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पाकिस्तान को परे रख दक्षिण एशिया में एक आर्थिक ढांचा खड़ा करे भारत

आर्थिक मोर्चे पर भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच क्षेत्रीय स्तर पर व्यावसायिक एकीकरण का ढांचा खड़ा किया जाना चाहिए

Sreemoy Talukdar Updated On: Mar 22, 2018 04:43 PM IST

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पाकिस्तान को परे रख दक्षिण एशिया में एक आर्थिक ढांचा खड़ा करे भारत

हाल के न्यूज18 राइजिंग इंडिया सम्मेलन में परिचर्चा के दौरान एक रोचक विचार सामने आया. परिचर्चा का विषय मौजूद संभावनाओं और चुनौतियों के मद्देनजर दुनिया में भारत के मुकाम पर केंद्रित था और इसका शीर्षक था- इंडिया’ज प्लेस इन द वर्ल्ड: ऑपर्च्युनिटीज एंड चैलेंजेज.

परिचर्चा में शामिल बीजेपी के विदेशी नीति प्रभाग के मुखिया विजय चौथाईवाला ने यह विचार सामने रखा कि पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत को दक्षिण एशिया में आर्थिक एकीककरण के प्रयास करने चाहिए.

पहली नजर में यह विचार बहुत रोचक जान पड़ता है. अगर हम पाकिस्तान को परे रखते हुए ऐसा कोई क्षेत्रीय ढांचा खड़ा कर पाए, इलाके के व्यापार-व्यवसाय की गतिविधियों में तालमेल बनाते हुए पड़ोसी देशों की छोटी अर्थव्यवस्थाओं को भारत के विशाल बाजार से जोड़ सके और क्षेत्रीय स्तर पर जुड़ाव का बेहतर ताना-बाना कायम कर सके तो इससे एक ही साथ कई समस्याओं का समाधान हो सकेगा. फिलहाल आर्थिक मोर्चे पर भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच व्यापारिक संबंधों के एतबार से जमीनी सच्चाई और संभवानाओं के बीच एक अंतर मौजूद है लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर व्यावसायिक एकीकरण का कोई ढांचा खड़ा किया जा सके तो इस अंतर को पाटा जा सकता है.

भारत के लिए दक्षिण एशिया में अपार संभावनाएं

मिसाल के लिए, गौर करें कि ‘आसियान’ देशों के साथ भारत का व्यापार साल 2016-17 में 71.6 अरब डॉलर का था. साल 2015-16 में आसियान देशों के साथ हुए 65.1 अरब डॉलर के व्यापार की तुलना में यह 10 फीसद अधिक है. लेकिन ‘अगर यह आंकड़ा आपको असरदार लगता है तो फिर फिर जरा इस तथ्य पर विचार कीजिए कि चीन और आसियान के देशों के बीच दोतरफा व्यापार 2016 में 452.31 अरब डॉलर का था जबकि आसियान के देशों को चीन ने 2016 में ही 256 अरब डॉलर के सेवा और सामान का निर्यात किया.’ यह बात टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में कही है. मतलब बड़ा साफ है कि व्यापारिक बढ़वार के लिहाज से भारत के लिए दक्षिण एशिया में बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं लेकिन भारत अभी तक इन संभावनाओं का लाभ नहीं ले सका है.

जहां तक रणनीतिक मोर्चे का सवाल है, भारत बीबीआईएन (बांग्लादेश, भूटान, इंडिया, नेपाल) और बिमस्टेक (बे ऑफ बंगाल इनशिएटिव एंड इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन) जैसे क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय व्यवस्थाओं में बेहतर तालमेल कायम कर सकता है. बीबीआईएन तथा बिमस्टेक दक्षिण एशिया में भारत की परंपरागत मजबूत स्थिति के स्वीकार पर टिके हैं. अगर तालमेल कायम हो पाता है तो भारत इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकते हुए दक्षिण एशियाई उप-महाद्वीप में अपने दबदबे को फिर से कायम कर सकता है. फिलहाल भारत के दबदबे को चीन से कड़ी चुनौती मिल रही है. एक अहम बात यह भी है कि क्षेत्रीय स्तर पर पड़ोसी मुल्कों से बेहतर तालमेल कायम होने से पाकिस्तान इलाके में ज्यादा बाधाएं नहीं खड़ी कर पाएगा और दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को अधिक से अधिक अलग-थलग करने में मदद मिलेगी.

