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आखिर क्या है बाबा राम रहीम की गुफा के भीतर?

डेरा प्रमुख की इस गुफा के अंदर कम ही लोग दाखिल हो सकते हैं

Updated On: Aug 25, 2017 03:57 PM IST

FP Staff

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आखिर क्या है बाबा राम रहीम की गुफा के भीतर?

हरियाणा के सिरसा के संत गुरमीत राम रहीम एक बार फिर चर्चा में हैं. उन्हें रेप और हत्या के आरोप में अदालत में पेश होना है.

हरियाणा में फिर वही कहानी दोहराई जा रही है जो 2009 में थी. उन दिनों मैं 13 दिन तक बाबा के आश्रम में रहा. शायद मैं उन किस्मत वाले पत्रकारों में से हूं, जिन्हें बाबा की गुफा में जाने का मौका मिला. बहुत कम लोगों को ही बाबा की इस गुफा में जाने की इजाजत है.

मैं इस गुफा से ही शुरुआत करता हूं. करीब 100 एकड़ में फैले बाबा के आश्रम के लगभग बीचों-बीच कांच और दीवारों से बना एक भवन है जिसे बाबा की गुफा कहा जाता है. बाबा की इस गुफा में जाने के लिए बस एक ही दरवाजा हम देख पाए. बताया गया कि गुफा में जाने के लिए दो-तीन और दरवाजे हैं.

जहां तक बाबा की गाड़ी सीधे जाती है. इसी भवन के पहले फ्लोर तक मुझे जाने का मौका मिला. लेकिन इस गुफा तक के रास्ते में हर जगह आपको सादे कपड़ों में या फिर बकायदा कमांडो शैली में बंदूक लिए लोग दिखेंगे.

ये बिल्कुल किसी फिल्मी सीन जैसा लग रहा था. मुझे जाने का सौभाग्य इसलिए मिला कि मैं 'आज तक' की तरफ से आश्रम में पहुंचने वाले शुरुआती पत्रकारों में से था. सिरसा जाते समय ही हमारी शुरुआत बड़ी अजीब रही. आश्रम से ठीक पहले मोड़ पर जब पता पूछा तो एक शख्स जो गिटार लिए हुए था, उसने अचानक वाकी-टॉकी पर बात की.

पता चला कि आश्रम में सूचना दे रहा है. फिर हमको जाने को कहा. वहां पहुंचे तो पीछे के रास्ते से हमको ले जाया गया. वहां सबसे पहली मुलाकात मीडिया देख रहे एक शख्स पवन इंसा से हुई. पवन जी ने ही हमको बाबा के राइट हैंड और कभी दिल्ली में सर्जन रह चुके आदित्य इंसा से कराई.

चूंकि उस समय मीडिया का जबरदस्त दवाब था, बाबा के मीडिया सलाहकारों ने मुझसे मदद मांगी तो मैंने पत्रकार के तौर पर कहा कि बाबा से मिलवा दीजिए. उस समय आज तक के सिरसा के स्ट्रिंगर पर उन लोगों को बड़ा भरोसा था तो मुझे भी उनके साथ चलने को कहा.

बाबा की गुफा में ये काम करती हैं शिष्याएं

करीब दस मिनट पैदल चलने के बाद हम बाबा की गुफा में पहुंचे. बाबा की गुफा की शान ही निराली थी. शानदार सोफा और चमकदार पर्दों वाले हॉल में हमको बिठाया गया. वहीं बातचीत में पहली बार पता चला कि बाबा की 209 शिष्याएं खास तौर पर चुनी जाती हैं. इन शिष्याओं में से कुछ को ही इस गुफा में आने का अधिकार है.

गुफा में जाने के लिए बाकायदा पहचान और बायोमीट्रिक सिस्टम है, तभी दरवाजे खुलते हैं. ये शिष्यायें किसी साध्वी की तरह खास गेरुआ या सफेद रंग के कपड़े पहनती हैं और अक्सर बाल खुले रखती हैं. ये बाबा को खाना खिलाने, मुलाकात करवाने, सुबह शाम स्टेज तक लाने का काम करती हैं.

बाबा के प्रवचन में भी बाईं तरफ इनके लिए एक खास जगह बनी होती है. प्रवचन वाले हॉल मे यही सब कुछ संभालती हैं और बाहरी हिस्से में दूसरे पुरुष कारसेवक काम करते हैं. बहरहाल बाबा की गुफा की फिर से बात करते हैं. बाबा की इस गुफा में बाबा के लिए अलग से तैयार होने की जगह और खास लोगों से मिलने का कमरा भी है.

यहीं से बाबा के पास कई देशों में सीधे बात करने के लिए हॉटलाइन भी है. इस पूरी गुफा में ऐशो-आराम की हर चीज मौजूद है. झाड़फानूस से लेकर शानदार बाथरुम तक. हम मिलने गए तो बाबा को सब ब्रीफ था, सीधे काम की बात क्या और कैसे करें.

मैंने कहा कि मीडिया को बाइट दे दीजिए. जवाब मिला कि बाइट देंगे तो सब सवाल पूछेंगे. मैंने कहा मुझे रोज बाइट दीजिए, मैं दूसरों को दे दूंगा. लेकिन वो नहीं माने. अंत में तय हुआ कि स्ट्रिंगर रोज कैमरा लेकर जाएगा और बाबा बाइट देंगे.

फिर उसकी कई कापियां कैसेट पर तैयार होंगी फिर वहीं बांटी जाएंगी. सोचा चलो एक काम तो हुआ कि बाइट तो मिल ही जायेगी. फिर पता चला कि बाबा रोज सुबह-शाम प्रवचन भी देते हैं. ठीक सवा पांच बजे सुबह और इतने ही बजे शाम को, यानि रोज की नींद खराब.

