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मैंने तो कुछ नहीं मांगा, मेरा ग्लास क्यों छीना: अाहत 'शराबी'

मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की है कि वो चरणबद्ध तरीके से शराब पर पाबंदी लगाएगी.

Piyush Pandey Updated On: Apr 11, 2017 05:19 PM IST

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मैंने तो कुछ नहीं मांगा, मेरा ग्लास क्यों छीना: अाहत 'शराबी'

ये सरकारों को हो क्या गया है? रोटी, कपड़ा और मकान लोगों को आज तक दिला नहीं पाए हैं, और जिस एक चीज के लिए लोग कभी सरकार के पास नहीं जाते. कितनी भी महंगी होने के बावजूद कभी आंदोलन नहीं करते. कभी सब्सिडी नहीं मांगते.

दुकानें कितनी भी दूर हों, अपनी मेहनत और पूंजी से खुद हासिल कर लेते हैं, उसकी बिक्री पर रोक लगाने की साज़िश रची जा रही है. जी-शराब.

मध्य प्रदेश सरकार ने अब घोषणा की है कि वो चरणबद्ध तरीके से शराब पर पाबंदी लगाएगी.

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इस तरह के संकेत दिए हैं. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट राजमार्गों के 500 मीटर इधर-उधर शराब के ठेकों पर पाबंदी लगा दी.

बिहार सरकार पहले ही पाबंदी लगा चुकी है. यह देश के शराबियों के लिए सबसे मुश्किल वक्त है लेकिन किसी नई कविता लेखक ने उनके दर्द को अपनी कविता का विषय नहीं बनाया.

चूंकि मैं कवि नहीं हूं, इसलिए कविता नहीं लिख सकता अलबत्ता उनके दर्द को जानने के लिए एक शराबी के पास पहुंचा और एक शराबी का इंटरव्यू किया.

शराबबंदी की अलग अलग सरकारों की कोशिश को आप किस नज़र से देखते हैं?

ये सरकारों की साजिश, और हम शराबियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है. सरकार महिलाओं की बातों में आकर और तोड़फोड़ की गैरकानूनी हरकतों के दबाव में ऐसे अंसवैधानिक कदम उठा रही है.

उसकी नजर महिला वोट बैंक पर है लेकिन वो भूल रही है कि शराबियों का भी एक वोट बैंक है.

दिक्कत यह है कि आज तक शराबियों ने भलमनसाहत में कभी अपने वोट बैंक की ताकत नहीं दिखायी.

कभी किसी सरकार का तख्ता पलट नहीं किया.  फिर, जब संविधान हमें कहीं भी रहने की आजादी देता है तो कुछ भी पीने की भी आजादी है. हम सरकार के सामने भीख नहीं मांगते.

आपका अगला क्या कदम होगा?

guywine

ये अच्छा सवाल है. दरअसल, हम शराबियों के साथ परेशानी यह है कि हमारा कोई राष्ट्रीय नेता नहीं है.

हमारी कोई पार्टी नहीं है. पीने के आधार पर अलग अलग गुट बने हुए हैं. किसी को वोडका पसंद है. किसी को व्हिस्की. किसी को देशी ठर्रा.

सबके अलग गुट हैं. हम साथ साथ नहीं है तो सरकार की तानाशाही के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रहे. फिर शराबी समाज मूलत: शांतिपसंद होता है. वरना देखिए, हमने कभी रेल की पटरियां नहीं उखाड़ीं.

कभी कोई दंगा नहीं किया. कभी तोड़फोड़ नहीं की तो टीवी चैनलों पर हमारी समस्याओं पर कभी बहस नहीं हुई.

वैसे, मेरे विचार से अब हमें जंतर मंतर पर प्रदर्शन शुरु कर देना चाहिए. शराबी राजनेताओं के साथ लॉबिइंग शुरु करनी चाहिए. और अलग अलग गुटों वोदका-व्हिस्की-रम-ठर्रे के भेद से ऊपर उठकर शराबी हित की बात करनी चाहिए.

लेकिन, शराब पर रोक लग जाए तो बुराई भी क्या है?

क्या फालतू बात करते हैं. वेद-पुराणों में सोमरस का जिक्र है. जो पेय ईश्वर निर्मित है-उस पर पाबंदी तो पाप है.

