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इस्लामी आस्था का मजाक उड़ाते हैं ये अजीबो-गरीब फतवे

फतवा शब्द का शाब्दिक अर्थ है, राय. यानी अगर आप इस्लामी उसूलों के साथ अपनी जिंदगी गुजारना चाहते हैं और किसी विषय पर आपकी जानकारी नहीं है तो आप किसी मुफ्ती या उनसे भी बड़े मजहबी ओहदेदारों से राय ले सकते हैं

Updated On: Apr 06, 2018 09:01 AM IST

Nazim Naqvi

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इस्लामी आस्था का मजाक उड़ाते हैं ये अजीबो-गरीब फतवे

4 अप्रैल को फिर एक फतवा राष्ट्रीय समाचार-पत्रों की वेब-साइटों पर चिपका हुआ मिला. इसमें कहा गया है कि इस्लाम में विभिन्न शैलियों, रंगों और डिजाइनों में बुर्का की अनुमति नहीं है. ‘हिजाब (पर्दा) के नाम पर, डिजाइनर और स्लिम फिट बुर्का हराम है और इस्लाम में सख्ती से हराम है.’

अब इसे क्या कीजिए कि जब कोई फतवा आता है तो अनगिनत निगाहों से गुजरता है. इनमें ज्यादातर निगाहें तो वह होती हैं जिन्हें इन फतवों से कोई व्यक्तिगत सरोकार नहीं होता लेकिन उनके मुस्कुराने के लिए तो माहौल बन ही जाता है.

यह मेरे एक दोस्त, जो मुस्लिम भी हैं, की भावनाएं हैं जिन्हें मैं कलमबंद करने की कोशिश कर रहा हूं. मेरे दोस्त को रंज है कि आखिर मौलवी ऐसे फतवे देते ही क्यों हैं जो मजाक बन जाते हैं. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि हमारी इस्लामी आस्था का जितना मजाक इन फतवों ने उड़ाया है उतना शायद ही किसी ने उड़ाया हो.

फतवा शब्द का शाब्दिक अर्थ है, राय

मेरे दोस्त की बात सही थी. ऐसे फतवों की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्हें देखकर आपको हैरानी होगी कि आखिर हम किस दुनिया में रह रहे हैं या किस दुनिया में रहने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं. अगर इन फतवों को मानना शुरू कर दें तो दिन दोगुनी रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की कर रही दुनिया में फतवे मानने वाले कितने पीछे रह जाएंगे, इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है. इसीलिए हम देखते हैं कि फतवे जारी होते हैं, कुछ दिन हंसी-मजाक के बीच फंसे रहते हैं और फिर भुला दिए जाते हैं.

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फतवा शब्द का शाब्दिक अर्थ है, राय. यानी अगर आप इस्लामी उसूलों के साथ अपनी जिंदगी गुजारना चाहते हैं और किसी विषय पर आपकी जानकारी नहीं है तो आप किसी मुफ्ती या उनसे भी बड़े मजहबी ओहदेदारों से राय ले सकते हैं ताकि आप उस विषय पर अपना भ्रम दूर कर सकें.

फतवे देने की यह जिम्मेदारी ज्यादातर सहारनपुर में स्थित ‘दारुल-उलूम’ देवबंद पर है और इसके लिए उन्होंने एक पूरा दफ्तर खोल रखा है जिसमें हजारों मोटे मोटे रजिस्टरों में लाखों की संख्या में दिए जा चुके फतवे दर्ज हैं. अब तो इन फतवों को वेब-साइट पर लाकर ऑनलाइन किया जा रहा है, ताकि जिन विषयों पर फतवा लिया जा चुका है उनपर दोबारा ‘दारुल-उलूम’ को परेशान न किया जाए और लोग वहीं से अपने विषय की जानकारी देख लें. हां अगर वहां उनके सवाल का जवाब नहीं है तो वे दारुल-उलूम से संपर्क कर सकते हैं.

