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विवेक तिवारी शूटआउट: जनता तय करे उसे कॉन्स्टीट्यूशनल स्टेट चाहिए या एनकाउंटर स्टेट

लखनऊ के विवेक तिवारी हत्याकांड ने बहुत बड़े सवाल खड़े किये हैं. तमाम सवाल डरावने और निराश करने वाले हैं.

Updated On: Oct 02, 2018 03:06 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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विवेक तिवारी शूटआउट: जनता तय करे उसे कॉन्स्टीट्यूशनल स्टेट चाहिए या एनकाउंटर स्टेट

घटना कितनी भी ह्रदय विदारक हो, उसके तमाशे में तब्दील होने में वक्त नहीं लगता है. लखनऊ के विवेक तिवारी हत्याकांड पर अब सस्ते सियासी हथकंडों और चटखारे की चादर लिपट चुकी है. यह चादर इतनी मोटी है कि किसी आम नागरिक के लिए उन बुनियादी सवालों की तरफ देख पाना मुश्किल है, जो विवेक की हत्या से पैदा हुए हैं.

मीडिया में खबर है कि विवेक की हत्या से यूपी का ब्राह्मण समाज विचलित है, इसलिए योगी सरकार ने डरकर मुआवजे और मृतक की पत्नी को नौकरी देने का एलान कर दिया है. सोशल मीडिया पर विमर्श तेज है-ऊंची जाति के होने की वजह से सरकार विवेक के मामले में संवेदनशीलता बरत रही है, वर्ना फर्जी एनकाउंटरों में तो लोग हर रोज मारे जा रहे हैं. कितने मामलों में मुआवजा मिल रहा है और कितने केस की जांच हो रही है?

विवेक तिवारी हत्याकांड में राजनीति अपने ढंग से चल पड़ी है. राजनेताओं ने पीड़ित परिवार के घर के चक्कर काटने शुरू कर दिए हैं. अखिलेश यादव ने विवेक की विधवा से मुलाकात की. मायावती ने यूपी सरकार को लानतें भेजीं. अलग-अलग पार्टियों के कई नेताओं ने कहा-योगी राज में ब्राह्मणों पर अत्याचार हो रहा है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक कदम आगे बढ़ते हुए योगी सरकार को हिंदू विरोधी तक करार दे डाला.

सबसे पहली बात यह है कि लखनऊ की इस घटना को एक आपराधिक कृत्य के तौर पर देखा जाना चाहिए. घटना में जाति का कोई एंगल ढूंढना नादानी है. नेताओं और अपराधियों के बीच एक बुनियादी अंतर यह होता है कि अपराधी सोशल इंजीनियरिंग नहीं करते. जाहिर है, विवेक तिवारी को गोली उनकी जाति पूछकर नहीं मारी गई होगी.

Vivek Tiwari death case

अब इससे जुड़ी दूसरी बात. इस हत्याकांड पर ज्यादा शोर क्यों है और एनकाउंटर के नाम पर हुई हत्याओं के बाकी मामले क्यों दब गए? यकीनन इसका जवाब मेनस्ट्रीम मीडिया के संपादकों को देना चाहिए और अगर हो सके तो आत्मावलोकन करना चाहिए. बड़ा शहर, ऊंचा ओहदा और सामाजिक हैसियत ये तमाम बातें आज के कॉमर्शियल मीडिया के लिए किसी घटना की कवरेज के मुख्य आधार होते हैं. इसलिए झुग्गी-झोपड़ी में होनेवाली रेप की खबरें कभी बड़ी नहीं बनतीं और महानगर में होनेवाली छेड़खानी कोई घटना भी नेशनल हेडलाइन बन जाती है. सोशल मीडिया पर चल रही बहसों में खुलकर कहा जा रहा है कि यूपी में एनकाउंटरों के कवरेज जातीय, राजनीतिक और धार्मिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित हैं. ये आरोप भी ऐसे हैं जिन्हें संपादकों को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

‘एनकाउंटर पॉलिसी’ सिस्टम के विफल होने की घोषणा है

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सफाई में कहा-विवेक तिवारी के साथ जो कुछ हुआ, वह एनकाउंटर नहीं था. राज्य के एक और वरिष्ठ मंत्री ने कहा-जहां एनकाउंटर होता है, वहां अपराधी मरते हैं, आम लोग नहीं. बहुत स्पष्ट है कि सीएम योगी और उनके मंत्री एनकाउंटर को एक बहुत पवित्र चीज मानते हैं. संभवत: यह आजाद भारत की पहली ऐसी सरकार है, जिसने एनकाउंटर को अपनी ऑफिशियल पॉलिसी बनाया है.

