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विजय दिवसः 1971 में जब पाकिस्तान के 'ऑपरेशन चंगेज खान' को भारत ने किया था नाकाम

16 दिसंबर को 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत के चलते विजय दिवस मनाया जाता है, साल 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्‍तान को करारी शिकस्‍त दी थी जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हो गया था जो कि आज विश्व में बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है

Updated On: Dec 16, 2018 10:35 AM IST

FP Staff

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विजय दिवसः 1971 में जब पाकिस्तान के 'ऑपरेशन चंगेज खान' को भारत ने किया था नाकाम

पूरा देश आज यानी रविवार को विजय दिवस मना रहा है. 16 दिसंबर को आज ही के दिन 1971 में वीर भारतीय जवानों ने पाकिस्तान के दांत खट्टे किए थे और उसके लगभग 1 लाख सैनिकों को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विजय दिवस के मौके पर शहीदों को याद किया है. उन्होंने ट्वीट कर कहा, 'आज विजय दिवस के मौके पर हम 1971 के युद्ध में अदम्य साहस के साथ लड़े अपने बहादुर जवानों को याद करते हैं. उनके अटल पराक्रम और देशप्रेम की वजह से ही देश सुरक्षित है.'

क्यों मनाया जाता है विजय दिवस

16 दिसंबर को 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत के चलते विजय दिवस मनाया जाता है. साल 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्‍तान को करारी शिकस्‍त दी थी जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हो गया था जो कि आज विश्व में बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. यह युद्ध भारत के लिए ऐतिहासिक युद्ध था. बांग्लादेश का स्वतंत्रता संग्राम 1971 में हुआ था, इसे 'मुक्ति संग्राम' भी कहते हैं. यह युद्ध 1971 में 25 मार्च से शुरू होकर 16 दिसंबर तक चला था. इस रक्तरंजित युद्ध के माध्यम से बांलादेश ने पाकिस्तान से खुद को मुक्त कराया था. पाकिस्तान पर यह जीत कई मायनों में ऐतिहासिक थी. भारत ने 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था.

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पाकिस्तान की सेना के अत्याचार के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए

1971 के पहले बांलादेश, पाकिस्तान का एक प्रांत था जिसका नाम पूर्वी पाकिस्तान था जबकि वर्तमान पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान कहते थे. कई सालों के संघर्ष के बाद बांग्लादेश अपने आप को आजाद करा पाया था. पाकिस्तान की सेना के अत्याचार और बांग्लाभाषियों के दमन के विरोध में पूर्वी पाकिस्तान के लोग सड़कों पर उतर आए थे. 1971 में आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान के विद्रोह पर आमादा लोगों पर जमकर अत्याचार किए थे. लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था और अनगिनत महिलाओं की इज्जत लूट ली गई थी. भारत ने पड़ोसी होने के नाते इस जुल्म का विरोध किया और बांग्लादेशी क्रांतिकारियों की मदद की थी. इसका नतीजा यह हुआ कि भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी जंग हुई. इस लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. इसके साथ ही दक्षिण एशिया में एक नए देश का उदय हुआ था.

संसाधनों के लिहाज से पूर्वी पाकिस्तान ज्यादा समृद्ध था

बता दें कि 14 अगस्त 1947 को स्वतंत्र पाकिस्तान देश का गठन हुआ. तत्कालीन पाकिस्तान के दो भाग थे पू्र्वी एवं पश्चिमी पाकिस्तान. हालांकि दोनों ही हिस्सों में सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक समानताएं नही थीं. संसाधनों के लिहाज से पूर्वी पाकिस्तान ज्यादा समृद्ध था लेकिन राजनीतिक रूप से पश्चिमी पाकिस्तान ज्यादा प्रखर एवं हावी था. इस प्रकार एक ही देश के दो भागों मे पाई जाने वाली सामाजिक एवं आर्थिक विषमताएं एवं प्रबुद्ध जनों के द्वारा सत्ता के ऊपर नियंत्रण करने की प्रवृति ही देशव्यापी असंतोष एवं अंत मे 1971 मे बांग्लादेश के गठन का कारण बनी. पाकिस्तान के गठन के समय पश्चिमी क्षेत्र में सिंधी, पठान, बलोच और मुजाहिरों की बड़ी संख्या थी जबकि पूर्व हिस्से में बांग्ला भाषा बोलने वालों का बहुमत था.

