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क्या वाकई में 'नस्लभेदी' थे महात्मा गांधी!

गांधी को नस्लभेदी बताते हुए जो तर्क और लेख घाना यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और छात्रों ने याचिका में दिए हैं, उनमें सबसे अहम है अफ्रीकी नागरिकों के लिए 'काफिर' शब्द का इस्तेमाल करना

Updated On: Dec 16, 2018 09:32 PM IST

FP Staff

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क्या वाकई में 'नस्लभेदी' थे महात्मा गांधी!

पिछले दिनों अफ्रीकी देश घाना की राजधानी अक्रा स्थित एक विश्वविद्यालय के परिसर में से गांधी प्रतिमा को हटाया गया है. दो साल पहले भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उस मूर्ति का अनावरण किया था. दरअसल गांधी पर नस्लभेद का आरोप लगाते हुए यह मूर्ति हटाई गई है. यूनिवर्सिटी ऑफ घाना के विद्यार्थियों और शिक्षकों ने इसके लिए गांधी के लेखों का हवाला दिया था. लेकिन क्या गांधी वाकई में नस्लभेदी थे?

गांधी को नस्लभेदी बताते हुए जो तर्क और लेख घाना यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और छात्रों ने याचिका में दिए हैं. उनमें मुख्य है अफ्रीकी नागरिकों के लिए 'काफिर' शब्द का इस्तेमाल करना. दरअसल 'काफिर' शब्द को अफ्रीकी लोग बुरा मानते हैं. लेकिन गांधी ने अफ्रीकी नागरिकों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल साल 1894 के आसपास किया था. याद रहे कि गांधी साल 1893 में अफ्रीका गए थे. कई लोग गांधी के उस दौरान लिखे लेखों को नस्लभेदी बताते रहे हैं.

जेल में रहने के बाद गांधी में आया बदलाव

हालांकि इसके बाद गांधी ने अफ्रीका में भारतीयों के हकों के लिए प्रदर्शन किए. इसके चलते उन्हें कई बार जेल में भी डाला गया. इस दौरान उनकी मुलाकात कई अफ्रीकी नेताओं से हुई. गांधी की आत्मकथा लिखने वाले उनके पोते राजमोहन गांधी ने उनकी आत्मकथा में उनके नस्लभेदी व्यवहार पर भी लिखा है. उन्होंने लिखा है कि जेल में अफ्रीकी नेताओं के साथ कैद रहने के दौरान अफ्रीकी नागरिकों के प्रति गांधी की भावना में बदलाव आया था.

गांधी के आंदोलनों से ही प्रशस्त हुआ अश्वेत लोगों के आंदोलनों का मार्ग

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक राजमोहन गांधी कहते हैं कि गांधी भी एक अपूर्ण इंसान ही थे. हालांकि, गांधी का अफ्रिका में भारतीयों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के विरोध में आवाज उठाने के कारण ही अश्वेत लोगों के हकों के लिए आंदोलनों का मार्ग प्रशस्त हुआ था.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी गांधी पर दो किताबें लिखी हैं. जिनमें गुहा लिखते हैं कि 'उनका लेखन गांधी के विचार और अभ्यास की पूर्ण समझ के लिए महत्वपूर्ण हैं. इसी के साथ उनका कहना है कि गांधी के लिखे का मतलब तभी समझा जा सकता है जब हमें मालूम हो कि वह किस बात का जवाब दे रहे हैं.'

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