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J&K बॉर्डर और LoC पर जिंदगी दुश्वार, हर तरफ मौत और तबाही का मंजर

2017 में भारतीय सेना के ऑपरेशनल कंट्रोल के तहत एलओसी पर 10 दिसंबर तक 771 बार सीजफायर का उल्लंघन किया गया. जबकि, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 110 बार सीजफायर का उल्लंघन हुआ

Updated On: Jan 29, 2018 11:46 AM IST

Sameer Yasir

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J&K बॉर्डर और LoC पर जिंदगी दुश्वार, हर तरफ मौत और तबाही का मंजर
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जम्मू-कश्मीर सीमा और नियंत्रण रेखा (LoC) पर पाकिस्तान की ओर से सीजफायर का उल्लंघन बदस्तूर जारी है. लेकिन पिछले एक हफ्ते से बॉर्डर पर गोलीबारी में जबरदस्त इजाफा हुआ है. सीमा पार से तकरीबन रोजाना ही वक्त-बेवक्त भारतीय गांवों और चौकियों पर फायरिंग हो रही है. पाकिस्तान की इस नापाक हरकत से स्थानीय लोगों का जीना मुहाल हो गया है. मौत रोज गांववालों के सिर पर नाचती है. लिहाजा जिंदगी बचाने के लिए लोग अपना घर-बार और मवेशियों को बेसहारा छोड़कर सुरक्षित जगहों पर शरण लेने को मजबूर हो गए हैं.

फौजिया बी की ही दास्तान सुनिए, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित जम्मू के जोरा फार्म गांव की रहने वाली हैं. भयंकर गोलीबारी के बीच फौजिया बी गांव में अपनी खोई हुई बकरी की तलाश में निकल पड़ी हैं. अपनी जिंदगी की परवाह किए बगैर फौजिया बी गांव की गलियों में किसी पागल की तरह दौड़ती-भागती नजर आ रही हैं. बंदूकें अपेक्षाकृत खामोश होने या यूं कहें कि गोलीबारी हल्की होने पर फौजिया बी अपने पति को भी बकरी खोजने के लिए मजबूर कर देती हैं.

गांव की ओर जाने वाली सड़क सुनसान है. हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है. सिर्फ सड़क पर चल रहे घोड़े की टापों की आवाज से भयानक खामोशी टूट रही है. कुछ किलोमीटर आगे, गांव के बच्चों की एक टोली गणतंत्र दिवस का जश्न मना रही है. टोली का एक बच्चा खुद को तिरंगे में लपटेकर सेल्फी ले रहा है. जबकि दूसरा बच्चा एक और तिरंगे झंडे को एक पेड़ पर फहराने की कोशिश कर रहा है. बच्चों की इस टोली के नजदीक से ही हाजी सैफुल्लाह का गुजरना हो रहा है. वह अपनी बेटी और पत्नी फौजिया के साथ घोड़ा गाड़ी पर सवार हैं.

गोलीबारी के बाद खंडहरों की तरफ लौटते हैं परिवार

68 साल के हाजी सैफुल्लाह परिवार समेत धीरे-धीरे अपने गांव की ओर जा रहे हैं. जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पिछले दिनों जैसे ही बंदूकों और तोपों ने गरजना शुरू किया था, वैसे ही सैफुल्लाह परिवार समेत घर-द्वार छोड़कर भाग खड़े हुए थे. जान बचाने के लिए उन्होंने महफूज जगह पर पनाह ले रखी थी. फिलहाल गोलीबारी कुछ देर को थमी हुई है. लिहाजा पत्नी फौजिया के कहने पर उन्होंने अपने घर की सुध लेने की हिम्मत जुटाई है. गोलीबारी शुरू होने के बाद वह पहली बार अपने गांव लौट रहे हैं.

जोरा फार्म में हुआ विनाश दूर से ही दिखाई दे रहा है. तोप के गोलों की ज़द में आकर इस छोटे से गांव के लगभग सभी घर तबाह-ओ-बर्बाद हो चुके हैं. घास-फूस के छप्पर (छतें) जलकर राख में तब्दील हो चुके हैं. पूरा गांव धूसर रंग की मिट्टी का ढेर नजर आ रहा है.

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हाजी सैफुल्लाह ने गांव पहुंचकर जैसे ही अपना घर देखा, तो वह घोड़ागाड़ी से उछल पड़े और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे. हाजी सैफुल्लाह के साथ उनकी बेटी और पत्नी ने भी ज़ार-ओ-कतार रोना शुरू कर दिया. आंखों में आंसू भरे सैफुल्लाह ने मलबे के एक ढेर की तरफ इशारा करते हुए कहा, 'यह हमारा घर था.'