मैंने दोस्त की उत्तेजित भावनाओं को मंद करने के लिए कहा, नहीं ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुस्लिम ही ऐसा करते हैं. आज ही एक खबर केरल से है जिसमें वनस्पति-विज्ञान के एक प्रोफ़ेसर रजित कुमार ने कासरगोड में एक सभा में कहा कि जो महिलाएं जींस और शर्ट पहनती हैं उनके बच्चे ट्रांसजेंडर (मुझे बच्चों के लिए इसका हिंदी शब्द कहने की हिम्मत नहीं हुई) पैदा होते हैं.

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दोस्त झिड़क कर बोले, अरे छोड़िए ये सब, मुझे तो बड़ी शर्म आती है अपने यहां दिए जा रहे फतवों पर. फिर उन्होंने दारुल-इफ्ता (फतवा जारी करने वाला विभाग) के कई फतवे गिना डाले. सोशल मीडिया पर अपनी या अपने परिवार की तस्वीरें डालना गैर-इस्लामी है, मुस्लिम महिलाएं अपनी भवों को सुडौल नहीं कर सकतीं. वे डिजाइनर बुर्का नहीं पहन सकतीं. ये सब आखिर क्या है.

उन्होंने उल्टा सवाल मुझसे कर डाला. क्या आपको लगता है कि मुस्लिम महिलाएं फैशन करना छोड़ देंगी या डिजाइनर बुर्के पहनना छोड़ देंगी. मैंने बात को खत्म करने के लिए कहा, तो चलिए ठीक ही है, वे फतवा देकर अपना काम कर रहे हैं, और वे उसे न मानकर अपनी मर्जी चला रही हैं. दोस्त शायद भांप चुके थे कि मैं क्या कहने वाला हूं, फौरन तुनक कर बोले, जी नहीं जनाब, दरअसल होता यह है कि अगर किसी को ऐसे फतवों की जानकारी है, और फैशनेबल कपड़ों या चुस्त बुर्का पहने कोई महिला से उसकी निगाहें टकराती हैं तो तुरंत यह दिमाग में जाता है कि इस महिला का आचरण ठीक नहीं होगा. बताइए क्या हम किसी के बारे में गलत सोचकर खुद गुनाह में शामिल नहीं हो रहे हैं?

मैं वास्तव में यह सुनकर गंभीर हो गया. मैं सोचने लगा कि क्या फतवा देने वाले मुफ्तियों ने कभी यह सोचा होगा कि अगर उनके फतवों पर अमल नहीं होता है तो इन फतवों के बारे में या उस आस्था के बारे में जिसकी रोशनी में यह फतवे जारी किए जाते हैं, उसकी पवित्रता का क्या होगा.

सवाल यह है कि जिनके खिलाफ फतवा दिया जाता है वे उस फतवे पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं. पिछले दिसंबर की ही बात है कि मेरठ की एक मुस्लिम छात्र ने एक समारोह में कृष्ण जी का भेष बनाकर गीता का पाठ कर दिया तो दारुल-उलूम से उसके खिलाफ फतवा आ गया कि यह गैर-इस्लामी है.

उस 10-12 वर्ष की लड़की आलिया ने इसपर कहा ‘मैंने कार्यक्रम में कृष्णाजी की वेशभूषा पहनी और गीता का पाठ किया. मैं नहीं समझती कि मेरा इस्लाम इतना कमजोर है कि मेरे गीता का पाठ करने और ड्रेस पहनने से मुझे रोक देगा. उन्होंने फतवा जारी किया, लेकिन मैं सबसे प्रार्थना करती हूं कि मुझे राजनीति में ना घसीटा जाए’.

