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जब महात्मा गांधी ने केरल में बाढ़ राहत के लिए जुटाए थे 6,000 रुपए

महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ के अपने प्रकाशनों में छपे कई लेखों के जरिए लोगों से अनुरोध किया था कि वे स्वेच्छा से बाढ़ प्रभावित मालाबार (आज के केरल) को राहत के तौर पर अपना योगदान करें

Updated On: Aug 26, 2018 05:33 PM IST

Bhasha

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जब महात्मा गांधी ने केरल में बाढ़ राहत के लिए जुटाए थे 6,000 रुपए

सदी की सबसे भीषण बाढ़ आपदा झेल रहे केरल में आज से करीब सौ बरस पहले बाढ़ से ऐसी ही तबाही मची थी. तब महात्मा गांधी ने लोगों की उस तकलीफ को 'अकल्पनीय' बताया था. मौजूदा रिकॉर्ड यह बताते हैं कि तब महात्मा गांधी ने खुद आगे बढ़कर बाढ़ राहत के लिए 6,000 रुपए एकत्र किए थे.

केरल में मौजूदा बारिश जनित घटनाओं में 290 से अधिक लोगों की जानें गई हैं और 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. वहीं जुलाई 1924 में आई भीषण बाढ़ से भी राज्य में भारी तबाही हुई थी. इसमें बड़ी तादाद में लोगों की जानें गई थीं और चौतरफा तबाही भी हुई थी.

महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ के अपने प्रकाशनों में छपे कई लेखों के जरिए लोगों से अनुरोध किया था कि वे स्वेच्छा से बाढ़ प्रभावित मालाबार (आज के केरल) को राहत के तौर पर अपना योगदान करें.

स्वतंत्रता सेनानी अय्यप्पन मस्तिष्क में अब भी 'महाप्रलय' की यादें ताजा हैं

उनकी इस अपील पर बच्चे-महिलाएं सहित हर तबके के लोगों ने सोने के जेवरात और अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई तक बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद की खातिर दान कर दिया था.

उन पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेखों के अनुसार गांधी द्वारा जुटाए जा रहे राहत कोष में योगदान के लिए कई लोगों ने तो अपना एक वक्त का खाना तक छोड़ दिया था. वहीं कुछ लोगों ने धन जुटाने के लिए दूध तक छोड़ दिया.

राष्ट्रपिता ‘नवजीवन’ में अपने एक लेख में एक लड़की का जिक्र करते हैं, जिसने राहत कोष में योगदान के लिए तीन पैसे चुराए थे. 'मालाबार में राहत कार्य' शीर्षक से एक लेख में महात्मा लिखते हैं, ‘मालाबार की पीड़ा अकल्पनीय है.’

रिकॉर्ड के अनुसार उस वक्त केरल प्रशासनिक रूप से तीन प्रमुख रियासतों (त्रावणकोर, कोचिन और मालाबार) में विभक्त था. स्वतंत्रता सेनानी अय्यप्पन पिल्लई के मन मस्तिष्क में अब भी 'महाप्रलय' की यादें ताजा हैं.

उफनते जलाशय, धान के जलमग्न खेत, चारों ओर यही नजारे थे

मलयालम कैलेंडर के अनुसार वर्ष 1099 में आई उस भीषण बाढ़ त्रासदी को याद करते हुए 104 वर्षीय अय्यप्पन पिल्लई ने पीटीआई-भाषा को बताया, ‘तब मैं स्कूल में पढ़ता था जब भारी बारिश और भीषण बाढ़ से कई जगह भारी तबाही मची थी. लगातार बारिश से जनजीवन तहस-नहस हो गया था.’

उन्होंने बताया, 'सड़कें जैसे नदियों में तब्दील हो गई थीं. उफनते जलाशय, धान के जलमग्न खेत, चारों ओर यही नजारे थे और कई जगहों में लोगों ने ऊंचाई वाले स्थानों पर शरण लिया हुआ था.'

गांधी को जब प्रदेश के कांग्रेस नेताओं से इस विभीषिका के बारे में पता चला तब उन्होंने 30 जुलाई, 1924 को तार भेजकर उन्हें सरकार के राहत कार्यों में सहायता देने को कहा और अपने स्तर पर भी प्रभावित लोगों की मदद करने को कहा.

एक अन्य तार में महात्मा ने कहा कि वह राहत कार्य के लिए धन और कपड़े जुटा रहे हैं. उन्होंने लिखा, मेरी संवेदनाएं उन लोगों के साथ हैं जिनके पास ना भोजन है, ना कपड़े और ना ही रहने का आसरा.

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