सारी कमाई और दस्तावेज राख

हाजी सैफुल्लाह ने मलबे में तब्दील हो चुके अपने घर से काफी मशक्कत के बाद एक ट्रंक ढूंढ निकाला. इस ट्रंक में सैफुल्लाह ने कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज संभाल कर रखे थे. लेकिन वह सभी दस्तावेज आग में जलकर राख हो चुके थे. दस्तावेज जल जाने से सैफुल्लाह को गहरा सदमा लगा. वह अपने टूटे-फूटे और जल चुके घर के कभी एक छोर को देखते, तो कभी दूसरे छोर को. फिर किसी दीवाने की तरह बार-बार राख के ढेर को उलटने-पुलटने लगते. आखिर में, रोते-रोते वह फ़र्स्टपोस्ट से बोले, 'हमने अब तक जो कुछ भी कमाया-बचाया और हिफाजत से संभाल कर रखा था, वह सब अब राख में तब्दील हो चुका है.'

फोटो क्रेडिट- समीर यासिर.

फोटो क्रेडिट- समीर यासिर.

हालांकि, फिलहाल पाकिस्तानी सैनिकों की तरफ से भारतीय गांवों पर मोर्टार शेलिंग (तोप से गोलाबारी) काफी कम हो गई है, लेकिन दोनों ओर से गोलियों की बारिश अब भी जारी है. लेकिन जब बंदूकें भी खामोश हो जाती हैं, तब इसका मतलब यह नहीं होता है कि पाकिस्तान से लगी 200 किलोमीटर लंबी सीमा पर और कश्मीर को विभाजित करने वाली 770 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा पर शांति स्थापित हो गई है.

सैफुल्लाह के मुताबिक, 'शांति हमारे लिए एक मनोदशा बन गई है. हम गांववाले जब घर पर अपने बच्चों के साथ शाम का भोजन करने बैठते हैं, तब हमेशा यह आशंका लगी रहती है कि, तोप का गोला कभी भी आकर हमारे ऊपर गिर सकता है और हम सब मारे जा सकते हैं. हम हमेशा मौत के साए में जीते हैं. हमारे लिए शांति का यही मतलब है.' उन्होंने आगे कहा कि 1962 के युद्ध के बाद से उनका परिवार और बाकी गांववाले कभी वास्तविक शांति में रह ही नहीं पाए.

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सैफुल्लाह ने अपना दर्द बयान करते हुए कहा कि, 'हम यकीनन दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में से हैं, जो तकरीबन हर दिन यह उम्मीद और दुआ करते हैं कि जो घर उन्होंने सुबह बनाए हैं, वह शाम को किसी तोप के गोले से तबाह न हो जाएं. हमारी जिंदगी की यही कहानी है. हम बिना घर के घरवाले हैं, यानी हमारे पास घर है भी और नहीं भी.'

भारतीय और पाकिस्तानी सेना दोनों ही शाप

जोरा फार्म गांव पाकिस्तान से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा से 500 मीटर से भी कम दूरी पर स्थित है. इस गांव में मुस्लिम गुज्जरों के करीब 250 परिवार आबाद हैं. यह सभी परिवार भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच सैंडविच बन गए हैं. या यूं कहें कि दो देशों की सेनाओं के बीच पिस रहे हैं. गांववालों पर हमेशा मौत मंडराती रहती है और वह सैनिकों के रहमो-करम पर जिंदा रहते हैं. अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा के किनारे बसे सैकड़ों गांवों के हालात लगभग एक जैसे ही हैं. वहां के लोग भी जोरा फार्म गांव के निवासियों की तरह ही हर पल खौफ के साए में जीते हैं. इन लोगों के भी मन की शांति और सारी पूंजी तोप के एक गोले से राख के ढेर में तब्दील हो जाती है. भले ही वह गोला भारतीय सेना ने दागा हो या पाकिस्तानी सेना ने. जान और माल का सबसे ज्यादा नुकसान तो बॉर्डर पर बसे गांववालों को ही उठाना पड़ता है.

जोरा फार्म गांव पाकिस्तानी सैनिकों के छोटे हथियारों की फायरिंग रेंज में आता है. संकट के समय में, प्रशासन और सुरक्षाबल अक्सर गांव खाली कराकर लोगों को बुलेटप्रूफ बंकरों में पहुंचा देते हैं. जबकि ज्यादातर गांववालों को गोलीबारी के बीच रेंगते हुए अपने घर छोड़कर भागना पड़ता है.

कानाचक गांव में भारी गोलीबारी के चलते बख्तरबंद गाड़ी में गांववालों को सुरक्षित स्थान पर ले जाते जम्मू कश्मीर पुलिस के जवान

कानाचक गांव में भारी गोलीबारी के चलते बख्तरबंद गाड़ी में गांववालों को सुरक्षित स्थान पर ले जाते जम्मू कश्मीर पुलिस के जवान

गांव के प्रवेश द्वार पर एक रिहायशी घर की सफेद दीवार गोलियों से छलनी हो चुकी है. दीवार पर लगे गोलियों के अनगिनत निशान इस बात के गवाह हैं कि दो देशों के सैनिकों ने एक दूसरे के ठिकानों पर कितनी शिद्दत के साथ गोलीबारी की होगी. गोलियों के निशान इस बात की भी गवाही दे रहे हैं कि दोतरफा गोलीबारी के दौरान गांव में कितना भयंकर तनाव फैल गया होगा. गांव के घरों की दीवारों के एक तरफ भारतीय पोस्ट पड़ती हैं और दूसरे तरफ पाकिस्तान ने अपनी पोस्टें बना रखी हैं.