आप दारुबाज हैं, लिहाजा आपका पक्ष मैं समझ रहा हूं. पर आपको नहीं लगता कि दारुबाजी सेहत के लिए खतरनाक है और इसे छोड़ देना ही फायदेमंद है?

आप शायद पीते नहीं है. इसीलिए इस तरह के फालतू तर्क दे रहे हैं. दारु पीने से भूख बहुत लगती है.

दारु पीने के बाद आदमी के भीतर एक झटपटाहट होती है,जो शरीर को एक्टिव बनाती है. हार्ट-लीवर फेल वाली बात बकवास है. जिनका फेल होना होता है,वह कुर्सी से गिरकर हो लेता है.

दारु से एक पॉजिटिविटी आती है. एक कॉन्फिडेंस आता है. बंदा अंग्रेजी न बोल पाता हो तो उसे दारु पिला दो...वो अंग्रेज से भी तेज अंग्रेजी बोल सकता है. चूहे को शेर से लड़ाना हो तो शराब पिला दो.

बारातों में नागिन नृत्य बिना शराब पिए संभव ही नहीं है. इस तरह सांस्कृतिक नृत्य शैली को बचाए रखने में शराब का योगदान है.

लेकिन, समाज पर बुरा असर पड़ता है.

फिर वही बाहियाद तर्क. हरिवंश जी कह गए हैं कि मंदिर मस्जिद बैर कराए मेल कराए मधुशाला. धर्मनिरपेक्ष-जातिनिरपेक्ष और अर्थनिरपेक्ष बनाती है दारु.

एक निजी सवाल. आपने दारु कब पीना शुरु की.

मैंने शादी के बाद शराब पीनी शुरु की. एक साल तक रोज शाम को पत्नी को आईलवयू बोला तो दूसरे साल से उसे आदत पड़ गई.

जिस दिन आईलवयू न बोलो तो अगले दिन खाने में तेज नमक झोंक दे. ज्यादा गुस्से में हो तो तेज़ मिर्च उढेल दे.

और यकीं जानिए कोई भी गंभीर बंदा होशो हवास में बीवी को रोज आईलवयू नहीं बोल सकता.

एक मित्र की सलाह पर मैं पीने लगा और फिर चमत्कार हो गया. घर पहुंचते ही बीवी को आईलवयू बोलने लगा.... अब पत्नी भी खुश है और अपन भी.

आपकी पसंदीदा फिल्में.

देवदास और शराबी.

ये बताइए कि दारुबाजी छोड़ने के विषय में कभी नहीं सोचा.

सच कहूं तो अभी कुछ दिनों पहले ही सोचा था. यह खतरा मोल लेते हुए भी कि बीवी को आईलवयू कैसे बोलूंगा-मैंने दारु छोड़ने का प्लान बनाया था.

लेकिन, जिस दिन दारु छोड़ कर बैठा, मैं सोचने लगा. सोचने लगा तो दिमाग घनचक्कर हो गया.

आलू कमबख्त देखते देखते 50 रुपए किलो पहुंच चुका है. बिजली का बिल 5000 रुपए महीने का आ रहा है.

बच्चों की फीस ने कमरतोड़ दी है. दारु का अध्धा भी 300 से कम का नहीं है. यानी इस महंगाई में ज़िंदा रहना है तो सोचना छोड़ना होगा. और सोचना छोड़ने की एक ही दवा है दारु .

लेकिन बात इतनी भी नहीं थी. सरकार की कुछ नीतियों के खिलाफ बोला तो राष्ट्रद्रोही कहने लगे लोग और फिर कुछ बातें सरकार की अच्छी लगी तो भक्त-भक्त कहा गया.

फिर-शराब पीकर वो ही बात बोली तो किसी ने सीरियसली नहीं लिया. दरअसल, शराब अपने आप में एक रक्षा कवच भी है, और होश में रहते हुए बेहोशी जाहिर करने की दवा भी.

इस दौर में ऐसी दवा बहुत जरुरी है. फिर, शराबी शराब पीकर थोड़े नशे में रहता है तो बुराई क्या है.वरना, आजकल किसी को ताकत का नशा है तो किसी को पैसे का.

नशे में तो सब हैं, गाली सिर्फ शराबियों को क्यों. सोचिए...और मुझे पीने दीजिए. गेट आउट !!!

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