पाकिस्तान के साथ सुलह की संभावना दूर-दूर तक नहीं

बहरहाल, जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, संबंधों को फिर से पटरी पा लाने का जुमला होठों पर लाने में तो बहुत आसान है लेकिन उसपर अमल बहुत कठिन. सीमा पर कायम दुश्मनी के माहौल में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध बिगाड़ के उस मुकाम तक जा पहुंचे हैं कि अब इसका असर कूटनयिक संबंधों पर भी दिखायी दे रहा है और नुकसान की भरपाई बहुत मुश्किल जान पड़ रही है. सो, पाकिस्तान को क्षेत्रीय स्तर पर अलग-थलग करने के प्रयासों के आगे बहुत कठिनाई आएगी, प्रतिरोध का तेज स्वर अंदरुनी स्तर पर भी उभरकर सामने आ सकता है.

फिर कुछ अन्य मसले भी इससे जुड़े हुए हैं. मौजूदा सरकार फिलहाल कई मोर्चे पर कदम बढ़ाने की कोशिश कर रही है- बेहतर संपर्क-मार्ग कायम करना, आर्थिक और सांस्कृतिक तालमेल के बढ़ते हुए प्रयास और कूटनयिक संबंधों में स्थायित्व की कोशिशें इसी का उदाहरण है. फिर भी भारत नकदी बांटने को आधार बनाकर चलने वाली चीन की कूटनीति से होड़ लगाने की हालत में नहीं है. और फिर, बड़ी परियोजनाओं को चलाने तथा पूरा करने के लिहाज से भी भारत के सामने बाधाएं हैं- क्षमता अपेक्षा के अनुरुप नहीं है और परियोजनाओं को पूरा करने की रफ्तार भी धीमी है.

Pakistani rangers and Indian Border Security Force officers lower their national flags during a daily parade at the Pakistan-India joint check-post at Wagah

म्यांमार में भारत का प्रोजेक्ट

आधारभूत ढांचे के निर्माण की बहुत सी परियोजनाओं के लिए भारत ने पूर्वी एशिया के देश म्यांमार के साथ करार किया है. इसके अंतर्गत पुलों और बंदरगाहों को उन्नत बनाना, 160 किलोमीटर लंबे इंडिया-म्यांमार फ्रेंडशिप रोड का निर्माण तथा 1400 किलोमीटर लंबे इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड (आईएमटी) हाईवे का निर्माण शामिल है. आईएमटी हाईवे के जरिए भारत के मणिपुर को म्यांमार होते हुए थाईलैंड के माये सोत से जोड़ा जाना है (भारत की एक योजना यह भी है कि कंबोडिया, लाओस तथा वियतनाम को इस घेरे में लाया जाए). लेकिन, इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं धीमी गति से चल रही हैं. मिसाल के लिए आईएमटी हाईवे को 2015 में ही पूरा हो जाना था लेकिन परियोजना के पूरा होने की अंतिम तारीख अब पांच साल के लिए आगे बढ़ा दी गई है.

म्यांमार भारत के लिए बहुत अहम है क्योंकि भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में विकास-कार्य की बहुत ज्यादा जरुरत है और यह इलाका चारों तरफ से जमीन से घिरा होने के कारण आसियान देशों के बाजार के साथ म्यांमार के रास्ते ही जोड़ा जा सकता है. लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर आगे बढ़ने की भारत की कोशिशों को हर बार धक्का लगता है क्योंकि एक तो समझौतों पर ठीक ढंग से अमल नहीं होता दूसरे परियोजनाएं समय रहते पूरी नहीं हो पातीं. यह एक ऐसा मोर्चा है जहां चीन हमसे हमेशा बाजी मार ले जाता है.

सुधा रामचंद्रन ने डिप्लोमैट में लिखा है, 'म्यांमार में भारत भी चीन की तरह बंदरगाहों को उन्नत बनाने, तेल का खनन करने, सड़क और पुलों के निर्माण के काम में लगा है. दरअसल एशिया की ये दो महाशक्तियां म्यांमार में आधारभूत ढांचे के निर्माण की परियोजनाओं के लिहाज से एक-दूसरे के साथ होड़ कर रही हैं. लेकिन म्यांमार में चीन की तुलना में भारत का निवेश बहुत कम है. भारत ने वित्तवर्ष 2015-16 में म्यांमार में मात्र 224 मिलियन डॉलर का निवेश किया है तथा वित्तवर्ष 2016-17 के पहले चार महीनों में कोई भी नया निवेश नहीं हुआ. लेकिन चीन ने 2015-16 में म्यांमार में 3.3 अरब डॉलर का निवेश किया. परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने के काम में लगी एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी, निगरानी का लचर ढांचा तथा वित्तीय बाधाओं के कारण भारत समय रहते परियोजनाओं को पूरा नहीं कर पाता.'

