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विनोद खन्ना अलविदा: एक सितारा जो बेवफा निकला

विनोद खन्ना जीवन भर परिवार, समाज और संसार से भागते रहे

Mridul Vaibhav Updated On: Apr 27, 2017 06:09 PM IST

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विनोद खन्ना अलविदा: एक सितारा जो बेवफा निकला

विवादों के स्टार रहे सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री विनोद खन्ना जीवन भर परिवार, समाज और संसार से भागते रहे. और अंतत: थक गए. कॉलेज के दिनों की प्रेमिका, जो बाद में पत्नी बनी. और उनके दो प्यारे बच्चों की मां. वे उससे भी भागते रहे और अपने बच्चों से भी.

आखिर विनोद खन्ना ने ऐसा क्यों किया?

विनोद खन्ना भारतीय सिनेमा और सियासत का एक बड़ा नाम हैं. लेकिन कल्पना कीजिए उस शख्स के बारे में जो अपनी जीवन संगिनी को ऐसे समय छोड़कर आेशो के पास चला जाए, जिसके गोद महज नौ महीने का एक बेटा हो और दूसरा महज ढाई साल का हो.

भागते रहे तो तुम क्या पाओगे?

प्रसिद्ध गीतकार केदार शर्मा ने ठीक ही लिखा था कि संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे. इस लोक को भी अपना ना सके, उस लोक में भी पछताओगे. मानों ये पंक्तियां विनोद खन्ना के लिए ही लिखी गई हों.

अक्षय खन्ना महज 9 महीने के थे जब विनोद खन्ना अमेरिका में आेशो के आश्रम चले गए. विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को हुआ था. भारत विभाजन के दौरान विनोद खन्ना बमुश्किल 10 महीने के थे. विभाजन के बाद उनके माता-पिता को पेशावर छोड़कर मुंबई आना पड़ा.

किस्मत में सिर्फ खंडन ही क्यों था?

विभाजन की इस त्रासदी ने उनका जीवन भर पीछा नहीं छोड़ा. वे एक खंडित कलाकार, खंडित पति, खंडित पिता, खंडित संन्यासी और खंडित सियासतदां का जीवन जीते रहे. शायद यह विखंडन की त्रासदी ही थी कि वे भारत और पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों को तो सुधारने की कोशिश करते रहे लेकिन अपना परिवार नहीं जोड़ पाए.

ओशो के आश्रम से लौटने के बाद उन्होंने ना तो अपने टूटे परिवार को जोड़ा और न ही पत्नी की सुध ली. अपने लोकसभा क्षेत्र गुरदासपुर की भी खैरखबर वो कम ही लिया करते थे.

कितने नंबर मिले? 

लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के कामकाज का आकलन रखने वाली संस्था पीआरएस इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस लोकप्रिय और खूबसूरत फिल्म स्टार का राजनीतिक हिसाब-किताब बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता.

जैसे वे अमिताभ बच्चन के सहनायक हुआ करते थे, वैसे ही वे सियासत में भी बहुत आगे नहीं बढ़ सके. लोकसभा में उनकी उपस्थिति 50 प्रतिशत ही रहती. जबकि औसत उपस्थिति 80 प्रतिशत से अधिक है.

वादविवाद में उनकी भागीदारी महज सात प्रतिशत रही. जबकि सांसद औसतन 50 प्रतिशत से अधिक डिबेट करते हैं. हमारी लोकसभा के सासंद औसतन 199 प्रश्न पूछते हैं. जबकि विनोद खन्ना ने इस पूरे सत्र में एक भी प्रश्न नहीं किया. प्राइवेट बिल रखना या लोगों की समस्याएं उठाना और उनको हल करना तो बहुत दूर की बात है.

कलाकार बनना शौक नहीं जुनून था

विनोद खन्ना ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे. वे अंडरग्रेजुएट थे. मुगले आजम फिल्म ने उन्हें सिनेमा के प्रति आकर्षित किया. फिल्मों में काम करने को लेकर उनके पिता ने उनकी कनपटी पर बंदूक तान दिया. लेकिन उनका जुनून कम नहीं हुआ.

