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देव वाणी 'संस्कृत' से चमक रहा है झारखंड में मुसलमानों का व्यवसाय

मुसलमानों के बाजार को मिल रहा है संस्कृत भाषा का प्रसाद

Updated On: Aug 20, 2017 06:40 PM IST

Brajesh Roy

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देव वाणी 'संस्कृत' से चमक रहा है झारखंड में मुसलमानों का व्यवसाय

वर्तमान परिवेश में यह और भी अहम हो जाता है जब आपको यह पता लगे कि इस्लाम को मानने वाले मुस्लिम व्यवसाय को संस्कृत भाषा से बढ़ावा मिलने लगा है. रांची के मुस्लिम बहुल, बहू बाजार और कर्बला चौक पर फल और सब्जी बेचने वाले मुस्लिम व्यवसायी बाकायदा फल-सब्जियों के नाम संस्कृत में लिखी तख्ती को लटकाकर इन दिनों अपना व्यवसाय खूब चमका रहे हैं.

इतना ही नहीं मुसलमानों की जुबां से ग्राहकों को संस्कृत में लुभाना भी देखते बनता है. मुस्लिम व्यवसायी मानते भी हैं कि आदि भाषा संस्कृत की लोकप्रियता आज भी बेजोड़ है और यह संस्कृति देश दुनिया को सबक देने का कार्य करती है.

आगच्छतु.... आगच्छतु.... आगच्छतु... अत्र आलुकम् अस्ति, वार्तिकी अस्ति,गोजिह्वा च अस्ति एवं भवतां रच्याः अनुगुणं नूतनानि हरितानि शाकानि. अर्थात, आइए, आइए, आइए, यहां आलू है, टमाटर है, फूलगोभी है और आपके पसंद की हरी सब्जियां. झारखंड की राजधानी रांची की व्यस्त सड़कों के किनारे से छोटे-छोटे दुकानों से आ रही ये आवाजें सुनकर हर कोई पहली बार में चौंक उठेगा.

आप सोचने को मजबूर हो जाएंगे कि आखिर ये क्या बोल रहे हैं? ये कौन सी भाषा है, कहीं दूसरे लोक में तो नहीं आ गए हम. लेकिन जरा गौर से सुनिएगा तो पता चलेगा ये कोई और नहीं बल्कि देववाणी संस्कृत है. संस्कृत में ग्राहकों को बुलाने से लेकर संस्कृत के नाम से बिक रही सब्जियों को देखकर ग्राहक भी खिंचे चले आ रहे हैं.

संस्कृत भाषा के नाम से सब्जी से लेकर श्रृंगार तक के सामान खरीदकर ग्राहक भी गुमान कर रहे हैं. खासकर युवा वर्ग का मानना है कि नौंवी कक्षा के बाद उनका संस्कृत भाषा के साथ कोई वास्ता नहीं रहा, लेकिन फिर से संस्कृत को ऐसे बाजारों में देखकर अच्छा लग रहा है.

हमारी संस्कृति की भाषा संस्कृत है. दरअसल रांची के बहू बाजार और कर्बला चौक में फुटपाथ पर सब्जी बेचने वाले दुकानदार और महिलाओं के साज-सज्जा के सामान बेचने वाले दुकानदार इन दिनों संस्कृत में हर सामान बेच रहे हैं.

बाकायदा हर वस्तु का नाम संस्कृत में लिखकर लगाया भी है. श्रृंगार का सामान बेचने वाले मोहम्मद नेयाज़ खान कहते हैं ‘संस्कृत हिंदुस्तानी संस्कृति की भाषा है, इस भाषा में सामान बेचने में अच्छा लगता है’. कुछ दुकानदारों का मानना है इससे बिक्री भी बढ़ी है.

दुकानदार से लेकर ग्राहक तक सभी हैं बेहद खुश

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यहां मुस्लिम व्यवसायी इस नए प्रयोग से अपनी बढ़ती हुई आमदनी को देख बेहद खुश हैं. एक सवाल के जवाब में व्यवसायी मोहम्मद रफी ने कहा, ‘भाई जान भाषा धर्म और मजहब कभी बैर नहीं सिखाते. हमारे देश की व्यवस्था अनेकता में एकता का प्रतीक है. बस नेतागिरी और वोट बैंक के चक्कर में यह सब दुराव होता जा रहा है’.

इसी बाजार में सब्जी खरीदेने पहुंची नीतू कुमारी ने भी पहली बार अपनी संस्कृत भाषा के महत्व को नजदीक से जाना और समझा. कॉलेज की छात्रा नीतू का उत्साह देखने लायक था. उन्होने कहा, ‘संस्कृत उनका विषय नहीं रहा, किसी ने बताया भी नहीं, लेकिन ये मजेदार है और मैं अब इसे सीखने की कोशिश जरूर करूंगी’.

‘संस्कृत भारती’ संस्था का है यह अनूठा प्रयोग

दरअसल संस्कृत का यह बाजार अखिल भारतीय संस्थान ‘संस्कृत भारती’ के प्रयास से लगा है. संस्कृत भाषा की प्रतिष्ठा और इसकी लोकप्रियता बढ़ाने के उद्देश्य से लगातार कार्य कर रही संस्था संस्कृत भारती का इन दिनों ‘संस्कृत सप्ताह’ चल रहा है.

