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विनोद खन्ना अलविदा: श्याम अब नहीं आएगा छेनू

विनोद खन्ना को याद करते हुए विनोद याद ही नहीं आते. श्याम याद आता है

Satya Vyas Updated On: Apr 27, 2017 06:45 PM IST

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विनोद खन्ना अलविदा: श्याम अब नहीं आएगा छेनू

विनोद खन्ना उंगली पर गिने जा सकने वाले उन कलाकारों में से थे जिन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत खल-चरित्रों से की थी. 1968 में सुनील दत्त ने अपने भाई सोम दत्त को बतौर नायक फिल्म ‘मन का मीत’ में पेश किया था. इस फिल्म से ही विनोद खन्ना ने बतौर खलनायक अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत की थी.

फिल्म भी खो गयी. सोम भी खो गए हुआ क्या?

विनोद के हाथ पंद्रह फिल्में आईं. इसके बाद भी पूरब और पश्चिम, आन मिलो सजना जैसी फिल्मों मे उन्होने छोटे-मोटे खल-चरित्र ही निभाए. लेकिन अपने कसरती बदन, बुलंद आवाज और अभिनय क्षमता के कारण विनोद खन्ना ने नायकों की जमात में सेंध लगा ही ली. ‘यूनानी देवता’ सरीखे जैसे विशेषण का प्रयोग पहली दफा उनके लिए ही सुना गया.

अपनी आकर्षक देहयष्टि और अभिनय क्षमता के बावजूद विनोद खन्ना दूसरे दर्जे के निर्माताओं की पसंद ही बने रहे. उन्हे अक्सर मार-धाड़ वाली फिल्में मिलती रहीं.

पहले दर्जे के निर्देशकों ने उन्हें दो नायकों वाली फिल्मों के काबिल ही समझा. फिर भी उनकी सफलता का अंदाज इसी बात से लगता है कि सत्तर के दशक में दो ही तरह की युगल हीरो वाली फिल्में बनती थीं. एक वह जिसमें विनोद खन्ना होते थे और दूसरी वह जिसे विनोद खन्ना मना कर चुके होते थे.

विनोद के किरदार सबसे अलग होते थे

आलम यह था कि उस वक्त पहले विनोद चुन लिए जाते थे उसके बाद अमिताभ, शशि, राजेश या फिर दूसरे नायक अनुबंधित किए जाते थे. परवरिश, हेरा-फेरी, कच्चे धागे, द बर्निंग ट्रेन, अमर-अकबर-एंथोनी इत्यादि ऐसी ही फिल्में है.

विनोद खन्ना के अभिनय कौशल की दुर्लभता यह थी कि वह एक ही वक्त में पुलिस-इंस्पेक्टर और डकैत की भूमिका में बराबर जंचते थे और कुशलता से करते थे. सुनील दत्त के बाद विनोद खन्ना ही ऐसे अदाकार हुए जिसने डकैत की भूमिका को पर्दे पर जीवंत किया. सत्तर के अंतिम सालों मे विनोद खन्ना की तुलना सेकेंड की सूईयों से की जाती थी. साथी कलाकार उन्हें ‘ज़िन्नात’ भी कह देते थे. क्योंकि वह एक ही दिन में तीन से चार फिल्म स्टुडियो में शूट कर लेते थे.

उनके आकर्षण का आलम यह था कि मध्यवर्गीय परिवारों को सन् 80 में आई फिल्म कुर्बानी देखने की मनाही थी. कारण दबी जबान यह दिया जाता था कि लड़के, ज़ीनत को देख कर बिगड़ सकते हैं और लड़कियां उस नामुराद विनोद खन्ना को. खैर, इन्हीं दिनों मे अपने करियर के उरुज पर रहते हुए. विनोद, दर्शन की तरफ मुड़े और ओशो के सानिध्य में आए. फिल्मोद्योग सकते में डाल कर विनोद ने सन्यास तो लिया मगर ज्यादा वक्त टिक नहीं पाए. चार साल बाद ही उन्होंने वापसी की.

तब तक टेलीविजन क्रान्ति आ गई थी और बिलबोर्ड, होर्डिंग इत्यादि सिमट कर टीवी का पर्दा हो रहा था. व्यवसायियों को भी इसमें अवसर दिखने लगा था.

गोदरेज़ कंपनी ने जब भारत में पहली दफा ‘मर्दों के साबुन’ के नाम से उत्पाद निकालने का मन बनाया तो प्रचार के लिए विनोद ही चुने गए. अपने मर्दाना इमेज के कारण.

यहां यह बताना लाजमी है की तब तक अनिल कपूर, जैकी,मिथुन जैसे नए उम्र के कलाकार पांव जमा चुके थे.

यह आश्रयजनक परंतु सत्य है कि चालीस साल लंबे शो-बिज में विनोद का नाम किसी भी अभिनेत्री के साथ गंभीरता से नहीं जुड़ा. एक अफवाह के तौर पर अमृता सिंह का नाम लिया जा सकता है मगर सिर्फ अफवाह के तौर पर. दूसरी पारी में भी विनोद खन्ना ने उसी लगन के साथ काम शुरू किया और वह जो पहले दर्जे के फिल्मकर रह गए थे वो अब जुड़ने को लालायित हुए.

इस दौर में विनोद ने सभी बड़े नामों जैसे यश चोपड़ा, यश जौहर, महेश भट्ट, जे पी दत्ता इत्यादिवके साथ फिल्में की.

एक पल में खलनायकी गुस्सा और दूसरे ही अबोध भावना मिला देने की जो कुशलता विनोद खन्ना में थी, वह उनके पहले और उनके बाद किसी भी अदाकार में देखने को नहीं मिली. यही कारण है कि वो राज खोसला और गुलजार जैसे विविधता वाले निर्देशकों के प्रिय बने रहे.

विनोद खन्ना सितारा थे. सितारों के बीच ही ओझल हो गए हैं. बचा क्या?

विनोद खन्ना को याद करते हुए विनोद याद ही नहीं आते. श्याम याद आता है और लगता है कि छेनू अब कहेगा- 'श्याम आए तो कह देना छेनू आया था.‘

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