विचित्र बात यह है कि जोरा फार्म गांव के घरों की जिन दीवारों का रुख पाकिस्तानी पोस्टों की ओर है, उन दीवारों को कम नुकसान पहुंचा है. जबकि जिन दीवारों का रुख भारतीय पोस्टों की ओर है, वह ज्यादा क्षतिग्रस्त हुई हैं. सैफुल्लाह ने बताया कि, 'जब भारतीय सुरक्षाबल फायर करते हैं, तब इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि उनकी गोलियां और तोप के गोले पाकिस्तान की सीमा में जाकर गिरेंगे. वे आसपास के घरों में भी जाकर गिर सकते हैं.'

2003 से 2014 तक थी शांति

नवंबर 2003 के अंत में भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर होने से नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले लोगों को बहुत बड़ी राहत मिली थी. 26 नवंबर, 2003 को ईद के त्यौहार पर दोनों देशों के बीच सीजफायर के लिए सहमति बनी थी. आतंकवाद की शुरुआत के बाद से दोनों सेनाओं के बीच यह पहला औपचारिक संघर्ष विराम (अल्पसंधि) था. दोनों देशों के बीच सहमति बनने के अगले ही दिन से एलओसी, अंतरराष्ट्रीय सीमा और सियाचिन ग्लेशियर में बंदूकें शांत हो गईं थीं.

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लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान सीमावर्ती इलाकों में गोलीबारी में भारी इजाफा देखने को मिला है. गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2014 में बीएसएफ के ऑपरेशनल कंट्रोल के तहत अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 430 बार सीजफायर का उल्लंघन हुआ. वहीं, 2017 में भारतीय सेना के ऑपरेशनल कंट्रोल के तहत एलओसी पर 10 दिसंबर तक 771 बार सीजफायर का उल्लंघन किया गया. जबकि, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 110 बार सीजफायर का उल्लंघन हुआ.

Jammu And Kashmir Security- Reuters Image

सीमा पर यह गोलीबारी आम तौर पर रात के दौरान या सुबह तड़के शुरू होती है. गोलीबारी शुरू होते ही स्थानीय लोग अपने भरे-पूरे घर छोड़कर भाग खड़े होते हैं, और जब वे वापस लौटते हैं तो उन्हें अपने घर खंडहर में तब्दील मिलते हैं. खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती हैं और मवेशी मारे जा चुके होते हैं. सब कुछ तबाह हो जाने के बाद इनमें से ज्यादातर लोगों को अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करना पड़ती है. और जब इनकी जिंदगी थोड़ा पटरी पर आने लगती है, तभी फायरिंग की नई घटना घट जाती है. जिसके चलते एक बार फिर से इनका सब कुछ बरबाद हो जाता है.

अभी और लगेंगे राख के ढेर

शुक्रवार को गणतंत्र दिवस के अवसर पर बीएसएफ ने अपने पाकिस्तानी समकक्षों के साथ मिठाई और शुभकामनाओं के आदान-प्रदान से इनकार कर दिया. जैसा कि हाजी सैफुल्लाह तमाम खोज-बीन के बाद भी अपने घर के मलबे में से कोई भी चीज सही-सलामत नहीं पा सके. क्योंकि उनके घर में रखा सारा सामान जलकर राख हो चुका था. सिर्फ कुछ अधजले बर्तन और कोयला बन चुके बिस्तर ही बचे थे. उसी तरह, पड़ोसी देश से लगी पूरी सीमा राख और धुएं में बदल चुकी है. हालांकि दुश्मनी की यह ज्वाला अभी थमी नहीं है. ज्वाला की यह लहर अभी राख के कुछ और ढेर लगा सकती है.

बहरहाल, पत्नी के साथ खोज-बीन में जुटे सैफुल्लाह को अपनी लापता बकरी मरी हुई मिली. उनकी बकरी घर के पीछे जली-भुनी हालत में कीचड़ और अधजली खिड़की की चौखट के नीचे दबी हुई थी. यह मंजर देखकर फौजिया को गहरा धक्का लगा और वह फफक पड़ीं. रुंधे गले से उन्होंने फ़र्स्टपोस्ट से कहा कि, 'वह हमारी कमाई का इकलौता जरिया थी. मैं उसका दूध बेचकर अपने घर का खर्च चलाया करती थी. अब हम लोग क्या करेंगे?'

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