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डोकलाम विवाद सुलझाने वाले गोखले की चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई

जब डोकलाम को लेकर भारत और चीन के बीच टकराव जैसे हालात चल रहे थे, उस वक्त विजय गोखले चीन में भारत के राजदूत थे

FP Staff Updated On: Jan 29, 2018 05:17 PM IST

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डोकलाम विवाद सुलझाने वाले गोखले की चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई

नए विदेश सचिव विजय गोखले की ऐसी कहानी है जो आप बार-बार सुनना चाहेंगे. पिछले साल अगस्त में जब डोकलाम को लेकर भारत और चीन के बीच टकराव जैसे हालात चल रहे थे, उस वक्त विजय गोखले चीन में भारत के राजदूत थे. लेकिन डोकलाम गतिरोध को सुलझाने के लिए गोखले को दिल्ली में तैनात किया गया था. गतिरोध को खत्म करने के लिए हर दिन गोखले साउथ ब्लॉक और पीएमओ में बैठक करते थे.

डोकलाम गतिरोध खत्म करने में अहम रोल

एक हफ्ते के बाद गोखले को चीन के विदेश मंत्रालय की तरफ से फोन आया. दरअसल चीन के राष्ट्रपति के ऑफिस ने विदेश मंत्रालय को ही डोकलाम पर बातचीत करने के लिए नियुक्त किया था. फिर क्या था, गोखले ने बीजिंग के लिए अगली फ्लाइट ले ली. लेकिन चक्रवात हार्वे के चलते उनकी फ्लाइट लेट हो गई. जब तक वो बीजिंग पहुंचे तब तक आधी रात बीच चुकी थी. लेकिन गोखले उसी वक्त बीजिंग के जींगॉमेनवाई इलाके पहुंच गए, जहां चीन के विदेश मंत्रालय का ऑफिस था. भारतीय दूतावास के एक जूनियर अधिकारी गोखले के लिए शर्ट लेकर आए और उन्होंने चेंज किया.

इसके बाद गोखले और चीन के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के बीच सुबह तक बैठक चली और डोकलाम को लेकर गतिरोध खत्म हो गया. 28 अगस्त 2017 की सुबह दोनों देशों के विदेश मंत्रालय ने बीजिंग में ऐलान किया कि डोकलाम को लेकर 72 दिनों से चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया है.

गोखले के लिए चीन सबसे बड़ी चुनौती

चीन को लेकर गोखले की समझ अच्छी थी. उन्हें पता था कि डोकलाम की घटना को इस तरह छोड़ा नहीं जा सकता. ऐसे में अगले दो साल तक विदेश सचिव के तौर पर उन्हें सबसे बड़ी चुनौती चीन से मिलने वाली है. साल 2016 में चीन में राजदूत बनने के बाद से गोखले वहां की आबोहवा से अच्छी तरह वाकिफ हैं. 1981 बैच के आईएफएस ऑफिसर विजय गोखले चीन की भाषा से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं. 1980 के दशक में सबसे पहली जिम्मेदारी उन्हें हांगकांग के उच्चायोग में ही मिली थी.

निडर हैं गोखले

गोखले चीनी सरकार से सीधे संवाद में यकीन रखते हैं. वो न तो पुरानी चीजों का ख्याल रखते हैं और न ही उन्हें भविष्य की चिंता रहती है. गोखले अपने कामकाज के तरीके को लेकर हमेशा निडर रहते हैं.

गोखले पर न सिर्फ चीन के साथ संबंध बेहतर करने की जिम्मेदारी होगी, बल्कि उन्हें पाकिस्तान के साथ भी हालात को सुधारना होगा. साल 2016 में पठानकोट हमले के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच बड़े स्तर पर कोई बातचीत नहीं हुई है.

इस साल पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति के ट्वीट के बाद हालात बदल गए हैं. अफगानिस्तान में लगातार आत्मघाती हमले हो रहे हैं. इन हमलों में पाकिस्तान और आईएसआई के हाथ से इंकार नहीं किया जा सकता. भारत पर भी इसका असर पड़ सकता है. गोखले के सामने दूसरे पड़ोसी देशों की भी चुनौती रहेगी. नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली भारत के बहुत प्रशंसक नहीं हैं. श्रीलंका में चीन असर बढ़ रहा है. यानी अगले दो साल तक विजय गोखले के लिए चुनौती भरे रहेंगे.

(न्यूज18 के लिए ज़ाका जैकब की रिपोर्ट)

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