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मॉनसून का बदलता पैटर्न: इन राज्यों में बढ़ सकता है जल संकट

रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश में ही नहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण देश में मानसून का पैटर्न बदल गया है और कई भारतीय राज्यों को पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है

FP Staff Updated On: Jun 13, 2018 05:36 PM IST

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मॉनसून का बदलता पैटर्न: इन राज्यों में बढ़ सकता है जल संकट

गर्मी के इस मौसम में पर्यटकों को शिमला से दूर रहने के लिए कहा जा रहा है. इस हफ्ते वहां स्कूल बंद कर दिए गए हैं. 18 मई 2018 के बाद से शहर को लगभग 60 फीसदी कम पानी मिल रहा है. यह संकट राज्य की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है क्योंकि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 7.2 फीसदी पर्यटन पर निर्भर है.

हिमाचल प्रदेश के जलाशयों का जल स्तर इस समय के लिए सामान्य से 56 फीसदी कम है. ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बताया है. इसके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण देश में मॉनसून का पैटर्न बदल गया है. शिमला ही नहीं, कई दूसरे राज्यों को पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

‘क्लाइमेट ट्रेंडस’ के एक बयान में कहा गया है कि, 'हाल के वर्षों में कुछ जगहों को बार-बार सूखे का सामना करना पड़ रहा है.' हालात और बिगड़ने से देश में कई जगहों पर पानी की कमी हो सकती है.

किन-किन राज्यों में बढ़ सकता है जल संकट

आंकड़ों से पता चलता है कि आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तराखंड जैसे राज्यों में जलाशयों का स्तर उनके सामान्य से 50 फीसदी से कम था, जबकि पंजाब, कर्नाटक और गुजरात के जलाशयों का स्तर सामान्य से लगभग 40 फीसदी कम था.

प्रतीकात्मक तस्वीर रॉयटर से

प्रतीकात्मक तस्वीर रॉयटर से

केंद्रीय जल आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 17 मई, 2018 तक, 2017 में सामान्य रूप से मॉनसून के बावजूद प्रमुख भारतीय जलाशयों में जल स्तर सामान्य से 10 फीसदी कम था. तेजी से शहरी विकास, बढ़ती आबादी और बदलते माहौल ने कई भारतीय शहरों के लिए सामान्य नागरिक की जल मांगों को पूरा करना मुश्किल बना दिया है.

जल संकट का कराण और बारिश के पैटर्न में बदलाव

‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ ने भारत में बारिश के पैटर्न में बदलाव को समझने के लिए जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, बार-बार सूखे और पानी की कमी का विश्लेषण करने के लिए माध्यमिक डेटा का उपयोग किया है. देश में मॉनसून की बारिश, 2016 तक पिछले छह वर्षों में से पांच में औसत से कम रही है और पूर्व मॉनसून ( मार्च से मई ) के मौसम में 2018 में लगातार तीसरे वर्ष औसत से 11 फीसदी कम बारिश देखी गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ये बदलाव लंबे समय के जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है. कुछ राज्यों ने सालाना होने वाली बारिश में बड़ा बदलाव देखा है. उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ में सालाना बारिश लगभग 10 फीसदी कम हो गई है, जबकि यह तटीय कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा में बढ़ी है. 1870 के बाद से मानसून की बारिश में कमी आई है, लेकिन मॉनसून से अलग बारिश बढ़ रही है, जो सालाना औसत को संतुलित करती है.

 

केरल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में 2017 मॉनसून के दौरान कम बरिश हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक 2014 और 2015 के खराब मानसून के परिणामस्वरूप आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ हिस्सों सहित देश के कई हिस्से में गंभीर सूखे की स्थिति और पानी की कमी बनी हुई है नतीजतन, मॉनसून के अंत ( अक्टूबर-2017 की शुरुआत में ) में प्रमुख जलाशयों में जल स्तर औसत से 11 फीसदी नीचे था.

कई राज्य कर रहे हैं पानी की कमी का सामना

देश भर में प्रमुख जलाशयों में स्तर, जैसा कि हमने कहा था, साल के इस समय सामान्य से 10 फीसदी कम है.

आंध्र प्रदेश में, जलाशय का स्तर लगभग सामान्य था, और राज्य के कुछ हिस्सों जैसे प्रकाशम, पीने के पानी के संकट का सामना कर रहे हैं. जल संकट के दौरान पीने का पानी उपलब्ध करान के  लिए सरकार 103 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संकट पड़ोसी राज्य तेलंगाना में पानी की कमी से जुड़ा हुआ है.

छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में, कुएं सूख गए हैं और लोगों को पानी लाने के लिए कई किलोमीटर चलना पड़ रहा है.

तमिलनाडु में, प्रमुख जलाशयों का जल स्तर सामान्य से 67 फीसदी नीचे है. प्रत्येक प्रमुख जलाशय वर्ष के इस समय के लिए औसत स्तर से नीचे है. संकट से निपटने के लिए राज्य ने आपदा राहत निधि से 200 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं. 2016-17 में, राज्य को सदी का सबसे बद्तर सूखे से सामना करना पड़ा है.

भारत के कई हिस्सों में मॉनसून पैटर्न में बदलाव की वजह से सूखे और बाढ़ की संभावना कई गुना ज्यादा बढ़ जाएगी. 2013 विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी भारत, झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में बार-बार सूखे की संभावना है.

drought_water crisis

‘एनवायरनमेंटल साइंस जर्नल’ में प्रकाशित 2015 के एक अध्ययन के मुताबिक गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदी बेसिन, जो 650 मिलियन से अधिक लोगों की जिंदगी से जुड़ा है, उन नदियों में भी तापमान बढ़ने पर अक्सर सूखे और बाढ़ की स्थिति आएगी.

जल संकट अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को बढ़ा सकता है

रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई हिस्सों में पानी की कमी भारत में अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को बढ़ावा सकती है. इनमें ये संघर्ष शामिल हैं:

- कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी विवाद

- आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना के बीच कृष्णा नदी विवाद - गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच नर्मदा नदी विवाद

- हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के बीच रवि और ब्यास नदी विवाद

-  हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के बीच रवि और ब्यास नदी विवाद

(भास्कर त्रिपाठी की इंडिया स्पेंड के लिए रिपोर्ट)

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