नवाज शरीफ के खिलाफ फतवा जारी किया गया

कोई ढाई-साल पहले, दुनियाभर में मशहूर ऑस्कर से सम्मानित सिंगर और म्यूजिक कंपोजर ए.आर. रहमान ने पैगंबर मोहम्मद पर बनी फिल्म 'मोहम्मद: मैसेंजर ऑफ गॉड' के संगीत में अपनी आवाज दी थी जिसके लिए उन्हें नापाक करार दे दिया गया था. लेकिन रहमान ने इसका करारा जवाब देते हुए कह दिया था कि ‘अगर संगीत न देता तो खुदा को क्या जवाब देता’.

कोई दो महीने पहले देवबंद के एक मुफ्ती अतहर कासमी ने फतवा दिया कि फुटबॉलर के घुटने खुले होते हैं इसलिए मुस्लिम महिलाओं को ऐसे मर्दों को देखना ही जायज नहीं है. क्या मुफ्ती साहब ने सोचा होगा कि अगर उनके फतवे के बाद भी लड़कियों ने फुटबॉल देखना नहीं छोड़ा तो उनके फतवे की प्रासंगिकता का क्या होगा?

ऐसे कई फतवे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि आखिर ये मुफ्ती साहेबान मुस्लिम कौम को किस दुनिया में ले जाना चाहते हैं. कुछ दिनों पहले देवबंद ने एक फतवे में बैंक में नौकरी करने वाले परिवार में शादी करने से परहेज करने को कहा था. ये हाल सिर्फ अपने ही मुल्क में नहीं है, पड़ोसी पाकिस्तान में भी ऐसे ही बेतुके फतवे जारी किए जाते हैं.

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मार्च 2017 में, पाकिस्तानी अखबार 'डेली पाकिस्तान ग्लोबल' में छपी खबर के मुताबिक पाकिस्तान के पूर्व-पीएम नवाज शरीफ के खिलाफ फतवा जारी किया गया है. उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाकर कुफ्र का फतवा जारी किया गया है. दरअसल नवाज शरीफ ने कराची में हिंदू समुदाय के साथ होली सामारोह के दौरान कहा था कि मैं पाकिस्तान का प्रधानमंत्री हूं और बतौर पीएम सभी धर्म के लोगों की सेवा करना मेरा फर्ज है.

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पिछले साल दारुल-उलूम ने वाराणसी में मुस्लिम औरतों द्वारा दीवाली के मौके पर रामचंद्र जी की आरती उतारने वाली महिलाओं के बारे में फतवा दिया कि चूंकि उन्होंने आरती की है इसलिए अब वे इस्लाम से बाहर हो गई हैं. हालांकि उन मुस्लिम महिलाओं का कहना था कि वे ऐसा करके हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का संदेश दे रही थीं. लेकिन दारुल उलूम देवबंद के मौलाना मुफ्ती शरीफ़ खान ने फतवा जारी करते हुए कहा कि वाराणसी में भगवान राम की तस्वीर के सामने आरती करना इस्लाम के खिलाफ है. ऐसा करने वाला मुसलमान नहीं रहता.

जवाब में मुस्लिम महिलाओं का कहना था कि हम 2006 से लगातार रामजी की आरती करते आ रहे हैं. ग्रुप-लीडर नाज़नीन अंसारी ने इस समारोह के दौरान टिप्पणी की थी, 'श्रीराम हमारे पूर्वज हैं. हम अपने नाम और धर्म बदल सकते हैं, लेकिन हम अपने पूर्वजों को कैसे बदल सकते हैं?

कुल मिलाकर मौलवियों और मुफ्तियों ने हर सवाल का जवाब देने की जैसे कसम खाई हुई हैं. मिसाल के तौर किसी ने इस पर भी फतवा मांगा कि क्या मुस्लिम महिलाएं केला और खीरा खा सकती हैं? जिसका जवाब दिया गया, नहीं. क्या मुस्लिमों का बुद्धजीवी वर्ग इस तरह के सवाल-जवाब पर यह सोचकर खामोश रह सकता है कि हमसे क्या मतलब? क्या यह उस आस्था के साथ मजाक नहीं है जिसे वह मानते हैं?

(तस्वीरें प्रतीकात्मक हैं)

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