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2021 की जनगणना में ओबीसी जातियों की गिनती के मायने क्या हैं

केंद्र सरकार ने कहा है कि आने वाली जनगणना में ओबीसी के आंकड़े जुटाए जाएंगे. क्या है इस घोषणा के मायने

Updated On: Sep 19, 2018 07:09 AM IST

Dilip C Mandal Dilip C Mandal
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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2021 की जनगणना में ओबीसी जातियों की गिनती के मायने क्या हैं

2021 की जनगणना करीब आ रही है. इसकी तैयारी बैठकें शुरू हो गई हैं. 130 करोड़ से ज्यादा लोगों में से हर एक के परिवार में जाकर उन्हें गिनना और उनके बार में 20 से भी ज्यादा किस्म की जानकारियां लेना और फिर उन जानकारियों को एक साथ मिलाकर देखना और आंकड़ों को पेश करना एक मुश्किल काम है. लेकिन यह कोई अनूठा काम नहीं है. 1872 से भारत में जनगणना हो रही है. 1881 के बाद से इसे हर दस साल पर किया जा रहा है. सिर्फ 1941 की जनगणना के आंकड़े हमारे पास नहीं हैं क्योंकि इस जनगणना के दौरान ही दूसरा विश्व युद्ध हो रहा था और अंग्रेजों का उपनिवेश होने के नाते भारत भी उस युद्ध में शामिल था.

इस बार की जनगणना तीन मायनों में अब तक की जनगणनाओं से अलग होगी. एक तो इस जनगणना में कुछ ऐसी जानकारियां भी जुटाई जाएंगी, जो अब तक किसी जनगणना में नहीं जुटाई गई थीं. दो, नई टेक्नॉलॉजी का इस जनगणना में इस्तेमाल होगा और सॉफ्टवेयर से आंकड़ों का संकलन और विश्लेषण होगा. इससे जनगणना के आंकड़ा संकलन का काम जल्द पूरा हो जाएगा. अभी जनगणना के बाद छह से सात साल तक आकड़े आते रहते हैं. तीसरा और एक बड़ा बदलाव जिसकी बहुत ज्यादा चर्चा है, वह है जनगणना में आजादी के बाद पहली बार एससी और एसटी के अलावा ओबीसी जातियों को भी गिना जाएगा. केंद्रीय गृह मंत्रालय की बैठक में इसका फैसला किया गया है. हालांकि ओबीसी की गिनती, पूरी तरह से जाति जनगणना नहीं है, लेकिन जाति जनगणना की दिशा में एक कदम जरूर है. जाति जनगणना में हर जाति की गिनती होती है.

जातियों को क्यों गिना जाना चाहिए

Constitution_of_India

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के अध्याय में सभी नागरिकों को कानून की नजर में समान माना गया है और अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है. अस्पृश्यता यानी छुआछूत के उन्मूलन के लिए सिविल राइट्स एक्ट भी बनाया गया है. लेकिन जो संविधान जाति के आधार पर छुआछूत का निषेध करता है, वही संविधान यह भी मानता है कि जाति के आधार पर भेदभाव इतने भर से खत्म नहीं हो जाएगा.

इसलिए संविधान में वंचित तबकों के लिए विशेष प्रावधान करने वाले कई अनुच्छेद हैं, जिसमें 15 (4) और 16(4) प्रमुख हैं. इन अनुच्छेदों में सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह वंचित तबकों के लिए विशेष प्रावधान तथा आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है. इसके अलावा अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए अनुच्छेद 340, 341 और 342 हैं. अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में सीटें आरक्षित करने का प्रावधान भी संविधान में है.

यानी स्पष्ट है कि संविधान जाति के अस्तित्व को स्वीकार करता है और इस आधार पर जो वंचित हैं उनके लिए खास प्रावधान करता है. विशेष प्रावधान के लिए सामाजिक समूहों से संबंधित आंकड़े होने चाहिए. ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि जनगणना में जातियों के आंकड़े इकट्ठा किए जाएं, ताकि न सिर्फ उनकी संख्या बल्कि उनके पिछड़ेपन की भी जानकारी हो सके.

इसलिए 1951 के बाद से हर जनगणना में अनुसूचित जाति और जनजाति के आंकड़े जुटाए जाते हैं. हालांकि आजादी के बाद से ही विभिन्न राज्यों में पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिया जा रहा है और उन्हें लेकर तमाम नीतियां भी बनाई जा रही हैं, लेकिन ओबीसी या पिछड़ी जातियों की आजादी के बाद कभी गिनती नहीं हुई. उन्हें आरक्षण अनुमान के आधार पर दिया जाता है.

