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क्या था 1994 का फैसला, जब कोर्ट ने कहा था कि नमाज के लिए मस्जिद जरूरी नहीं

1994 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या एक्ट- 1993 के भूमि अधिग्रहण की संवैधानिकता सुनवाई करते हुए ये फैसला दिया था

Updated On: Sep 27, 2018 11:10 AM IST

FP Staff

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क्या था 1994 का फैसला, जब कोर्ट ने कहा था कि नमाज के लिए मस्जिद जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े एक अहम मुद्दे पर फैसला सुनाने वाली है. 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था कि नमाज़ अता करने के लिए मुस्लिमों को मस्जिद की जरूरत नहीं है. इस पर बाद में मुस्लिम समूहों की ओर से पुनर्विचार के लिए कई याचिकाएं डाली गईं.

सुप्रीम कोर्ट आज इस पर फैसला सुनाएगा कि इस फैसले को बरकरार रखा जाए या पुनर्विचार के लिए हायर बेंच को भेजा जाए. पीठ ने 20 जुलाई को फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज तीन जजों की बेंच सुनाएगी. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ अपना फैसला सुनाएगी. पीठ ने 20 जुलाई को इसे सुरक्षित रख लिया था.

ये मुद्दा डॉ. एम इस्माइल फारूकी के मामले में उस फैसले पर उठा था, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद नमाज़ का अभिन्न हिस्सा नहीं है. 1994 में जस्टिस एमवी वर्मा, जस्टिस जी रे और जस्टिस एस भरूचा ने अयोध्या एक्ट- 1993 के भूमि अधिग्रहण की संवैधानिकता सुनवाई करते हुए ये फैसला दिया था.

मस्जिद भी बाकी धार्मिक स्थलों जैसा ही, हो सकता है अधिग्रहण 

ये फैसला देते हुए बेंच ने इस्लाम में मस्जिद की अहमियत पर बात की थी. कोर्ट ने कहा था कि भारत में माने जाने वाले मुस्लिम लॉ के तहत कब्जाई हुई जमीन पर मस्जिद का मालिकाना हक नहीं रह जाता है. कोर्ट ने कहा, 'यदि कानून में ऐसी स्थिति है तो ये मानने का कोई कारण नहीं रह जाता है कि मस्जिद के पास धर्मनिरपेक्ष भारत में बाकी दूसरे धर्मों की पूजा की जगहों से भी ज्यादा ऊंची या विशेष स्थिति है, जो राज्य को उसके अधिग्रहण से रोक सके.'

कोर्ट ने कहा कि 'मुस्लिम इस्लाम धर्म के लिए या नमाज़ के लिए अभिन्न अंग नहीं है. नमाज़ कहीं भी पढ़ी जा सकती है, खुले में भी. इसलिए संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं जो इसके अधिग्रहण से रोक सके.'

कोर्ट ने कहा कि 'किसी इस्लामिक देश में अधिग्रहण से बचाने के लिए भले ही मस्जिद को विशेष दर्जा या रक्षा मिली हो, लेकिन धर्मनिरपेक्ष भारत में मस्जिद की स्थिति वही है, जो यहां के दूसरे धर्मों की और उनके पूजा स्थलों की है. ये दूसरे धर्मों के पूजा स्थलों की तरह ही एक पूजा स्थल है, इससे ज्यादा कुछ नहीं.'

हालांकि, कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में आगे जोड़ा कि 'जाहिर है, किसी भी धार्मिक स्थान का अधिग्रहण केवल एक बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए असामान्य और असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए, यह देखते हुए कि इस तरह के अधिग्रहण से लोगों के धार्मिक अधिकार न छिनें.'

कोर्ट ने कहा कि 'इस स्थिति के अधीन, अब किसी भी धार्मिक स्थल की तरह ही किसी मस्जिद का अधिग्रहण भी हो सकता है. लेकिन अधिग्रहण के तहत लोगों को धार्मिक अधिकारों की भी रक्षा करनी होगी और ये ध्यान रखना होगा कि वो जमीन इतनी धार्मिक अहमियत न रखती हो, जिसके अधिग्रहण से लोगों के धार्मिक अधिकारों का हनन होता हो.'

इस फैसले के पुनर्विचार पर आना है फैसला

अयोध्या मामले के एक मूल वादी एम सिद्दीक ने एम इस्माइल फारूकी के मामले में 1994 के फैसले में इन खास निष्कर्षों पर ऐतराज जताया था. अब सिद्दीक की मृत्यु हो चुकी है और उनका प्रतिनिधित्व उनके कानूनी वारिस कर रहे हैं.

सीनियर लॉयर राजीव धवन ने सिद्दीक के कानूनी प्रतिनिधि की ओर से पेश होते हुए कहा था कि मस्जिदें इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नही होने की टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने बगैर किसी पड़ताल के या धार्मिक किताबों पर विचार किए बगैर की.

बता दें कि मुस्लिम समूहों ने चीफ जस्टिल की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष यह दलील दी है कि इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन पर पांच सदस्यीय बेंच को पुनर्विचार करने की जरूरत है क्योंकि इसका बाबरी मस्जिद-राम मंदिर भूमि विवाद मामले पर असर पड़ेगा.

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