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तूतीकोरिन हत्याकांडः जब जनता गुस्से में होती है, सरकारें हिंसा का सहारा लेती हैं

तूतीकोरिन में जो हुआ उससे साफ है कि जब विरोध-प्रदर्शन का तरीका गांधीवादी हो, तो सिविल सोसायटी की साफ हवा, पानी और जमीन की मांग को नजरअंदाज कर दिया जाता है

T S Sudhir Updated On: May 24, 2018 10:31 AM IST

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तूतीकोरिन हत्याकांडः जब जनता गुस्से में होती है, सरकारें हिंसा का सहारा लेती हैं

सादे कपड़ों में मौजूद दो पुलिसकर्मियों द्वारा पुलिस की गाड़ी के ऊपर से अपनी राइफल के जरिए निशाना साधने का दृश्य तूतीकोरिन हत्याकांड के बारे में काफी कुछ बयां कर देता है. इन पुलिसकर्मियों के निशाने पर स्टरलाइट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोग थे. ये लोग बिना हथियारों के थे और गोली के बारे में उन्हें तनिक भी अंदाजा नहीं था.

शैतानी हरकतों के बारे में खुलासा करता वीडियो

समाचार एजेंसी एएनआई की तरफ से 22 मई की रात को जारी वीडियो के मुताबिक, एक शख्स की आवाज (शायद एक अन्य पुलिसकर्मी) के जरिए इस डरावने कारनामे का पूरा ब्योरा पेश किया गया है. चेन्नई के रहने वाले विजयवीरप्पन स्वामीनाथन को सबसे पहले इस आदेश (इसकी आवाज काफी मध्यम थी) के बारे में पता चला. इसके जरिए खुलासा हुआ कि मौतों का यह मामला पूर्व-नियोजित था.

आप इस आदेश को सुन सकते हैं, जो शैतानी किस्म का था. यह आदेश तमिल में कमांडो को दिया गया था. इसमें कहा गया था, 'कम से कम एक शख्स मरना चाहिए.' बीते मंगलवार का दिन खत्म होने तक तूतीकोरिन में 11 लोग मारे जा चुके थे और मारे गए ज्यादातर लोगों के शवों पर गोलियों के निशान उनके पेट से ऊपर में थे.

'सामूहिक हत्या' या 'प्रायोजित आतंकवाद'

विपक्षी नेताओं के मुताबिक, इस तरह के रवैये को 'सामूहिक हत्या' या सरकार 'प्रायोजित आतंकवाद' के अलावा और कुछ कहना उचित नहीं होगा. यह ऐसी शासन व्यवस्था है, जहां राज्य या सरकार की तरफ से अपनी ही जनता पर ही बंदूक तान दिया जाता है और जहां मृत पक्षियों की तरह पुरुषों और महिलाओं के गिरने का सिलसिला शुरू होने पर सरकारें एक-दूसरे पर दोषारोपण की राजनीति का खेल शुरू कर देती है.

Sterlite

बुधवार को #TNJallianwalaBagh ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा था. ऐसी स्थिति में कोई भले ही असहाय महसूस करे, लेकिन मौजूदा घटना के मद्देनजर मानसिक हालत को बयां करने के लिए 99 साल पहले भारत के एक हिस्से में हुई भयंकर त्रासदी को याद करना डरावना अहसास है.

कोर्ट के आदेश के बाद भी सोती रही तमिलनाडु सरकार

इस बात में कोई शक नहीं कि प्रदर्शन हिंसात्मक हो गया. भीड़ ने जिला मुख्यालय में उत्पात मचाया, खिड़कियों के दरवाजे तोड़ डाले और गाड़ियों व फाइलों में आग लगा दी. क्या प्रदर्शन स्थल के बाहर (आसपास) चरमपंथी तत्व मौजूद थे, जिन्होंने आंदोलन में घुसपैठ कर मुश्किल और बढ़ा दी? हम इस बारे में नहीं जानते. खुफिया सूत्रों के माध्यम से मिली जानकारी में भी ऐसे तत्वों की मौजूदगी के संकेत दिए गए थे.