मंडल कमीशन और जातियों के आंकड़े

इसे लेकर जनता पार्टी शासनकाल में 1978 में गठित दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग यानी मंडल कमीशन को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. मंडल कमीशन को केंद्रीय स्तर पर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान और उनके विकास के उपाय सुझाने का कार्य सौंपा गया. लेकिन जब आयोग ने काम शुरू किया तो इन जातियों से संबंधित आंकड़े नहीं थे.

आखिरकार जातियों के आंकड़े 1931 की जनगणना के आधार पर निकाले गए. हालांकि इतने पुराने आंकड़े कतई विश्वसनीय नहीं थे, क्योंकि जातियों की स्थिति बदलती रहती है. वैसे भी 1931 के बाद से बहुत कुछ बदल चुका था. देश का बंटवारा हो गया था और बड़ी आबादी अपना ठिकाना बदल चुकी थी. लेकिन कोई और विकल्प न होने के कारण 1931 की जनगणना से ही मंडल कमीशन ने अपना काम चलाया. 1931 के आंकड़ों के आधार पर मंडल कमीशन ने बताया कि देश में ओबीसी की आबादी 52 फीसदी है. लेकिन मंडल आयोग ने साथ में ये सिफारिश भी कर दी कि अब से जो भी जनगणना हो उसमें जातियों के आंकड़े भी जुटाए जाएं.

मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद देश में दो जनगणना हो चुकी है. 2001 की जनगणना में जातियों की गिनती न करने का फैसला उस समय की एनडीए सरकार ने किया, तो 2011 की जनगणना में जाति का कॉलम न जोड़ने का फैसला यूपीए की सरकार ने किया. यूपीए सरकार ने जाति की गिनती को जनगणना से अलग कर दिया और अलग से सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना शुरू करा दी.

2011 से शुरू हुई जातियां की गिनती 2016 तक चलती रही. इस जनगणना पर 4,893 करोड़ रुपए खर्च हो गए, लेकिन जाति का कोई आंकड़ा नहीं आया. सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि अलग से कराई गई जातियों की गिनती में 9 करोड़ से ज्यादा गलतियां हैं और उन्हें सुधार पाना मुमकिन नहीं है.

जातियों की अलग से गिनती दोषपूर्ण थी क्योंकि यह गिनती जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत नहीं कराई गई. इस काम में सरकारी शिक्षकों की जगह दैनिक मजदूरों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और एनजीओ को लगाया गया, जिन्हें जनगणना का कोई अनुभव नहीं था. अब होने वाली किसी भी जनगणना में इससे सबक सीखने की जरूरत है ताकि इन गलतियों को दोहराया न जाए.

संसद में बनी आम सहमति के आधार पर जाति जनगणना

Parliament's Monsoon session

2021 की जनगणना में सरकार के पास मौका है कि जातियों के आंकड़े जुटा लिए जाएं. इसके लिए करना सिर्फ यह है कि जनगणना के फॉर्म में जाति का कॉलम जोड़ दिया जाए. 1931 और उससे पहले जनगणना ऐसे ही होती थी और उसके आंकड़ों की विश्वसनीयता इतनी है कि उन्हीं आंकड़ों पर आज भी नीतियां बन और चल रही हैं. समस्या सिर्फ यह है कि वे आंकड़े 90 साल पुराने हो चले हैं. अगर 2021 का मौका देश ने गंवा दिया तो फिर यह अवसर दस साल बाद आएगा. और उस समय देश 100 साल पुराने आंकड़ों के आधार पर चल रहा होगा.

जनगणना दरअसल किसी भी देश और समाज को समझने का सबसे सटीक माध्यम है. इसमें जुटाए गए आंकड़े नीति निर्माताओं से लेकर, राजनीति विज्ञानियों और समाजशास्त्रियों से लेकर सांख्यिकी के जानकारों तक के काम आते हैं. खासकर नीति निर्माण में इनका व्यापक प्रयोग होता है.

2021 की जनगणना बेशक तीन साल बाद होगी, लेकिन उसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं. जनगणना में जाति को शामिल करने का काम अगर अभी हो जाए, तो इसे लेकर धुंध छंट जाएगी. देश के राजनीतिक तबके में जाति जनगणना को लेकर आम सहमति है. लोकसभा में सभी दल 2010 में ही यह कह चुके हैं कि जनगणना में जाति को शामिल किया जाए. अब जरूरत है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बनी आम सहमति को लागू किया जाए.

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