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सेना राजनीति का औजार हो जाए तो सेनाप्रमुख भी नेताओं की भाषा बोलने लगते हैं

कश्मीर में अशांति कोई ऐसी अनूठी बात नहीं जो वह अचानक एक चुनौती के रूप में जनरल रावत के सामने उठ खड़ी हुई है

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: May 30, 2017 12:26 PM IST

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सेना राजनीति का औजार हो जाए तो सेनाप्रमुख भी नेताओं की भाषा बोलने लगते हैं

सेनाध्यक्ष बिपिन चंद्र रावत ने बिना सोचे-विचारे सार्वजनिक रूप से अपने ख्याल का इजहार करके एक ऐसी नजीर कायम की है, जिसके नतीजे भारत के लिए बहुत खतरनाक हो सकते हैं.

रविवार को एक न्यूज एजेंसी के साथ साक्षात्कार में सेनाध्यक्ष ने कुछ ऐसी बातें कहीं जिससे पता चलता है कि सेना के भीतर एक नयी सोच पैदा हो गई है. जनरल रावत ने कहा, 'लोग हमारे ऊपर पत्थर फेंक रहे हैं, लोग हमारे ऊपर पेट्रोल बम फेंक रहे हैं. अगर मेरे जवान मुझसे पूछते हैं कि बताइए क्या करें तो क्या मुझे यह कहना चाहिए कि आप इंतजार कीजिए और अपनी जान दीजिए.'

वे आगे कहते हैं, 'मैं एक सुंदर ताबूत और तिरंगा झंडा लेकर आऊंगा और मैं आपके शव को पूरी इज्जत के साथ आपके घर भिजवाऊंगा. क्या सेनाध्यक्ष के रूप में मुझे अपने जवानों से यही कहने की उम्मीद रखी जाती है? मोर्चे पर तैनात अपने जवानों का मनोबल मुझे बनाये रखना है.'

सेनाध्यक्ष ने यह भी कहा कि, 'अच्छा होता जो ये लोग ये लोग हम पर पत्थर फेंकने के बजाय हथियारों से हमला करते तब मुझे ज्यादा खुशी होती. तब मैं वो कर सकता था जो मैं करना चाहता हूं.'

कश्मीर में अशांति कोई ऐसी अनूठी बात नहीं जो वह अचानक एक चुनौती के रूप में जनरल रावत के सामने उठ खड़ी हुई है. बहुत से सेनाध्यक्षों को घाटी में इससे भी ज्यादा कठिन चुनौती और दुश्मनी भरे रवैये का सामना करना पड़ा है.

उन सभी सेनाध्यक्षों ने इस चुनौती का सामना संयम से किया और एहतियात बरतने की बात कही उनके मुंह से कोई धमकी या बदला लेने जैसी बात नहीं निकली.

Stone Pelters in Kashmir

कश्मीर में पत्थर फेंकते लोगों का समूह

सेना और संयम

कश्मीर के संघर्ष के इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है जब किसी सेनाध्यक्ष ने अपनी मर्जी का इजहार करते हुए कहा है कि 'मैं वह करता जो मैं करना चाहता हूं.' जिसका एक मतलब यह निकलता है कि ये लोग पत्थर और पट्रोल बम की जगह हथियार उठायें तो 'इन्हें एक सबक सिखाया जाय.'

भारतीय सेना ने बरसों से संयम का बरताव किया है और उसे कामयाबी हासिल हुई है लेकिन जनरल रावत शायद पहले सेनाध्यक्ष हैं जिनके मुंह से निकला है कि यह नीति अब कारगर नहीं है. मुझे अपने जवानों को नयी तरकीब अपनाने की बात कहनी होगी ताकि उनका जीवन बचा रहे..उनके शवों को तिरंगे में लपेटकर घर ना भेजना पड़े.

ईमानदारी की बात यह है कि कश्मीर में अगर आज अपने ही लोग सेना के खिलाफ खड़े हैं तो इसमें सेनाध्यक्ष का कोई दोष नहीं. अगर अंदरूनी अशांति से निबटने के लिए सेना बुलानी पड़े तो यह मुख्य रूप से सरकार की नाकामी है कि वह संकट का राजनीतिक समाधान ना खोज सकी. लेकिन सेनाध्यक्ष को किसी दबंग की तरह बोलने और अपने ही लोगों को धमकाने की क्या जरूरत है?

वे चुप्पी साधे, गरिमा बनाये रखते हुए पूरी वीरता के साथ अपना काम क्यों नहीं कर सकते? ऐसा पहले के सेनाध्यक्षों ने किया है. विस्फोटक बातें कह पहले से तल्ख चले आ रहे रिश्ते को और ज्यादा तल्ख बनाने की क्या जरूरत है?

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दिक्कत यह है कि सेनाध्यक्ष ने अपनी जबान खोलने का फैसला किया अपनी बातों का सार्वजनिक इजहार किया और ऐसा करने से आखिरकार उन्हीं के कद और साख को चोट पहुंची. मिसाल के लिए...गौर कीजिए कि पिछले हफ्ते सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गये हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर सब्जार अहमद की शवयात्रा में किस भारी तादाद में लोग शामिल हुए.