एनकाउंटर का अनुवाद करें तो मतलब निकलता है, मुठभेड़. यानी ऐसी स्थिति बने जब पुलिस और अपराधी आमने-सामने पड़ जाएं और दोनों तरफ से गोलियां चलें. लेकिन योगी आदित्यनाथ के लिए एनकाउंटर का मतलब शाब्दिक नहीं बल्कि वास्तविक है. व्यावहारिक तौर पर एनकाउंटर का मतलब होता है किसी भी संदिग्ध की घेरकर या पकड़कर उसकी हत्या कर देना. योगी के सवा साल के कार्यकाल में एनकाउंटर की करीब 1500 घटनाएं हो चुकी हैं. इनमें 66 कथित अपराधी मारे गए जबकि 700 के करीब घायल हुए.

योगी अपनी हर जनसभा में बड़े गर्व से बताते हैं कि उन्होंने पुलिस वालों को खुली छूट दे रखी है. इसकी वजह से अपराधियों के हौसले पस्त हो गए हैं और वे जमानत पर बाहर आने के बदले जेल में रहने में अपनी भलाई समझते हैं. पुलिस का मनोबल ऊंचा है और राज्य में अपराध का ग्राफ तेजी से घट रहा है. हकीकत यह है कि अब तक कोई ऐसा प्रमाणिक आंकड़ा नहीं है, जिससे यह साबित किया जा सके कि अपराध सचमुच घटे हैं.

यकीनन अपराध नियंत्रण सरकार का काम है. लेकिन अपराध नियंत्रण के लिए अपराध का सहारा नहीं लिया जा सकता है. यह अनैतिक ही नहीं, बल्कि गैर-कानूनी भी है. अगर सरकार एनकाउंटर को अपनी घोषित नीति बनाती है, तो इसका सीधा मतलब यही होता है कि वह मान चुकी है कि उसका पूरा तंत्र इतना नाकारा है कि अपराधी को गिरफ्तार करके न्याय सम्मत तरीके से उसे सजा नहीं दिलवा सकता है.

योगी के एनकाउंटर प्रेम का राज

vivek tiwari

उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ सोमवार को विवेक तिवारी के बच्चों से मिले. (पीटीआई)

साफ है कि सत्ता में आते ही आदित्यनाथ यह स्वीकार कर चुके थे कि सरकारी तंत्र भरोसे के लायक नहीं है. इसलिए एनकाउंटर का आसान रास्ता अख्तियार करना होगा. सवाल यह है कि प्रचंड बहुमत वाली सरकार के एक मुखिया ने ऐसा क्यों किया? इसका जवाब यह है कि योगी जनता की सोच भांपने में माहिर हैं और उन्हें गैर-कानूनी तौर-तरीकों से परहेज भी नहीं है.

यह पब्लिक परसेप्शन हमेशा से रहा है कि ईमानदार पुलिस वालों को सिस्टम काम नहीं करने देता है. वे बेचारे जान पर खेलकर अपराधियों को पकड़ते हैं और अपराधी अदालत से बरी हो जानते हैं. फिल्म जंजीर के एंग्री यंगमैन को याद कीजिए. जंजीर के इंस्पेक्टर विजय से लेकर सिंघम के बाजीराव तक सिनेमा ने जनता के मन में यह धारणा बहुत मजबूती से स्थापित की है कि अपराधियों की हत्या कर देने में कुछ गलत नहीं है.

योगी आदित्यनाथ जनता के इसी परसेप्शन से खेल रहे हैं. उन्हें लगता है कि अपराधियों या आपराधिक छवि वालों को मरवा देने से जनता में उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी. देखा जाए तो उनकी यह सोच पूरी तरह गलत साबित नहीं हुई है. सोशल मीडिया पर बहुत बड़ी तादाद में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो एनकाउंटर की हर खबर पर ताली बजाते हैं.

भारत के हर राज्य के पुलिस महकमे उसी तरह भ्रष्ट रहे हैं, जिस तरह बाकी सरकारी विभाग हैं. यूपी पुलिस तो हमेशा से बदनाम रही है. यह वही पुलिस बल है, जिसने हाशिमपुरा जैसे ना जाने कितने वीभत्स और बर्बर कारनामों को अंजाम दिया. ज़ाहिर है, योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आते ही पूरी पुलिस फोर्स गंगाजल से धुलकर पवित्र नहीं हो गई होगी.