एक सहृदय मां की गोद में पले-बढ़े इस प्रतिभाशाली कलाकार के चेहरे में ऐसा सम्मोहन था कि वह हर किसी को आकर्षित कर लेते थे. संभवत: यही कारण है कि कॉलेज के दिनों में उनकी गर्लफ्रेंड्स की तादाद बहुत हुआ करती थी. मिचमिची सी आंखों में न जाने ऐसा क्या था कि वह हर किसी को अपनी तरफ खींच लेते थे.

स्कूल के दोस्त से की पहली शादी

गीतांजलि उनकी स्कूल के दिनों की दोस्त थी और उनसे उन्होंने शादी भी की. राहुल और अक्षय की मां गीतांजलि उस समय टूट गईं, जब विनोद ने अपने फिल्मी करियर को उस वक्त अलविदा कह दिया, जब वे लोकप्रियता के चरम पर थे.

इन दिनों उनके दोनों बच्चे बहुत छोटे थे. उन्हें पिता की बहुत आवश्यकता थी. अपना घर परिवार छोड़कर विनोद अमेरिका में ओशो के रजनीशपुरम् की शरण ले ली.  वे आश्रम के बगीचे के माली हो गए. उनका ऐसा करना परिजनों को ही नहीं, प्रशंसकों को भी बहुत बुरा लगा. वे रजनीशपुरम् में माली का काम करते थे.  वहां के टॉयलेट साफ करते. अोशाे के जूझे बर्तन मांजते और उनके मैले वस्त्र धोते.

परिवार के लिए मुश्किल था वक्त

उनके परिवार और बच्चों के लिए यह बहुत कठित दौर था. राहुल और अक्षय जिन दिनों स्कूल में पढ़ रहे थे, दूसरे बच्चे उन्हें परेशान करते और चिढ़ाते कि तुम्हारा बाप तो रजनीश के आश्रम भाग गया. यह बात विनोद खन्ना अपने इंटरव्यू में बताते थे.

लेकिन रजनीशपुरम् में उनका यह अस्थायी संन्यास ज्यादा दिन नहीं चला और महज चार साल बाद ही उनका ओशो से मोहभंग हो गया. अोशो ने विनोद से कहा कि वे भारत वापस जाकर उनका पुणे आश्रम संचालित कर लें. लेकिन विनोद फिल्मी दुनिया में वापस आए और खुद को स्थापित किया.

विनोद खन्ना एक बार फिर सफल स्टार बने. निजी जीवन में भी उन्होंने नई शुरुआत की. अपनी पहली पत्नी गीतांजलि को तलाक देकर उन्होंने कविता दफ्तरी से शादी कर ली, जिनसे उनके एक बेटा और बेटी हैं.

ये कैसा संयोग?

यह कैसा संयोग है कि विनोद कभी ओशो के शिष्य थे. वहीं उनकी पत्नी कविता अब श्रीश्री रविशंकर की भक्त हैं. इसके बाद उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ली और गुरदासपुर से लगातार सांसद रहे.

एक स्टार जो संडे को करता था छुट्टी

विनोद फिल्म इंडस्ट्री में उन दिनों शशि कपूर के बाद अकेले ऐसे कलाकार थे जो रविवार को काम नहीं किया करते थे.

यह समय अपने परिवार के साथ बिताते थे. उनकी पहली फिल्म मन का मीत थी. पहली फिल्म से ही यह बंदा लोगों के मनों का मीत बन गया. हालांकि कई बार बेवफाइयां भी की. देखिए न, आज भी ऐसे समय सबसे बेवफाई करके चलता बना.

अब आप मानें या न मानें, लेकिन अपने जमाने के इस सम्मोहक स्टार ने सियासत और जिंदगी दोनों को मुफलिस की कबा बना डाला, जिसमें उनके चाहने वालों को हर घड़ी दर्द के पैबंद लगाने पड़ते थे. भले वह उनकी स्कूल के दिनों की दोस्त पत्नी हो, उनके नन्हे बच्चे हों या फिर उनके गुरदासपुर चुनाव क्षेत्र की जनता.

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