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क्या बदलते वैल्यू सिस्टम ने हमारे समाज को बेतरह तोड़ दिया है?

भारत में भी पिछले कुछ दिनों से ‘फीयर’ नाम की कोई चीज नहीं दिख रही है. अपराधी अपराध करने में डर महसूस नहीं करता.

Updated On: Oct 11, 2018 09:02 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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क्या बदलते वैल्यू सिस्टम ने हमारे समाज को बेतरह तोड़ दिया है?

­हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर एक किताब आई थी. अमेरिका के जाने माने खोजी पत्रकार बॉब वुडवर्ड ने यह किताब लिखी है. किताब का नाम है ‘फीयर: ट्रंप इन द व्हाइट हाउस’ इस किताब में ‘डर’ शब्द का ठीक से वर्णन किया गया है. इस किताब की मजमून यह है कि कैसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के सहयोगी उनके आदेशों से हमेशा डरे रहते हैं. इस किताब के मुताबिक व्हाइट हाउस से जुड़े अधिकारियों के चेहरों पर हमेशा ट्रंप के ऊलजलूल आदेशों के कारण घबराहट पढ़ी जा सकती है. यहां पर बता दें कि वुडवर्ड एक बेहद ही प्रतिष्ठित पत्रकार हैं. उन्होंने 1970 के दशक में वॉटरगेट स्कैम में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की भूमिका सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.

यहां पर इस किताब का जिक्र इसलिए कर रहा हूं ताकि यह पता चले कि डर दो तरह से आता है. एक, आपके हाथ में पावर आ जाए और आप उसका उपयोग डर पैदा करने के लिए करें. दूसरा, अगर आपके हाथ में पावर नहीं है तो आप अपनों पर या समाज में डर पैदा करें. इस दौर में अगर घर की बात करें तो बेटे को मां-बाप से डर नहीं है और अपराधी को अपराध करने से डर नहीं है.

Donald Trump

भारत में भी पिछले कुछ दिनों से ‘फीयर’ नाम की कोई चीज नहीं दिख रही है. अपराधी अपराध करने में डर महसूस नहीं करता. बिजनेसमैन लोगों के साथ धोखा करने में नहीं डरते. यहां तक की घर में बेटे अपने मां-बाप से नहीं डरते, बहन अपने भाई से नहीं डरती. सड़क पर चलने वाला शख्स कानून का पालन करने से नहीं डरता.

आज-कल बड़े शहरों में नहीं देश के छोटे-छोटे शहरों में भी बेटा, बाप को मारने की सुपारी दे रहा है. नाबालिग बहन गलत काम करने के लिए अपने मां-बाप और भाइयों को रास्ते से सदा-सदा के लिए हटा रही है तो बेटा भी गलत काम करने के लिए अपने रास्ते से मां-बाप और सगे सबंधियों का मर्डर कर रहा है या करवा रहा है. कुलमिलाकर समाज का यह घिनौना चेहरा बीते कुछ दिनों से देश के अलग-अलग हिस्सों में नजर आ रहा है.

देश इन घटनाओं से अब सहम गया है. हालात ऐसे हो गए हैं कि सुबह-सुबह जब लोगों के हाथों में अखबार आते हैं तो उसमें हत्या, आत्महत्या और स्कैम की खबरों की भरमार होती है. पिछले 10-15 दिनों की ही बात करें तो देश की राजधानी दिल्ली में ही कम से कम 100 से ज्यादा ऐसी वारदात हुई हैं, जो किसी सभ्य समाज को हिला कर रख देती हैं. लोगों में कानून का कोई डर नहीं रह गया है.

क्या वाकई में अब लोगों के बीच में डर नाम की कोई चीज नहीं रह गई या फिर यहां की व्यवस्था ही ऐसी है, जिसमें लोग अपराध कर आसानी से छूट जाते हैं. हाल ही में दिल्ली और आस-पास के कुछ इलाकों में हुए अपराधों पर नजर डालिए. पढ़िए और समझिए की क्या वाकई में इंसान जिस सभ्य समाज में रहने का दावा करता है, वह समाज में रहने लायक है?

दिल्ली के वसंत कुंज स्थित किशनगढ़ से बीते बुधवार को ही सुबह-सुबह एक परिवार के तीन लोगों की हत्या का मामला सामने आया था. अब परिवार की हत्या के पीछे का एक भयानक सच सामने आया है. घर के चिराग ने ही नफरत में अंधे होकर अपने माता-पिता और बहन की हत्या कर दी और उनकी हत्या को छुपाने के लिए झूठी कहानी भी गढ़ दी.

बीते 30 सितंबर की रात को ही दिल्ली के तैमूर नगर में अपने बच्चे के साथ खेल रहे रूपेश नाम के एक शख्स की इसलिए गोली मार कर हत्या कर दी गई क्योंकि उसने एक शख्स को गाली न देने के लिए समझाया था. सबसे बड़ी बात यह है कि रूपेश की हत्या उसके 13 साल के बेटे के सामने हुई.

