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हे अन्नदाता! कभी मंत्री जी का काफिला निकले तो अपना खेत छिपा लेना वरना गुबार देखते रह जाओगे

मंत्री जी का काफिला किसान के खेत को रौंद कर चला गया. खड़ी फसलों को पहिये निगल गए और बाद में मुआवजे में चंद नोट पकड़ा गए

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Oct 27, 2017 11:59 AM IST

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हे अन्नदाता! कभी मंत्री जी का काफिला निकले तो अपना खेत छिपा लेना वरना गुबार देखते रह जाओगे

अक्सर किसान की कहानी किसी कर्ज से शुरू होती है और फिर त्रासदी पर जाकर सिमट जाती है. इस बार भी यही हुआ. एक किसान की खड़ी फसल चौपट हो गई. वो फसल बेमौसम बारिश का शिकार नहीं हुई. न तो खेत पर ओलों की बरसात हुई और न ही कोई जानवर लहराती फसलों को रौंद कर गया. बल्कि किसान की फसल किसान की ही गलती की वजह से बर्बाद हो गई.

दरअसल एक मंत्री जी के काफिले के सामने अन्नदाता का खेत आ गया. उसके बाद काफिला निकल गया और किसान गुबार देखता रह गया. खड़ी फसल को मंत्री जी का काफिला कुचलता हुआ निकलता रहा और अपनी मेहनत की मौत को देखकर किसान का दम घुटता रहा.

अन्नदाता के खेत रौंद गए मंत्रीजी

ये वाकया है यूपी के जालौन जिले का. यूपी में योगी सरकार किसानों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करती है. योगी सरकार ने बड़ी कर्जमाफी की है. लेकिन विडंबना देखिए कि जिस वक्त सीएम योगी आगरा में ताजमहल का दीदार करने के बाद एक रैली में किसानों के प्रति अपनी योजनाओं की जानकारियां दे रहे थे उस वक्त उनका ही एक वजीर अपने काफिले से खेत रौंदने का काम कर रहा था.

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यूपी सरकार में राज्यमंत्री जय कुमार सिंह जालौन में एक गौशाला का शिलान्यास करने आए थे. गौशाला इसलिए ताकि जानवर खेतों में खड़ी फसल का रुख न करें और फसलें बच जाएं. समारोह खत्म होने के बाद दूसरी जगह जल्दी पहुंचने की जल्दबाजी में किसान का खेत ही शॉर्टकट के रूप में दिखा. वैसे भी राजनीति में किसान ही आसान टारगेट और शॉर्टकट होते हैं. शॉर्टकट के चक्कर में किसान की सरसों की खड़ी फसल को जय कुमार सिंह 'जैकी' की कारों के पहिये रफ्तार में रौंदते हुए आगे बढ़ते रहे.

बात सिर्फ खेत को उजाड़कर मामले को पीछा छोड़ने और मंत्रीजी के आगे बढ़ने की नहीं थी. मंत्री जी तो आगे बढ़ गए लेकिन वो कर्जमाफी का अनोखा गणित भी समझा गए. दरअसल जब अपनी फसलों के नुकसान की भरपाई को लेकर किसान मंत्री जी के चरणों में बैठा तो उसे हर्जाने के तौर पर मात्र चार हजार  रुपए पकड़ा दिए गए. ये रकम न तो खड़ी फसल की कीमत थी और न ही किसी किसान की मेहनत का मेहनताना हो सकता है. ये सिर्फ चुप रहने की कीमत थी ताकि सरकार की किसानों के प्रति संवेदनशील छवि पर आंच न आ सके.