फिर पुलिस को आंख मूंदकर नैतिकता की प्रतिमूर्ति मान लेने और कॉन्स्टेबल के हाथ में डंडे के बदले पिस्तौल थमा देने के पीछे क्या तर्क हो सकता है? हमारे सिस्टम में हर सरकारी आदमी की जवाबदेही कानून और संविधान के प्रति होती है, अपने आका के प्रति नहीं. क्या पुलिसवालों को मनमाने अधिकार देना राजनीति और पुलिस तंत्र के बीच एक अपवित्र गठजोड़ को मजबूत करना नहीं है?

यकीनन ऐसा ही है. पुलिसवालों को यह लगेगा कि गैर-कानूनी तरीके से किसी को मार देने से उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि पीछे राजनीतिक आका खड़े हैं. विवेक तिवारी हत्याकांड में अब तक मिले तथ्य बता रहे हैं कि यह घटना पुलिस के बढ़े हुए `मनोबल’ का ही नतीजा है. कॉन्स्टेबल ने विवेक से गाड़ी रोकने को कहा. विवेक ने गाड़ी आगे बढ़ा दी, जिससे कॉन्स्टेबल की बाइक का पहिया दब गया. कॉन्स्टेबल ने हवाई फायर करने के बदले सीधे उसके सीने में गोली उतार दी.

घटना के बाद आरोपी कॉन्स्टेबल ने जिस अकड़ के साथ मीडिया से बात की है, वह बहुत कुछ बताता है. आरोपी कॉन्स्टेबल को बचाने के लिए यूपी के पुलिस वालों का एकजुट होना, चंदा उगाहना, जांच को प्रभावित करने की कोशिश, ये तमाम बातें ऐसी हैं, जिनसे साफ पता चलता है कि `एनकाउंटर फोर्स’ बनने की कीमत वसूलने की कोशिश की जा रही है. यह पूरी स्थिति बहुत ज्यादा निराश करने वाली है.

पुलिस और कचहरी तंत्र को कौन बदलेगा?

Lucknow Vivek Tiwari Murder

मृतक विवेक तिवारी का शोकग्रस्त परिवार

पुलिस और कचहरी तंत्र आम आदमी को प्रताड़ित करने के दो सबसे बड़े उपकरण हैं. ये व्यवस्थाएं अंग्रेजों के समय से ही भ्रष्ट रही हैं. आजाद भारत में इनकी स्थिति और ज्यादा बिगड़ी. यह कोई किताबी बात नहीं, बल्कि एक ऐसा सच है, जिसे कोई भी आदमी महसूस कर सकता है.

आप अपने साथ हुए किसी आपराधिक मामले की एफआईआर करवा कर देख लीजिए, अंदाजा हो जाएगा कि पुलिस तंत्र किस तरह काम करता है. किसी निचली अदालत में आपका कोई केस पेंडिंग हो पता चल जाएगा कि बड़े बुजुर्ग कोर्ट-कचहरी से दूर रहने की हिदायत क्यों दिया करते थे. लूट की इन व्यवस्थाओं में अब तक कोई बदलाव इसलिए नहीं आया है, क्योंकि ये राजनीतिक तंत्र को सूट करते हैं.

मामला सिर्फ एक पार्टी या किसी एक सरकार का नहीं है. सरकारें आती-जाती रहती हैं. लेकिन इस देश में पुलिस रिफॉर्म की अब तक कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई है. पुलिस का भ्रष्ट और असंवेदनशील होना एक बात है. पुलिस की अपनी समस्याएं भी कम नहीं है. कम वेतन, जरूरत से ज्यादा काम और छुट्टी ना मिलना, समस्याएं एक नहीं अनगिनत हैं.

अगर योगी आदित्यानाथ यह कहते कि वे पुलिस तंत्र को बेहतर और मानवीय बनाएंगे. जांच एजेंसियों को इतना सक्षम बनाएंगे कि वे ज्यादा से ज्यादा अपराधियों के खिलाफ सबूत जुटाकर उन्हें सजा दिलवा सकें, तो यह एक बहुत बेहतर पहल होती. लेकिन इसके बदले उन्होंने जो रास्ता चुना है, वह पहले से कमजोर सिस्टम को दीमक की तरह खोखला कर रहा है. ज्यादा दुखद बात यह है कि यूपी सरकार की एनकाउंटर पॉलिसी पर केंद्र सरकार भी चुप है. बात बहुत साफ है, जनता जब तक सवाल पूछने शुरू नहीं करेगी, एनकाउंटर स्टेट कॉन्स्टीट्यूशनल स्टेट नहीं बन पाएगा.

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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