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बुंदेलखंड: ऊंची जातियों के सामने चप्पल हाथ में लेने की प्रथा, दलित कर रहे विरोध

अपने ही घर के पुरुषों या ऊंची जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनकर किसी महिला का जाना इज्जत और मर्यादा का विषय माना जाता है.

FP Staff Updated On: Sep 16, 2017 10:53 AM IST

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बुंदेलखंड: ऊंची जातियों के सामने चप्पल हाथ में लेने की प्रथा, दलित कर रहे विरोध

बदल रहे भारत में भी कहीं दूर-दराज क्षेत्रों से हैरान करने वाली खबरें आती हैं, जो विकास और समानता की बातें झुठला देती हैं. इसी तरह बुंदेलखंड के ललितपुर में दलित महिलाओं को एक बड़ी शर्मनाक प्रथा का पालन करना पड़ता था. इन दलित महिलाओं को घर के बड़े-बुजुर्गों और ऊंची जातियों के लोगों को देखकर चप्पल हाथ में ले लेती थी. ये परंपरा सालों पुरानी है. लेकिन अच्छी बात है कि अब ये कम हो रही है.

ललितपुर के रमेशरा गांव में सभी महिलाएं इस परंपरा को कई दशकों से निभा रही थीं. कोई भी मौसम हो इनको बड़ी जातियों के सामने से चप्पल हाथ में लेकर निकलना पड़ता था.

ललितपुर से सटे महरौनी, मड़ावरा ब्लाॅक और रमेशरा गांव की दलित महिलाएं बताती हैं कि 40 से 60 वर्ष की महिलाएं ससुराल में अपने से बड़े पुरुषों जैसे ससुर, ज्येष्ठ, नन्दोई या बड़ी जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनकर नहीं जा सकती हैं.

अपने ही घर के पुरुषों या ऊंची जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनकर किसी महिला का जाना इज्जत और मर्यादा का विषय माना जाता है. सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि पुरुष भी ऊंची जाति के सामने चप्पल पहनकर नहीं जाते हैं.

देना पड़ता था जुर्माना

रानी देवी ने बताया कि 'अगर गलती से चप्पल पहनकर बड़े लोगों के सामने चले गए तो वो हमपर जुर्माना लगाते हैं. उस पैसे को गांव के मंदिर में रख देते हैं जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल किया जाता है.'

क्या बोले रमेशरा गांव के प्रधान

इस मामले में रमेशरा ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान शैलेंद्र सिंह ने बताया कि 'ये परम्परा सदियों से चली आ रही थी. लेकिन अब 2 प्रतिशत ही बड़े-बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष बचे हैं जो इस परम्परा को निभा रहे है. बाकि ये प्रथा अब पूरी तरह से समाप्त हो गई है. क्योंकि आज के युग में गांव के काफी नौजवान शिक्षित हो चुके हैं. वहीं ये युवा वर्ग अब इस परंपरा को नहीं मानता है.'

बुर्जुग निभाते हैं आज भी ये परंपरा

महरौनी गांव की राधा देवी ने बताया कि 'चाहे जितनी सर्दी हो, तपती धूप हो, हमें बड़ी जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनने की इजाजत नहीं थी. लेकिन आज भी प्रधान के पास हमारे बुजुर्ग चप्पल पहनकर नहीं जाते. अगर जाते भी हैं तो हाथ में चप्पल लेकर जाते हैं.'

मुझे जानकारी नहीं: DM ललितपुर

वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के बारे में ललितपुर के डीएम मानवेंद्र सिंह ने बताया कि 'मेरे संज्ञान में ऐसा मामला पहली बार सामने आया है. मुझे इसकी जानकारी नहीं है. मैं प्रत्येक रविवार को गांव में चौपाल लगाता हूं, लेकिन मुझे आजतक ऐसी कोई बात सुनने को नहीं मिली. इस मामले के बारे में विस्तार से जानकारी जरूर हासिल करूंगा.'

विरोध करने वाली महिलाओं की संख्या कम

ललितपुर गांव की रहने वाली मीरा बताती हैं कि 'आज हम अपने घर से चप्पल पहनकर निकलते हैं. विरोध करने वाली महिलाओं की संख्या अभी बहुत ज्यादा नहीं है, पर बदलते समय के साथ एक दूसरे के देखा-देखी नई नवेली बहुएं चप्पल पहनकर निकलने लगी हैं.' बदलते वक्त के साथ अब इन महिलाओं की चप्पल हाथों की बजाय पैरों की शोभा बढ़ा रही हैं.

(साभार- न्यूज 18) 

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