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गाय को 'राष्ट्रमाता' का दर्जा देना, देश की अनगिनत मांओं का मजाक उड़ाने जैसा है!

गाय को मां के स्थान पर बिठाने की कोशिश कर, इन नेताओं ने इस देश की अनगिनत मांओं का संवैधानिक मजाक उड़ाया है

Updated On: Sep 22, 2018 12:34 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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गाय को 'राष्ट्रमाता' का दर्जा देना, देश की अनगिनत मांओं का मजाक उड़ाने जैसा है!

कुछ साल पहले की बात है, दक्षिण भारत में एक स्वयंभु साधु या तात्रिंक हुआ करता था जिसे वहां के समाज में वही स्थान हासिल था जो गुजरात में आसाराम बापु और पंजाब- हरियाणा में गुरमीत राम-रहीम को हासिल था. फ़िर करीब 4-5 साल पहले उस स्वयंभु साधु की कुछ सेक्स वीडियो सामने आए, जिसमें उसपर अपनी शिष्याओं, जिनमें कुछ फिल्मी एक्ट्रेस भी थीं, उनके साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए दिखाया गया था. तबसे नित्यानंद स्वामी के दिन गर्दिश में चल रहे थे. उसका बिज़नेस ठप्प था, आश्रम बंद हो गया था, उसे जेल हो गई थी और उस पर रेप के केस भी चल रहे थे.

लेकिन, पिछले दो दिनों से ये साधु फिर से सोशल मीडिया में छाया हुआ है, एक पूरी तरह से नए अवतार में और नए दावों के साथ. इस ताज़ा वायरल वीडियो में नित्यानंद स्वामी कह रहा है कि वो अपने वैज्ञानिक ज्ञान की मदद से, जो उसे कई सालों तक शोध के बाद हासिल हुआ है, गाय, बंदर और बाघ जैसे जानवरों को इंसानों की भाषा में बात करना सिखा सकता है. उसके मुताबिक उसने ऐसा करने के लिए एक सॉफ्टवेयर भी डेवेलप कर लिया है, जिसकी टेस्टिंग सफल हुई है.

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राष्ट्रीय पशु से सीधे राष्ट्रमाता पर आए नेता

और... जिस समय ये तथाकथित खबर, सोशल मीडिया पर वायरल हो रही थी, ठीक उसी समय हमारे देश के एक राज्य उत्तराखंड की विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया गया. इस प्रस्ताव को राज्य की पशुपालन मंत्री रेखा आर्या ने पेश किया था, जिसमें मांग की गई है कि गाय को केंद्र सरकार ‘राष्ट्र-माता’ का दर्जा दे, जिसे सत्ता और विपक्ष जिसमें कांग्रेस पार्टी भी शामिल है, ने एकमत से पास कर दिया. वे अब, ये निवेदन केंद्र से करना चाहते हैं कि केंद्र उनकी मांग को मानते हुए और जनता की भावना की कद्र करते हुए जल्द से जल्द गाय को हम सब की ‘राष्ट्रमाता’ बना दें.

उत्तराखंड कांग्रेस की नेता इंदिरा हृदयेश के मुताबिक गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा देने से उनकी पार्टी को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन वे ये भी चाहती हैं कि गाय की अच्छी देखभाल हो.

दूसरी तरफ, प्रस्ताव पेश करने वाली पशुपालन मंत्री रेखा आर्या ने दावा किया कि गाय इकलौती ऐसी जानवर है, (शुक्र है कि उसे अभी स्त्री का दर्जा नहीं दिया गया) जो न सिर्फ सांस लेने के समय ऑक्सीजन लेती है, बल्कि छोड़ती भी है. उन्होंने गाय के दूध, मूत्र, गोबर आदि के औषधीय गुण का भी बखान किया. गाय के गुणगान को उन्होंने इस बात से खत्म किया कि आज भी नवजात बच्चे को मां के बाद गाय का दूध पीने को दिया जाता है. इसलिए गाय मां का अवतार है. (यहां भी मां के बाद कहा गया)

क्या प्राचीन और आधुनिक भारत में कोई महिला इस उपाधि के लायक नहीं है?

ख़ैर, इन नेताओं के इस दावे के बाद कुछ सर्वव्यापी और सर्वस्वीकार्य माताओं का नाम तो हमेशा के लिए इस ‘प्रतिष्ठित स्थान’ के लिए वांछित लिस्ट से हट गया है. इनमें भारत-माता, दुर्गा माता, सीता-माता, काली-माता, छठ-माता, तीज-माता, लक्ष्मी माता, मेरी, आपकी और हम सबकी माता शामिल हैं. लेकिन, फिर भी कुछ माताएं ऐसी हैं, जिनका नाम लाख कोशिशों के बाद भी आसानी से हटाया नहीं जा पा रहा है. मसलन- ब्रह्म वेदों की ज्ञाता देवी गार्गी, देवी मैत्रेयी, भगवान राम की माता कौशल्या, महान तपस्वी ऋषि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति, अंग्रेजों से लोहा लेने वाली रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडु, सुचेता कृपलानी, सावित्री बाई फूले, भीकाजी-कामा, मदर टेरेसा, ऐनी बेसेंट, दुर्गाबाई देशमुख़, लक्ष्मी सहगल, बेग़म हज़रत महल, कित्तूर की रानी चेनम्मा जिन्होंने 1857 की लड़ाई से 30 साल पहले अंग्रेज़ों से लड़ते हुए अपनी जान गंवाईं थी, अरूणा आसिफ़ अली और कमला नेहरू आदि.