ढाका शहर की एक तस्वीर

ढाका शहर की एक तस्वीर

1970 में हुए आम चुनाव में पूर्वी क्षेत्र में शेख की पार्टी ने जीत हासिल की

पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक चेतना की कभी कमी नहीं रही लेकिन पूर्वी हिस्सा देश की सत्ता में कभी भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं पा सका एवं हमेशा राजनीतिक रूप से उपेक्षित रहा. इससे पूर्वी पाकिस्तान के लोगों में जबरदस्त नाराजगी थी. इसी नाराजगी का राजनीतिक लाभ लेने के लिए बांग्लादेश के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने अवामी लीग का गठन किया और पाकिस्तान के अंदर ही और स्वायत्तता की मांग की. 1970 में हुए आम चुनाव में पूर्वी क्षेत्र में शेख की पार्टी ने जीत हासिल की. उनके दल ने संसद में बहुमत भी हासिल किया लेकिन प्रधानमंत्री बनाने की जगह उन्हें जेल में डाल दिया गया यहीं से पाकिस्तान के विभाजन की नींव रखी गई.

25 मार्च 1971 को पाकिस्तान में सेना की अगुआई में नरसंहार हुआ

1971 के समय पाकिस्तान में जनरल याह्या खान राष्ट्रपति थे और उन्होंने पूर्वी हिस्से में फैली नाराजगी को दूर करने के लिए जनरल टिक्का खान को जिम्मेदारी दी. वहीं उनके द्वारा दबाव से मामले को हल करने के प्रयास किए गए जिससे हालात पूरी तरह खराब हो गए. 25 मार्च 1971 को पाकिस्तान के इस हिस्से में सेना एवं पुलिस की अगुआई मे जबरदस्त नरसंहार हुआ. इससे पाकिस्तानी सेना में काम कर रहे पूर्वी क्षेत्र के लोगों में गुस्सा भड़क गया और उन्होंने अलग मुक्ति वाहिनी बना ली. दूसरी तरफ पाकिस्तानी फौज का निरपराध, निहत्थे लोगों पर अत्याचार जारी रहा. ऐसी हालत में लोगों का पलायन आरंभ हो गया जिसके कारण भारत ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति सुधारने की अपील की. हालांकि किसी भी देश ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और जब वहां के विस्थापित लगातार भारत आते रहे तो अप्रैल 1971 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुक्ति वाहिनी को समर्थन देकर बांग्लादेश को आजाद कराने का फैसला किया.

मुक्तिवाहिनी का एक सिपाही और भारत आते शरणार्थी

ऑपरेशन सर्चलाइट, ऑपरेशन चंगेज खान और बड़ा युद्ध

बांग्लादेश बनने से पहले पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने स्थानीय नेताओं और धार्मिक चरमपंथियों की मदद से मानवाधिकारों का हनन किया था. 25 मार्च 1971 को शुरू हुए ऑपरेशन सर्च लाइट से लेकर पूरे बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में जमकर हिंसा हुई थी. बांग्लादेश सरकार के मुताबिक इस दौरान करीब 30 लाख लोग मारे गए थे. 1971 के दिसंबर महीने में ऑपरेशन चंगेज खान के जरिए भारत के 11 एयरबेसों पर हमला कर दिया गया था जिसके बाद 3 दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की शुरुआत हुई. महज 13 दिन के बाद पाकिस्तान की 92 हजार फौज ने सरेंडर कर दिया.

भारतीय हमले की वजह से नियाजी घबरा गए थे

भारत की मदद के लिए रूस आगे आया. वहीं अमेरिका के सातवें बेड़े के पहुंचने के पहले ही भारत की सेनाओं ने ढाका की तीन तरफ से घेराबंदी की और इसके साथ ही ढाका में गवर्नर हाउस पर हमला कर दिया. जिस समय भारत ने हमला किया उस वक्त गवर्रनर हाउस में पाकिस्तान के बड़े अधिकारियों की मीटिंग चल रही थी. भारतीय हमले की वजह से नियाजी घबरा गए. उन्होंने भारत को युद्ध विराम का संदेश भिजवाया लेकिन जनरल मानेकशॉ से साफ कर दिया कि युद्ध विराम नहीं बल्कि पाकिस्तान को सरेंडर करना होगा. बता दें कि पाक सेना के अत्याचारों से परेशान होकर लगभग 10 लाख लोग भारत में शरण लेने चले गए थे.

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शेख मुजीब-उर-रहमान को 'बंगबंधु' की उपाधि से नवाजा गया

वहीं कुछ और आंकड़ों के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान में अत्याचार से तंग आकर करीब 80 लाख लोग भारत की सीमा में प्रवेश कर गए थे. भारत के इस लड़ाई में दखल देने के पीछे इन शरणार्थियों के भारत में प्रवेश एवं इस वजह से भारत के ऊपर पड़ने वाले आर्थिक दबाव को भी एक वजह माना जाता है. बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने बांग्लादेश की आज़ादी के लिए संघर्ष किया. बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीब-उर-रहमान को 'बंगबंधु' की उपाधि से नवाजा गया. अवामी लीग के नेता बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने. हालांकि 1975 में उनके सरकारी आवास पर ही सेना के कुछ जूनियर अफसरों और अवामी लीग के कुछ नेताओं ने मिलकर उनकी हत्या कर दी थी.

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