अलग-अलग खबरों के मुताबिक सुरक्षा बलों ने कड़ी चेतावनी जारी की थी और सख्त पाबंदियां लगायी गई थी. इसके बावजूद त्राल इलाके के सब्जार भट्ट के गांव में जनाजे की नमाज के लिए रविवार के रोज हजारों की संख्या में लोग जुटे.

राइजिंग कश्मीर ने लिखा है कि जनाजे की नमाज में शामिल लोग शवयात्रा के दौरान बड़े जोर-जोर से आजादी के पक्ष में और भारत-विरोधी के साथ-साथ पाकिस्तान-समर्थक इस्लाम-पसंद नारे लगा रहे थे.

सब्जार अहमद की शवयात्रा में शामिल लोगों ने कहा कि सुरक्षा बलों ने त्राल आने और वहां से निकलने के तमाम रास्ते बंद कर दिए तो भी वे लोग कई किलोमीटर लंबे पहाड़ी रास्ते का चक्कर काटकर खेतों और बगीचों के बीच से होते हुए अपने 'शहीद नायक' के जनाजे की नमाज में शरीक होने के लिए पहुंचे.

अगर मुकामी लोग सेनाध्यक्ष के कठोर शब्दों पर जरा भी कान नहीं दे रहे और पाबंदियों को परे कर अतिवादियों के समर्थन में खड़े हैं तो इससे सेना को क्या फायदा हो रहा है?

सेना से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वो तनावपूर्ण स्थितियों में संयम से काम ले

सेना से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वो तनावपूर्ण स्थितियों में संयम से काम लें

सियासी इबारत

जनरल रावत की बात के साथ दिक्कत यह है कि वह बीजेपी की बनायी सियासी इबारत के माफिक पड़ती है. बीजेपी ने अपनी राजनीति के लिए नई कहानी यह रची है कि राजनीतिक समस्या का समाधान सेना के बूते भी किया जा सकता है.

कश्मीर-विरोधी और पाकिस्तान-विरोधी माहौल बनाये रखने और बात-बात पर राष्ट्रवाद नाम की माला जपने वालों के संतोष के लिए सेना का इस्तेमाल किया जा रहा है.

सरकार ने इस प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए सीमा-पार से होने वाली झड़प की काट में सर्जिकल स्ट्राईक जैसी कठोर नीति अपनायी और सर्जिकल स्ट्राईक का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए किया. यह प्रक्रिया आगे बढ़कर यहां तक पहुंच गई है कि राजनीतिक फायदे के लिए सेना के मुंह से कुछ भी कहलवा दिया जा रहा है.

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सरकार जिस किस्म के प्रचार-युद्ध में जुटी रहती है सेना ने हमेशा उससे अपने को अलग रखा है लेकिन अब नजारा एकदम ही बदल गया है. अब तो यह देखने को मिल रहा है कि एक मेजर को भी मीडिया के सामने आकर अपनी बहादुरी का बखान करने की मंजूरी दी जा रही है.

किसी आदमी को बांधकर उसे ढाल की तरह इस्तेमाल करना कब से बहादुरी का काम हो गया? यह तो अपनी जान बचाने के लाले पड़े हों तो उस घड़ी अपने को किसी तरह बचा लेने की जुगत भर हो सकती है या फिर इसे मार-पीट वाली जगह से सुरक्षित बच निकलने की एक चतुराई भरी सूझ कह सकते हैं. लेकिन इससे भारतीय सेना के बारे में हमें क्या पता चलता है?

क्या सेना यह कहना चाहती है कि किसी आदमी को बंधक बना उसे अपनी जीप से बांधना और एक ढाल की तरह इस्तेमाल करना साहस का काम है?

पत्थरबाजों से बचने के लिए सेना ने एक नागरिक को जीप की बोनट से बांध दिया था

पत्थरबाजों से बचने के लिए सेना ने एक नागरिक को जीप की बोनट से बांध दिया था

मेजर लीतुल गोगोई ने दरअसल एक निहत्थे आदमी का अपनी हिफाजत में इस्तेमाल करके मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है. मेजर गोगोई ने मानवता ही नहीं खुद सेना के लिए भी आचार-व्यवहार के जो नियम बनाये गये हैं जो प्रचलित विधान रहे हैं उनके खिलाफ आचरण किया है.

इसे वीरता का काम बताने से यही संकेत मिलता है कि हमने मान-मर्यादा और सही-गलत के सारे ख्याल से किनारा कर लिया है. हमारे भीतर अब यह भी कूवत न रही कि जान बचाने के लिए लगायी जाने वाली दौड़ और आग उगलती गोलियों के बीच डटे रहने के साहस के बीच फर्क कर सकें.

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'तुम मुझपर ईट फेंकोगे तो हम तुम पर पत्थर बरसायेंगे' की सबक सिखाने की टेक पकड़कर और मेजर गोगोई को अच्छा बताकर सेना ने कश्मीर में अपने बरताव के नये नियम बनाये हैं. जो कुछ इस तरह से हैं:

1. कुछ हिन्दुस्तानियों और हिन्दुस्तान की सेना के बीच खुली जंग जारी है.

2. इस जंग में अब कुछ भी कर गुजरना जायज है.

3. सेना जैसे को तैसा की नीयत से हाथ आजमाने को उतावली हो रही है.

4. छल-छद्म का नाम हमारे वक्त में वीरता है.

5. और अफसोस कि यह सारा कुछ राजनीति की बहती हवा को भांपकर हो रहा है.

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