बाबा के प्रवचन में अगले ही दिन सुबह पूरा तामझाम लेकर पहुंच गए. बाबा कुल मिलाकर 6 मिनट बोले. उसमें भी कोई तथ्य या बड़ी बात नहीं, बस लब्बोलुआब ये कि मिलकर रहो, सबका भला करो. शौच के बाद साफ-सफाई रखो. गुरु को सब समर्पित कर दो और नशा मत करो.

आम तौर पर हर रोज प्रवचन में करीब 30 हजार लोग जुटते. पूरे 13 दिन तक यही सुबह-शाम चलता रहा. बाबा न आगे बोलते न पीछे. बस रोज एक या दो भजन बाबा के गिटार और डीजे वाले बजाते. उसके बाद बाबा का ऑटोमेटिक मंच घूमने लगता. सभागार के बीचों-बीच बिल्कुल किसी शाही सवारी की तरह.

बाबा के कपड़े चंडीगढ़ का डिजाइनर बनाता

पता चला कि स्टेज का एक हिस्सा आजकल शादियों में वरमाला के लिये इस्तेमाल होने वाले ऑटोमेटिक स्टेज की तरह है. इस गोल स्टेज के नीचे पहिए लगे होते हैं और ऊपर एक हैंडल, जिससे मंच आगे और पीछे जाता है. बाबा भी उसी पर बैठकर सीधे एक चक्कर लगाते और वापस आ जाते. बाबा के कपड़े भी खास डिजाइनर से चंडीगढ़ से बनकर आते हैं. चमकदार और शिफॉन से बने.

बाबा की गुफा तक हो आने के कारण हम वीआईपी हो गए. हमको तीन या चार सेवक हमेशा घेरे रहते. हम आवाज लगाएं उसके पहले ही सब कुछ तैयार होता. सुबह आश्रम पहुंचते ही हमारी सेवा में काजू, किशमिश, लीची, आम सब होता चाय और दूध के साथ.

सुबह दस बजे तक शानदार भोजन. तीन बजे फिर वही आम, लीची, काजू, किशमिश का नाश्ता और शाम 7 बजे भोजन. दो तीन दिन में ही हम बोर हो गए. कह दिया कि बाहर खाएंगे यहां नहीं.

वीआईपी होने के कारण हमको आश्रम के ठीक सामने बने एनआरआई गेस्ट हाउस में ठहराया गया. जहां शानदार सुईटस ही नहीं, स्विमिंग पूल और रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट भी था. बिल्कुल मुंबई के एंबेसेडर होटल की तरह. बस बाकी लोग परेशान थे कि नॉनवेज और शराब नहीं मिलता.

मुझे दोनों नहीं चाहिये था. दूसरी मुश्किल थी टीवी की जिस पर सिर्फ बाबा के प्रवचन ही आते और कुछ नहीं. टाइम काटना मुश्किल था तो कभी कहीं जाते कभी कहीं.

खुले आश्रम के कई राज

इसी दौरान आश्रम की कई बातें पता चलीं. जैसे आश्रम में खुद के दो पेट्रोल पंप हैं. आश्रम की गाड़ियों को पर्ची पर सीधे पेट्रोल मिलता है. आश्रम में सब कुछ उगता है. दाल-चावल से लेकर आलू-टमाटर तक कुछ भी बाहर से खरीदने की जरुरत नहीं पड़ती. आश्रम में ही कई लोग शर्ट-पैंट और बाकी कपड़े सिलते हैं तो एक जगह पर मसाले भी बनते हैं यानि सब कुछ आश्रम में ही मिल जाता है बाहर जाने की जरुरत ही नहीं.

बाबा के आश्रम में अंदर घूमने के लिए बैटरी वाली कार भी हैंस जिससे बाबा आश्रम में घूमते रहते हैं. इतना ही नहीं आश्रम में एक विशाल वॉशिंग मशीन मौजूद है. किसी बड़े कुएं की तरह जिसमें एक बार में 10 से 15 हजार तक कपड़े धुल सकते हैं. इसे खास तौर पर बनवाया गया है.

आश्रम में सीसीटीवी तो था ही इसके अलावा एक कंट्रोल रूम भी है जहां देश के तब के सारे चैनलों की मॉनिटरिंग और बाबा से संबंधित खबरों को रिकॉर्ड करने का सिस्टम भी था.

बाबा को यहीं से मीडिया की ताकत का अंदाजा हुआ. बाबा ने मुझसे भी एक चैनल शुरू करने का नुस्खा पूछा और कहा कि आप ही जुड़ जाइए. मैंने कहा कि मैं जहां हूं, वहीं ठीक हूं. कुछ लोग जरूर हैं जो चैनल खुलवाने की पूरा ठेका लेते हैं उनका नंबर दे देता हूं.

उधर बाबा के आश्रम के आसपास तनाव मैं देख सकता था. कभी खबर आती कि बाबा के लिए दिल्ली से स्पेशल फोर्स आ रही है तो हंगामा हो जाता. सबसे आगे बाल खोले शिष्याएं और उनके पीछे 10 से पंद्रह हजार शिष्य हमारे कैमरों के सामने हंगामा करते हैं.

एक दिन तो जीवन का शायद सबसे लंबा लाइव करने का मौका मिला. मैं शाम पांच बजे से लेकर पूरे 11 बजे तक लाइव करता रहा. पूरे समय बाबा के शिष्य चाय-पानी पिलाते रहे. फिर भी थक गया था. रात होते-होते पता चला कि बाबा गिरफ्तार नहीं होंगे तो सब शांत होने लगे. बाबा की और भी कई कहानियां है जो बाद में, फिलहाल इतना ही...

यह स्टोरी संदीप सोनवलकर की है

(साभार: न्यूज़18)

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