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क्या था 1985 में राजीव गांधी की केंद्र सरकार के साथ हुआ असम समझौता

असम में बाहरी लोगों के आने से 50 के दशक से ही असंतोष रहा है. जो 1971 के बाद बहुत ज्यादा हो गया

Updated On: Aug 01, 2018 09:28 PM IST

FP Staff

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क्या था 1985 में राजीव गांधी की केंद्र सरकार के साथ हुआ असम समझौता

1983 में असम में हुए नीली दंगे ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. इसमें 24 घंटे के भीतर ही करीब 2000 लोगों की हत्या कर दी गई थी. ये असम में बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ सबसे बड़ी हिंसा थी. इसने केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार को भी झकझोर कर दिया. असम में तब इल्लीगल इमीग्रेंट डिटरमिनेशन बाई ट्रिब्यूनल एक्ट (आईएमडीटी) लागू किया गया. इससे असम में आंदोलन और तेजी से भड़क उठा. ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) की अगुवाई में चल रहे आंदोलन से 84-85 में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई. आखिरकार तत्कालीन राजीव गांधी की केंद्र सरकार को आसू के साथ समझौता करना पड़ा.

ये समझौता 15 अगस्त 1985 को हुआ. इसके बाद विधानसभा को 1985 में भंग करके चुनाव कराए गए. जिसमें नई बनी असम गणपरिषद की सरकार को बहुमत मिला. राज्य में असम समझौते से शांति बहाली तो हुई लेकिन नई बनी राज्य सरकार खुद भी इसे लागू नहीं करा पाई.

इस समझौते में कौन-कौन था शामिल

असम समझौते के नाम से बने दस्तावेज पर भारत सरकार और असम आंदोलन के नेताओं ने हस्ताक्षर किए. इसमें ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन की ओर से उसके अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत, महासचिव भृगु कुमार फूकन और ऑल असम गण संग्राम परिषद के महासचिव बिराज शर्मा शामिल हुए. साथ ही भारत और असम के प्रतिनिधि और प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी इस समझौते के दौरान मौजूद रहे.

क्या था 1985 का समझौता

- भारत और पूर्वी पाकिस्तान विभाजन के बाद (1951 से 1961 के बीच) असम आए सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट का अधिकार दिया जाएगा.

- 1961 से 1971 के बीच असम आने वालों को नागरिकता और अन्य अधिकार दिए जाएंगे लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होगा

1985 में असम समझौता हुआ जरूर लेकिन इसे अमल में नहीं लाया जा सका

- असम को आर्थिक विकास के लिए विशेष पैकेज भी दिया जाएगा.

- असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किए जाएंगे.

- 1971 के बाद असम में आने वाले विदेशियों को वहां का नागरिक नहीं माना जाएगा, उन्हें वापस लौटाया जाएगा.

असम में कब से बाहरी रहे हैं मुद्दा

असम में बाहरी बनाम असमिया के मसले पर आंदोलनों का दौर काफी पुराना है. 50 के दशक में ही बाहरी लोगों का असम आना राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था. औपनिवेशिक काल में बिहार और बंगाल से चायबगानों में काम करने के लिए बड़ी तादाद में मजदूर असम पहुंचे. अंग्रेजों ने उन्हें यहां खाली पड़ी जमीनों पर खेती के लिए प्रोत्साहित किया. इसके बाद विभाजन होने पर पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बांग्लादेश) से बड़ी संख्या में बंगाली पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम में आए. लिहाजा बाहरियों को लेकर चिंगारियां भी फूटती रहीं.

गुवाहाटी में असम गण परिषद की अगुवाई में एनसीआर लागू करने के समर्थन में जुलूस

1971 में क्या हुआ था

वर्ष 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने दमनकारी कार्रवाई शुरू की तो बड़े पैमाने पर बांग्लादेश सीमा पारकर यहां पहुंचे. करीब 10 लाख लोगों ने असम में शरण ली. बांग्लादेश बनने के बाद ज्यादातर वापस लौट गए लेकिन एक लाख लोग असम में ही रह गए. हालांकि 1971 के बाद भी बांग्लादेशी यहां आते रहे. ऐसे में असम के किसानों और मूलवासियों को यह डर सताने लगा कि उनकी ज़मीन-जायदाद पर बांग्लादेश से आये लोगों का कब्ज़ा हो जाएगा. जनसंख्या में होने वाले इस बदलाव ने मूलवासियों में भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी

असम में कब से ताकतवर आंदोलन शुरू हुए

1978 के आसपास यहां एक शक्तिशाली आंदोलन का जन्म हुआ. जिसकी अगुवाई वहां के युवाओं और छात्रों ने की. इसी बीच दो संगठन आंदोलन के अगुवा के तौर पर उभरे. ये आल असम स्टूडेंट यूनियन और आल असम गण संग्राम परिषद थे. इन दोनों संगठनों ने करीब छह साल तक वहां उग्र आंदोलन चलाया. इसी के चलते राजीव गांधी सरकार को उनसे समझौता करने पर विवश होना पड़ा. लेकिन ये समझौता कभी हकीकत में नहीं बदल पाया.

असम में 1971 में बड़े पैमाने बांग्लादेशी आए

1979 में यह एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आया, जब बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आने वाले लोगों को राज्य की मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया. 1978 में मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के सांसद की मृत्यु के बाद उपचुनाव की घोषणा हुई. चुनाव अधिकारी ने पाया कि मतदाताओं की संख्या में अचानक ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हो गया है. इसने स्थानीय स्तर पर आक्रोश पैदा किया.माना गया कि बाहरी लोगों, विशेष रूप से बांग्लादेशियों के आने के कारण ही इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है.

नागरिकता अधिनियम 1955 क्या कहता है

- किसी भी अवैध प्रवासी को भारतीय नागरिकता नहीं दी जा सकती. इसके तहत दो तरह के लोगों को अवैध प्रवासी माना गया.

- वो विदेशी, जो बगैर वैध पासपोर्ट और अन्य यात्रा दस्तावेजों के भारत आए

- वो विदेशी, जो वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी भारत में रुके हैं

क्या कहता है नागरिकता संशोधन विधेयक-2016

- नागरिकता अधिनियम 1955 में नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 के जरिए संशोधन किया गया. इसके तहत पड़ोसी देशों बांग्लांदेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों (मुस्लिम शामिल नहीं) को नागरिकता प्रदान की जाएगी, चाहे उनके पास जरूरी दस्तावेज हों या नहीं.

- ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि इन देशों से भारत आए अल्पसंख्यकों ने नागरिकता के लिए आवेदन किया लेकिन उनके पास भारतीय मूल के होने का प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है.

कब राज्य बना था असम

1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तब पूर्वी बंगाल और असम के रूप में एक नया प्रांत बनाया गया था, तब असम को पूर्वी बंगाल से संबंद्ध किया गया. जब देश का बंटवारा हुआ तो ये डर भी पैदा हो गया था कि कहीं ये पूर्वी पाकिस्तान के साथ जोड़कर भारत से अलग ना कर दिया जाए. तब गोपीनाथ बोर्डोली की अगुवाई में असम विद्रोह शुरू हुआ. असम अपनी रक्षा करने में सफल रहा. लेकिन सिलहट पूर्वी पाकिस्तान में चला गया. 1950 में असम देश का राज्य बना.

(साभार: न्यूज़18)

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