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जानिए कैसे लाया जाता है चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग?

अगर ऐसा हुआ तो ये पहला मौका होगा जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाया गया है

Updated On: Apr 20, 2018 02:07 PM IST

FP Staff

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जानिए कैसे लाया जाता है चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग?

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात कर रहे हैं. अगर ऐसा हुआ तो ये पहला मौका होगा जब सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाया गया है. हालांकि इसी साल के शुरू में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने भी जस्टिस मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने की मांग की थी. एनसीपी सांसद माजिद मेमन और सांसद डीपी त्रिपाठी ने इसकी पुष्टि की है. साथ ही ये भी कहा है कि इस हस्ताक्षर अभियान शुरू कर दिया गया है.

इससे पहले सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन के खिलाफ वर्ष 2009 में राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया गया था, लेकिन इसकी प्रक्रिया आगे बढ़े, इससे पहले ही दिनाकरन ने इस्तीफा दे दिया था. इसके अलावा हाईकोर्ट के एक और चीफ जस्टिस के साथ एक जज के खिलाफ भी महाभियोग प्रस्ताव संसद में पेश हो चुका है.

बताया जा रहा है कि कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा उठाए गए मसलों को आधार बनाकर महाभियोग लाने की तैयारी है. जिसमें उन्हें टीएमसी, एनसीपी समेत दूसरे विपक्ष दलों को समर्थन मिल रहा है. हालांकि, यह नोटिस कब दिया जाएगा, इस पर अभी आधिकारिक तौर पर कोई जानकारी नहीं है.

दरअसल एक बार सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति के बाद उन्हें महाभियोग लाकर संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत मिलने के बाद ही हटाया जा सकता है. लेकिन इसमें भी कई किंतु और परंतु की स्थितियां हैं.

क्या कहता है संविधान

- संविधान की धारा 124 (4) कहती है कि चीफ जस्टिस की नियुक्ति के बाद उसे हटाने की प्रक्रिया संसद से ही संभव है. संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाकर ये प्रक्रिया शुरू की जा सकती है

- महाभियोग प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पास किया जाना चाहिए.

- साथ ही राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिलनी चाहिए

- महाभियोग के लिए पुख्ता आधार भी होना चाहिए

- इसके बाद राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर से इस बारे में आदेश जारी करते हैं.

- अन्यथा चीफ जस्टिस 65 साल की उम्र तक अपने पद पर बने रहेंगे

- जज (इन्क्वॉयरी) एक्ट 1968 कहता है कि चीफ जस्टिस या अन्य किसी जज को सिर्फ दुराचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है. लेकिन दुराचार और अक्षमता की परिभाषा स्पष्ट नहीं है. हालांकि इसमें आपराधिक गतिविधि या अन्य न्यायिक अनैतिकता शामिल है.

क्या है प्रक्रिया

-चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर युक्त महाभियोग प्रस्ताव की जरूरत होती है. इसके बाद ये प्रस्ताव संसद के किसी एक सदन में पेश किया जाता है. इसके बाद इसे राज्यसभा के चेयरमैन या लोकसभा के स्पीकर को सौंपना होता है.

- ये राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर पर निर्भर करता है कि वो इस प्रस्ताव पर क्या फैसला लेते हैं. वो मंजूर भी कर सकते हैं और नामंजूर भी

-अगर राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर इस प्रस्ताव को मंजूर करते हैं तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन होता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज, एक हाईकोर्ट जज और एक विधि संबंधी मामलों का जानकार (जज, वकील या स्कॉलर) शामिल होता है.

-अगर कमेटी को लगता है कि आरोपों में दम है और ये सही हैं तो सदन में ये रिपोर्ट पेश की जाती है. फिर वहां से दूसरे सदन में भेजी जाती है.

- अगर इस रिपोर्ट को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुत मिलता है महाभियोग पास हो जाता है

-इसके बाद राष्ट्रपति अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए चीफ जस्टिस को हटाने का आदेश दे सकते हैं.

संसद में मौजूदा स्थिति क्या है

- माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस ये प्रस्ताव लेकर आती है तो इस पर एनसीपी, टीएमसी, सपा, डीएमके, लेफ्ट और आईयूएमएल समर्थन करेंगे.

- राज्यसभा में कांग्रेस के पास 51, डीएमके के पास 4, आईयूएमएल के पास 1, आरजेडी के 5, एनसीपी के 4, सपा के 13, टीएमसी के 13, बीएसपी के 4 और लेफ्ट के 6 सदस्य हैं.

- यानि कांग्रेस राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाने में कामयाबी हासिल कर सकती है लेकिन लोकसभा में विपक्ष इसे पारित कराने की स्थिति में नहीं है. ऐसे इसके पारित होने की संभावनाएं बिल्कुल नहीं हैं.

इस पर प्रतिक्रिया क्या है

पूर्व जजों और कानूनी दिग्गजों ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के आरोपों के आधार पर महाभियोग लाया जा रहा है तो ये पहल 'अपरिपक्व' है.

जिन जजों के खिलाफ आ चुका है महाभियोग

सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन के खिलाफ वर्ष 2009 में 75 राज्यसभा सांसदों ने हस्ताक्षर युक्त पत्र तत्कालीन राज्यसभा चेयरमैन और उपराष्ट्रीय हामिद अंसारी को सौंपा था. अंसारी ने इसकी जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति भी गठित कर दी थी. लेकिन इसके बाद दिनाकरन ने पद से इस्तीफा दे दिया था. जस्टिस दिनाकरन ने समिति की कार्यवाही को रोकने की अनेक कोशिशें की पर उन्हें सफलता नहीं मिली. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें राहत नहीं मिली.

संसद में जस्टिस दिनाकरन के ख़िलाफ़ 12 मामले तय किए जाने के बाद हामिद अंसारी ने आरोपों की जांच के लिए जनवरी 2010 में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था.

दिनाकरन से पहले 1990 के दशक के मध्य में जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग लोकसभा में गिर गया था, जबकि कोलकाता हाई कोर्ट के जज सौमित्र सेन ने महाभियोग के बाद वर्ष 2011 में इस्तीफा दे दिया था. राज्यसभा में सौमित्र सेन को सरकारी फंड के दुरुपयोग और ग़लत तथ्य पेश करने का दोषी पाया था.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट की अवमानना के मामले में कोलकाता हाईकोर्ट के जज कर्णन को छह महीने के लिए जेल की सजा सुनाई थी. उन्हें जेल की सजा काटनी पड़ी थी.

(न्यूज 18 हिंदी से साभार)

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