अपने संस्कृत सप्ताह के लिए इस संस्था ने रांची सहित पूरे झारखंड में मुस्लिम बहुल इलाकों के मुस्लिम व्यवसायियों का चयन किया है. अपने एक्सक्लूसिव आयडिया में संस्कृत भारती को सफलता भी मिली.

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फिलहाल रांची फुटपाथ के मुस्लिम व्यवसायियों को सहयोग देने के लिए संस्था के सदस्य भी साथ रहते हैं. इस दौरान ग्राहकों को यदि भाषा समझने में कठिनाई हो रही हो तो संस्था के सदस्य पूरा सहयोग करते हैं. इतना ही नहीं संस्कृत भाषा से संबंधित कोई अन्य जानकारी भी चाहिए तो वो भी यहां उपलब्ध होता है. संस्कृत भारती संस्था संस्कृत में रुचि रखने वालों के लिये एक साप्ताहिक क्लास भी चलाने का कार्य करती है.

संस्कृत भाषा की लोकप्रियता को बढ़ावा देने के लिए अपने तरह के इस अनूठे प्रयोग को लेकर संस्था के झारखंड प्रदेश प्रांत संयोजक पृथ्वी राज बेहद उत्साहित हैं. पृथ्वी राज ने कहा भी, ‘पहले मुस्लिम शासकों फिर अंग्रेजों ने दुनिया की प्रमाणित आदि भाषा संस्कृत के साथ अन्याय किया. उन्होंने एक साजिश के तहत संस्कृत के प्रचार-प्रसार का मार्ग अवरुद्ध किया. आज फिर से हम सब पूरे देश और दुनिया में अपने संस्कृत भाषा को पुनः स्थापित करने का कार्य करेंगे’.

पृथ्वी राज की बातें और तर्क दोनों ही गौर करने वाले हैं. दरअसल इतिहास से हमने सबक और सीख लेने का कार्य कभी गंभीरता पूर्वक नहीं किया. वर्तमान मोदी के दौर में देश में हिंदुत्व के ढोल नगाड़े अपने-अपने तरीके से पूरा देश पीट रहा है. लेकिन जो समृद्ध संस्कृति आर्यावर्त या हिंदुस्तान की पहचान हुआ करती थी उसके प्रचार प्रसार के लिए फिलहाल कोई गंभीर योजना और प्रयास दिखाई नहीं पड़ता.

देश में नहीं पर विदेशों में आज भी संस्कृत का क्रेज

जानकार भी मानते हैं कि देश दुनिया में प्रचलित लगभग सात हजार भाषाओं में संस्कृत ही वह भाषा है जिसकी अमिट छाप सभी भाषाओं पर है. 1987 में फोर्ब्स पत्रिका के एक अंक में भी संस्कृत की महत्ता का गुणगान किया जा चुका है. डिजिटल दुनिया के कंप्यूटर साफ्टवेयर में संस्कृत भाषा सबसे सटीक है, यह प्रमाणित हो चुका है. बाहरी देशों ने इस भाषा पर रिसर्च करके कई उपलबद्धियां अर्जित करने का काम किया है.

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जर्मनी वैदिक गणित के प्रयोग पर इसी संस्कृत भाषा पर इतराता है. दुर्भाग्य संस्कृत के लिए सिर्फ अपने ही घर में है. जबकि हिंदू के सभी प्रेरणादायी धर्म ग्रंथ की रचना संस्कृत भाषा में ही हुई है. घर में कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा पाठ में इसी संस्कृत भाषा का प्रयोग होता आया है, यह सभी जानते हैं. संस्कृत अर्थात संस्कृतम को देववाणी या सुर भारती भी कहा जाता है. आदि सनातन धर्म की वाहिनी को आज अपने ही घर में पहचान के लिए तरसना पड़ रहा है, यह एक सोच का विषय जरूर है.

बहरहाल संस्कृत भाषा की समृद्ध संस्कृति और ज्ञान उपयोगी काल कब और कैसे लौट पाएगा यह मुद्दा है देश के लिए. बावजूद इसके रांची सहित पूरे झारखंड में संस्था ‘संस्कृत भारती’ के प्रयोग और प्रयास ने एक माहौल बनाने का काम जरूर किया है. लोगों की आम दिनचर्या के माध्यम को संस्कृत से जोड़ना यहां अच्छा लगा. मुसलमान भी इस नए प्रयोग को सिर आंखों पर ले रहे हैं.

इस प्रयास और प्रयोग की खूब सराहना हो रही है. देश में ऐसे प्रयासों को अहमियत जरूर दिया जाना चाहिए. राजनीति के कलाकारों को भी अपनी समृद्ध भाषा संस्कृत के लिए आगे आने की जरूरत है. सीटों के गणित, जोड़ घटाव और गुणा भाग से परे हटकर अपनी संस्कृति को सम्मान दिया जाय तो यह अनुकरणीय साबित होगा.

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