2 अक्टूबर को दिल्ली के नजफगढ़ इलाके के रणजी एनक्लेव में 23 साल के एक शख्स ने अपनी पत्नी की इसलिए हत्या कर दी कि क्योंकि उसकी पत्नी दिल्ली छोड़ने के लिए राजी नहीं थी.

7 अक्टूबर की रात को दिल्ली के सबसे सुरक्षित इलाकों में से एक कस्तूरबा गांधी मार्ग पर महज 20 रुपए के लिए एक ऑटो ड्राइवर की चाकू घोंपकर हत्या कर दी जाती है. आंधे घंटे तक कस्तूरबा गांधी मार्ग पर ड्राइवर तड़पता रहता है और कोई भी शख्स मदद के लिए सामने नहीं आता है.

और तो और दिल्ली से सटे गाजियाबाद के सिद्धार्थ विहार में एक शख्स ने कुत्ते को कुत्ता कह दिया इस पर दो पक्षों में जमकर मारपीट शुरू हो जाती है. किसी बच्चे को कुत्ते ने काट लिया. कुत्ते की काटने की शिकायत जब कुत्ते के मालिक से की जाती है तो वह इसलिए भड़क जाता है कि उसके कुत्ते को कुत्ता कहकर पुकारा गया. कुत्ते के मालिक का कहना था कि मेरे कुत्ते को कुत्ता कह कर कैसे बुला रहे हैं? उसका नाम तो ‘मोगली’ है.

1 अक्टूबर को दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में अंकित सक्सेना नाम के एक ट्यूटर की हत्या के आरोप में 21 साल के आकाश को गिरफ्तार किया जाता है. दिल्ली पुलिस के खुलासे में पता चलता है कि आकाश की गर्लफ्रेंड से अंकित बात किया करता था. आरोपी शख्स अपनी गर्लफ्रेंड को अंकित से बात करते नहीं देख सकता था, इसलिए मार दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय के अंबेडकर कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. नवीन कुमार फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, 'लोगों को छोटी-छोटी बातों पर ईगो प्रॉब्लम हो रही है. मानवीय मूल्यों की कमी इसका बहुत बड़ा कारण है. मेरी समझ से शिक्षा के गिरते स्तर को हमलोग सुधार नहीं रहे हैं. शिक्षक उच्च नैतिक मूल्यों के संरक्षक होते हैं. भारतीय परंपरा के शिक्षकों ने इसे बारम्बार प्रमाणित किया है. शिक्षक ही हमें सिखाते हैं कि आप घर, परिवार, समाज और संस्थाओं में रहते हुए कर्तव्यों का पालन कैसे करना चाहिए. शिक्षक बच्चों में कौशल, सरलता, विनम्रता के साथ-साथ मानवीय गुणों को भी परिभाषित करते थे, जो अब नहीं रह गया है. अब तो बच्चों को पैसे कमाने के बारे में बताते हैं. ह्यूमन डेवलेपमेंट पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. आज के समाज में विनम्रता नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. संयुक्त परिवार का जगह अब एकल परिवार ने ले लिया है. वैल्यू सिस्टम पूरी तरह से कोलैप्स कर गया है. लोगों के लिए मोबाइल ही लाइफ बन गया है. फेस टू फेस कॉन्टैक्ट नहीं हो रहा है. खासतौर पर आज की शिक्षा संस्कार केंद्रित नहीं रह गई महज रोजगार हासिल करने का एक जरिया बन कर रह गया है.

दिल्ली का एम्स अस्पताल

दिल्ली का एम्स अस्पताल

वहीं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मनोचिकित्सक प्रोफेसर नंद कुमार फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, देखिए, मेरा मानना है कि हमलोग बहुत सा काम डर से नही करते. हमलोग कुछ काम कंडिशनिंग करना शुरू कर देते हैं. जब हमलोग किसी को मदद करते हैं तो क्या डर के मारे करते हैं? कुछ आदतें हमारी रोजमर्रा के रुटिन का पार्ट बन जाता है. देखिए बच्चों की जो लर्निंग होती है वह समाज से ही होती है. हम देख-देख कर ही बहुत कुछ सीखते हैं. सोशल स्ट्रेक्चर इसका मैन कारण है.’

डॉ नंद कुमार आगे कहते हैं, देखिए हमारा समाज पहले की तुलना में अब ज्यादा लिबरल हो गया है. पहले बच्चों को आगर पिता डांटते थे तो मां समझाती थी कि तुमने यह काम गलत किया इसलिए पापा ने डांटा है. पिताजी के डांटने पर जो मस्तिष्क में जो उलझन पैदा होती थी वह मां के समझाने से खत्म हो जाती था. पहले संयुक्त परिवार हुआ करता था बाद में एक दौर ऐसा आया जब पति,पत्नी और सिर्फ बच्चों का परिवार होने लगा. अब एकल परिवार के कॉन्सेप्ट पर हमलोग आ गए हैं. अब बच्चों को लगने लगा है कि इट इज माई लाइफ. किशनगढ़ में बच्चे ने जो किया है वह भी इसी का नतीजा है. उसको लगने लगा कि हम सभी को मार कर आराम से अपनी जिंदगी जिएंगे.’

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