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मुआवजे में मिले चंद नोट

दलित किसान देवेंद्र दोहरे ने कर्ज़ लेकर फसल बोई थी. खेत जोता था. खड़ी फसल से उसकी उम्मीदें खिली हुई थीं. लेकिन जब अपनी ही फसलों के रौंदे जाने की खबर उसे मिली तो वो मंत्री जी के चरणों पर गिर पड़ा. करता भी क्या. कर्ज लेकर खुदकुशी नहीं करना चाहता था. देवेंद दोहरे किसी जमींदार या सूदखोर के सामने कर्ज न चुका पाने की वजह से पैरों पर नहीं गिरा बल्कि वो सूबे की सरकार के मंत्री के सामने अपने खेत के कब्रिस्तान बन जाने पर इंसाफ़ मांग रहा था. कर्ज लेकर बोई फसल पर मंत्री अपनी छाप छोड़ गए और मुआवजे के नाम पर 4 हज़ार रुपये थमा गए.

मंत्री जी ने मीडिया के सामने बाकायदा इसका सरकारी जवाब भी दिया. उन्होंने बताया कि ‘किसान की फसल को जो भी नुकसान हुआ, उसके लिए हम उसे मुआवजा दे चुके हैं. हमारी सरकार किसानों के मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील है. मैंने अभी उसे मुआवजे के तौर पर 4 हजार रुपए दिए हैं.’

वो संवेदना कहां गई?

हालांकि कुछ महीने पहले ही जय कुमार सिंह की संवेदनशीलता की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आई थी. इलाहाबाद हाइवे में एक यात्री बस दुर्घटना का शिकार हो गई थी. हादसे में कई लोगों की मौत हो गई . इससे पहले कि योगी प्रशासन और पुलिस हरकत में आता, उनसे पहले ही जयकुमार सिंह जैकी खुद घटनास्थल पर आनन-फानन पहुंच गए. जयकुमार ने घायलों को अपनी गाड़ी से अस्पताल पहुंचाया और कई जिंदगियां बचाईं.

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जयकुमार सिंह जैकी जहानाबाद से अपना दल के विधायक हैं. अपने लोगों में वो जैकी भैया के नाम से मशहूर हैं. योगी सरकार में वो कारागार मंत्री हैं. ऐसे में मुआवजे की रकम न तो उनके चरित्र से मेल खाता है और न ही किसान की भरपाई को पूरा करता है. सवाल उठता है कि कभी घायलों के लिये मसीहा बना ये शख्स किसान के लिए कठोर कैसे हो सकता है?

किसान की नियति ही अजीब होती है. प्रेमचंद की कहानियों के पन्नों से निकली त्रासदी हो या फिर असल जीवन में अपनी फसलों की जिंदगी के लिए मौसम और बादलों से दोनों हाथ उठाकर गुहार लगाती तस्वीरें हों, किसान का चेहरा कभी बदलता नहीं बल्कि कातर ही दिखाई देता रहा है. किसान की धड़कन को महान उपन्यासकार प्रेमचंद ने सुना और अपनी कलम से उतारा. किसानों को समर्पित 'प्रेमाश्रम' महाकाव्य है तो कर्मभूमि और गोदान जैसे उपन्यास मर्म को झकझोरने वाले उपन्यास हैं.

अगर आज प्रेमचंद होते तो उन्हें ‘सवा सेर गेहूं’ जैसी दूसरी कहानी के लिए होरू, हल्कू और शंकर के बाद नया पात्र देवेंद दोहरे के रूप में मिल जाता. देवेंद दोहरे के साथ दिक्कत ये भी है कि वो फसल बीमा योजना के तहत अगर दावा भी करे तो बीमा विभाग को क्या बताएगा कि उसकी फसलों को कौन रौंद गया? क्योंकि बीमा विभाग प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान पर भरपाई करता है ना कि किसी मंत्री के काफिले से उजाड़ हुई फसल पर. ऐसे में सरकार को ही एक आदेश जनहित में जारी कर देना चाहिए कि कभी उनके इलाके से किसी मंत्री का काफिला गुजरे तो वो अपना खेत जरूर छिपा लें वर्ना कारवां गुजर जाएगा और किसान गुबार देखते रह जाएंगे.

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