पाकिस्तान को अलग रखकर दूसरे मसलों पर देना होगा ध्यान

दक्षिण एशिया की रणनीति तय करने के मामले में भारत के आगे कुछ और बाधाएं भी हैं. एक तो भारत को अपने सीमा-क्षेत्र के भीतर भी आधारभूत ढांचे के निर्माण और संपर्क-मार्ग बढ़ाने की भारी जरुरत है. दूसरे, एक राजनीतिक व्यवस्था का रुप में हमारा ध्यान अपनी देखभाल पर ज्यादा केंद्रित रहता है सो हम इस बात की ज्यादा फिक्र नहीं कर पाते कि पड़ोसी मुल्कों में क्या चल रहा है.

फिर भी राइजिंग इंडिया सम्मेलन में चौथाईवाला ने जो विचार सामने रखा उसपर गहराई से सोचा जाना चाहिए. चौथाईवाला से एक सवाल यह पूछा गया कि क्या दक्षिण एशिया के मुल्क युरोपीय मुल्कों के व्यापारिक मंच की तर्ज पर काम कर सकते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता पाकिस्तान के साथ हम अपने शेष संबंधों को आतंकवाद के मसले से अलग करके देख सकते हैं. लेकिन क्या हम इस तरह नहीं सोच सकते कि पाकिस्तान को परे रखते हुए दूसरे देशों को एक मंच पर लाया जाया.

पाकिस्तान को लेकर हमारी नीतियों पर पुनर्विचार तभी संभव है जब हम यह मानने को तैयार हों कि द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाना बातचीत के जरिए मुमकिन नहीं रहा. जो नीति दशकों तक जारी रखने के बावजूद नाकाम रही अब वक्त उससे अलग देखने-सोचने का है.

Indian soldiers stand guard in front of an India's national flag tri-colours during the full-dress rehearsal for India's Independence Day celebrations at the historic Red Fort in Delhi

पाकिस्तान के साथ कभी सुलह-शांति के हालात बनते हैं तो कभी दुश्मनी के और द्विपक्षीय संबंधों की यह सच्चाई लगातार जारी रहती है, कभी एक स्थिति हावी होती है तो कभी दूसरी स्थिति. इस दुष्चक्र से बचने के लिए हमें नये सिरे से सोचने की जरुरत है. तभी हम पाकिस्तान को लेकर एक नई नीति तैयार कर पायेंगे जिसमें यह सोच शामिल होगी कि दोनों देशों का इतिहास में तो साझा है लेकिन इसके अतिरिक्त दोनों मुल्कों को आपस में जोड़ने के आधार ना के बराबर हैं.

रॉ के पूर्व मुखिया विक्रम सूद ने लिखा है: 'भारत-पाकिस्तान के संबंधों की कोई पुख्ता जमीन ही नहीं है. ऐसी जमीन कभी थी ही नहीं और अगर पहले कभी थी भी तो अब उतनी भी नहीं बची. पाकिस्तान अफगान ट्रांजिट संधि पर अमल नहीं करेगा. उसने निगेटिव लिस्ट में दर्ज 1209 चीजों को लेकर मोस्ट फेवर्ड नेशन (तरजीही बरताव का मुल्क) का दर्जा देने से इनकार किया है. भारत को इसका निर्यात सिर्फ आतंकवाद है, एक आतंकवाद के बाद दूसरा आतंकवाद. अब हालात अगर इस तरह के हैं तो पाकिस्तान में इतना बड़ा मिशन चलाए रखने की जरूरत नहीं. अगर हमारी नीति यह है कि जबतक वह एक जिम्मेदार पड़ोसी की तरह बरताव करना नहीं सीख लेता उसकी अनदेखी की जानी चाहिए तो फिर बहुत पहले ही वहां के दूतावास से हमें अपने कर्मचारी कम कर देने चाहिए थे.'

पाकिस्तान के फैलाए जहर से बचते हुए क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग का एक ढांचा करना भारत के लिए एक अच्छी शुरुआत मानी जा सकती है. लेकिन इसके लिए पहले भारत को पड़ोसी देशों के साथ अपनी नीति पर सोचना होगा. अगर सिर्फ विचार तक सीमित रहे, विचारों पर अमल ना हुआ तो फिर क्षेत्रीय सहयोग का विचार सिर्फ सपना भर बनकर रह जायेगा.

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