यहां तक कि मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने भी संकट पैदा होने की आशंका के बारे में चेतावनी दी थी. इसके बावजूद तमिलनाडु सरकार सोती रही. प्रदर्शन स्थल पर 20,000 लोगों की भीड़ से निपटने के हिसाब से पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती पूरी तरह नाकाफी थी. उन्हें शायद इस तथ्य से भरोसा मिला कि अगर हालात बेकाबू हुए, तो जाहिर तौर पर राइफल उनके हाथ में होगी ही.

उनके होठों पर थी मौत की ‘कामना’: 'कम से कम एक मरना चाहिए'

पुलिस मैन्युअल में पूरी तरह से यह साफ किया गया है कि फायरिंग का मामला सबसे आखिरी विकल्प है. अगर भीड़ मौखिक आदेशों, आंसू गैस, लाठीचार्ज जैसे उपायों से तितर-बितर नहीं होती है, तो वैसी स्थिति में सबसे पहले पुलिसकर्मियों को पानी की बौछारों का व्यापक तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए.

अगर ऊपर जिक्र गए तमाम उपाय अप्रभावी रहते हैं, तो पुलिस को मेगाफोन के जरिए यह ऐलान करना होता है कि वह फायरिंग करेगी. उसे हवा में या फिर लोगों के कूल्हे के नीचे फायरिंग करनी चाहिए. या उसे एहितायत के तौर पर रबड़ की गोली का इस्तेमाल करना चाहिए. हालांकि, दुर्भाग्य से तमिलनाडु स्थित तूतीकोरिन की पुलिस ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की तरह बर्ताव किया और निर्मम तरीके से लोगों की हत्या कर दी.

Tuticorin, Photo Source_ Twitter

इस प्लांट को लोग दानव जैसा करार देते हैं

ऐसी बात नहीं थी कि सरकार को विरोध-प्रदर्शन के 100वें दिन के बारे में पता नहीं था. यहां सवाल यह है कि रिटायर्ड जज अरुणा जगदीसन की अगुवाई में होने वाली न्यायिक जांच सिर्फ जिला प्रशासन पर दोष तय करेगी या इसके दायरे में राज्य के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी आदि भी होंगे. क्या तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी ने जिला मंत्री और कलक्टर को इस बारे में बताया कि हालात से किस तरह से निपटना है? हम बस इतना जानते हैं कि ई. पलानीस्वामी पिछले हफ्ते ऊटी में फूलों के एक शो का उद्घाटन कर रहे थे.

हालांकि, स्टरलाइट के खिलाफ तूतीकोरिन के लोगों की लड़ाई इसी साल शुरू नहीं हुई है. पिछले 20 साल से भी ज्यादा से यहां के स्थानीय लोग अपने आसपास के इलाके में यूनियन कार्बाइड के प्लांट के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. इस प्लांट को वे लोग दानव जैसा करार देते हैं.

भ्रष्टाचार के कारण तमिलनाडु में लगा स्टरलाइट

दरअसल, इस प्लांट को मूल रूप से महाराष्ट्र और गोवा में लगाने की योजना तैयार की गई थी, लेकिन दोनों राज्यों में पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के विरोध-प्रदर्शन के कारण इस प्लांट को तमिलनाडु में शिफ्ट कर दिया गया. तमिलनाडु राज्य से जुड़ी क्षेत्रीय पार्टी पीएमके के नेता अंबुमणि रामदास का आरोप है कि भ्रष्टाचार के कारण तमिलनाडु ने 1990 के दशक में स्टरलाइट की मेजबानी के लिए सहमत होने का फैसला किया.