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सच, तो ये है कि ये लिस्ट अगर हम बनाना शुरू कर दें तो ये कभी खत्म न हो. इसमें सुनीता विलियम्स से लेकर ‘निर्भया’ तक का नाम शामिल करने के तर्क मौजूद हैं.

लेकिन, हमारे नेताओं को प्राचीन आर्यावर्त से लेकर मॉडर्न इंडिया तक ऐसी एक महिला न मिली जिसके योगदान को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समकक्ष समझा जा सके. महात्मा गांधी होते तो शायद वो भी आज के नेताओं के इन तर्कों के सामने नतमस्तक हो जाते. क्योंकि उन्हें समझने में ये देर न लगती कि गाय को माता कहें या भगवान, इस तरह का ऐलान किसी न किसी प्रायोजित और निहित स्वार्थ या बड़े मकसद के साथ किया जा रहा है. अब, खुद ही सोचिए अगर अगले साल देश के कई राज्यों और केंद्र के चुनाव न होते तो क्या अचानक से किसी भी विधानसभा में ऐसे प्रस्ताव लाने की कोशिश की जाती? क्या ऐसा करके लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश नहीं की जा रही है? क्या हम रोजमर्रा के लड़ाई-झगड़ों से लेकर फ़िल्मी पर्दे पर दिखाए गए खूनखराबे में ‘मां’ शब्द के इस्तेमाल से अंजान हैं? शायद नहीं. तो फिर, इस देश के नागरिक होने के नाते क्या हमारे लिए ये जरूरी नहीं हो जाता है कि, हम हमारे नेताओं की इन बातों पर ध्यान न दें.

क्या ये नेता गायों को मां के कर्तव्यों को निभाने वाला समझते हैं ये नेता?

चाहे उत्तराखंड के हों या झारखंड के, कांग्रेस या बीजेपी के, जो भी नेता इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं, असल में वे सब हमारी देश की महिलाओं, उनकी मेहनत, उनके बलिदान, उनके पुरुषार्थ और उनकी बौद्धिक और सामाजिक योगदान का अपमान कर रहे हैं. क्या बुखार से तपते किसी बच्चे को गाय अस्पताल लेकर जाएगी? जिस बच्चे ने अपना पिता खो दिया हो, क्या गाय उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेगी? जैसे लक्ष्मीबाई ने लिया था. क्या दुश्मनों के सामने सिर झुकाने के बजाय कोई गाय अपनी जान देगी? जैसे रानी चेनम्मा ने दिया था. यूएन में जाकर अपने देश का प्रतिनिधित्व गाय करेगी? जैसे सुचेता कृपलानी ने किया था या फिर वंचित महिलाओं और बच्चों को शिक्षा की सौगात देने के लिए अपना जीवन न्यौछावर एक ‘गाय-माता’ कर पाएगी? जैसे- सावित्री बाई फूले ने किया था.

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सच ये है कि गाय एक पालतू और उपयोगी जानवर है, हमारे जीवन में उसकी कई किस्म की उपयोगिता है, जैसे कई अन्य जानवरों की होती है. उसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है कि वो हमारे पौराणिक कथाओं का एक स्थायी चरित्र है. उसे पूजा भी जाता है, उसकी देखभाल और सुरक्षा की भी बातें जरूरी हैं- लेकिन, क्या वाकई में हम एक देश के तौर पर इतने कंगाल हो गए हैं कि हमारे पास राष्ट्र-माता की उपाधि देने के लायक, न तो इतिहास से और न ही आधुनिक भारत में कोई स्त्री मौजूद नहीं है?

बेहतर होता कि हमारे देश के प्रबुद्ध नेता-गण गाय को उसका उचित स्थान देने के साथ-साथ इस महान देश की महान महिलाओं को भी थोड़ी गरिमा दे पाते. उन्हें अपनी सोच में हो न हो लेकिन, देश का मंदिर कहे जाने वाले संसद और सदन में थोड़ी इज्जत दे पाते. गाय को मां के स्थान पर बिठाने की कोशिश कर, इन नेताओं ने इस देश की अनगिनत मांओं का संवैधानिक मजाक उड़ाया है, जिसका असर हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में दूर तक देखा जाएगा.

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