे में यह पूछा जा सकता है कि आखिर फतवे जारी ही क्यों किये जाते हैं. फतवे न तो किसी अच्छे मकसद को पूरा करते हैं और न ही दुनिया के बारे में समझदारी वाली बातें करते हैं.

दरअसल, इनका मकसद सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के अलावा कुछ और हो ही नहीं सकता. कादरी को अब तक कोई नहीं जानता था. लेकिन वह अब सुर्खियों में है. सोनू निगम ने भले ही माखौल उड़ाया, लेकिन उसका काम तो हो गया.

इस तरह के फतवों से मुस्लिम समाज के बारे देश-दुनिया में क्या संदेश जाता है? इस बात पर मुस्लिम समुदाय को शिद्दत के साथ विचार करना चाहिए.

इन फतवों से मुसलमानों का मजाक तो उड़ता ही है, उनकी प्रगतिविरोधी छवि भी बनती है. ऐसा लगता है कि मुसलमान अब भी प्रगैतिहासिक काल में जी रहे हैं और वे आज की दुनिया की वास्तविकता से बिल्कुल कटे हुए हैं.

सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात होगी कि पढ़े-लिखे मुसलमान उस समय भी चुप रहें जब उत्तर प्रदेश में कोई मुफ्ती पोलियो अभियान को साजिश बताकर उसके खिलाफ फतवा जारी करे. कुछ साल पहले ऐसा हुआ भी था.

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बौद्धिक चुनौती के अभाव में मुस्लिम धर्मगुरुओं की मनमानी

ऐसे समय में जब कुछ मुसलमानों के आतंकवाद में शामिल होने की वजह से पूरे मुस्लिम समाज को संदेह की नजर से देखा जा रहा हो, इस तरह बेतुके फतवे उनकी मुश्किलें और बढ़ाएंगे. इनसे यही संदेश जाता है कि मुसलमान अन्य समुदायों के साथ संवाद करने और नए विचारों के स्वागत के लिए तैयार नहीं हैं.

शायद सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर कमजोर नेतृत्व इस समस्या के मूल में है. किसी बौद्धिक चुनौती के अभाव में मुस्लिम धर्मगुरु मनमाने तरीके से काम करने के लिए स्वतंत्र हैं. तीन तलाक जैसे मुद्दों को मुसलमानों के एक मुखर तबके का समर्थन मुस्लिम समाज के चिंताजनक हालात को खुद-ब-खुद बयां करता है.

फतवों को मुस्लिम समाज को शर्मसार करने वाला माना जाना चाहिए और उन्हें जारी करने वालों को फटकार लगाई जानी चाहिए. लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस सवाल का जवाब मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों को जरूर देना चाहिए. तब तक कादरी जैसे धर्मगुरु 15 मिनट की शोहरत का आनंद उठा सकते हैं.

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