एक के बाद एक आने वाली सरकारों और पर्यावरण से संबंधित विभागों और अधिकारियों ने भी तूतीकोरिन की आवाज सुनने पर ध्यान नहीं दिया है. तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मार्च 2013 में हानिकारक गैस के लीकेज के बाद प्लांट को बंद कर दिया था. हालांकि, महज तीन महीने के बाद राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने इस यूनिट के फिर से खोले जाने का आदेश सुना दिया.

प्लांट के कारण तूतीकोरियन ने चुकाई है बड़ी कीमत

तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस साल 31 मार्च को प्लांट के संचालन के लिए सर्टिफिकेट का रिन्यूअल करने से मना कर दिया और प्लांट बंद किया जा चुका है. हालांकि, स्थानीय लोग स्टरलाइट के प्रभाव से भलीभांति वाकिफ हैं और वे इस प्लांट को स्थायी रूप से बंद कराना चाहते हैं. राजनीतिक वर्ग इस मुद्दे पर गांव वालों को जोड़ने में नाकाम रहा. साथ ही, नेता गांव वालों को यह बात भी समझाने में असफल रहे कि उनका हित सबसे ऊपर है. जाहिर तौर पर तूतीकोरियन ने बड़ी कीमत चुकाई है.

Tuticorin, Photo Source_ Twitter (1)

इसके अलावा, न्यायिक आयोग को लेकर भी भरोसे का संकट है. लोगों द्वारा इसे समय खपाने की तरकीब के तौर पर देखा जाता है. मिसाल के तौर पर जल्लीकट्टू मामले में मरीना पर हुए बवाल के बाद जनवरी 2017 में चेन्नई और तमिलनाडु के अन्य हिस्सों में कानून-व्यवस्था की हालत गड़बड़ाने की वजहों और परिस्थितियों की जांच के लिए न्यायमूर्ति एस राजेश्वरन को नियुक्त किया गया था. उन्हें जांच रिपोर्ट सौंपने के लिए तीन महीने का वक्त दिया गया था. इस रिटायर्ड जज ने इस साल जनवरी में कहा कि उन्हें इस बाबत जांच रिपोर्ट सौंपने में एक साल का और वक्त लगेगा.

ग्रुप ने मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को दोगुना करने की बनाई थी योजना

बीते मंगलवार को हुई हिंसा के बाद मद्रास हाई कोर्ट द्वारा तूतीकोरिन में स्टरलाइट के दूसरे कॉपर स्मेल्टर प्लांट पर फिलहाल रोक लगाया जाना जीत जैसा मामला है. ग्रुप ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को दोगुना करते हुए इसे 8 लाख मैट्रिक टन सालाना करने के लिए 2,500 करोड़ के निवेश की योजना तैयार की थी. स्थानीय लोगों को इसमें ज्यादा लोगों को नौकरियां देने का प्रलोभन दिया गया था. फिलहाल ग्रुप में ऐसी 1,200 नौकरियां हैं, जिन्हें बढ़ाकर 2,000 तक करने की पेशकश की गई थी.

हालांकि, सौदा बेहद खतरनाक था. इसके बदले में कैंसर, त्वचा की बीमारियां, सांस लेने की समस्या, लोगों का अक्सर बीमार रहना, भूजल संक्रमण जैसी मुश्किलों को न्योता. संक्षेप में कहें, तो इसके कारण धीरे-धीरे मौत को बुलावा का मामला था.

यह भारत में शासन व्यवस्था की गुणवत्ता को लेकर टिप्पणी है. इससे साफ है कि जब विरोध-प्रदर्शन का तरीका गांधीवादी हो, तो सिविल सोसायटी की साफ हवा, पानी और जमीन की मांग को नजरअंदाज कर दिया जाता है. हाशिए पर धकेल दिए जाने पर जब गुस्सा जब तर्क और विवेक से परे हो जाता है, तो सरकार मौत के वारंट के रूप में जवाब देती है.

'कम से कम एक मरना चाहिए' का मतलब सिर्फ तूतीकोरिन के प्रदर्शनकारियों से नहीं था. लंबी अवधि में हम सभी मर जाएंगे.

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