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यूपी की दलित राजनीति, ग्राउंड रिपोर्ट (पार्ट-6): दलितों का बौद्ध धर्म अपना लेना क्या समस्या का समाधान है?

मुजफ्फरनगर के इस गांव में अधिकतर दलितों ने अपने नाम के आगे बौद्ध लगा लिया है. बौद्ध धर्म अपनाने की वजह सामाजिक भेदभाव ही है या कुछ और भी?

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: May 11, 2018 12:21 PM IST

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यूपी की दलित राजनीति, ग्राउंड रिपोर्ट (पार्ट-6): दलितों का बौद्ध धर्म अपना लेना क्या समस्या का समाधान है?

एडिटर नोट: बीजेपी, इसकी वैचारिक शाखा आरएसएस और दलितों से पहचानी जानी वाली पार्टियां यहां तक कि बीएसपी भी, पिछले कुछ महीनों में दलित समुदाय से दूर हो रही है. इस समुदाय ने भारतीय राजनीतिक पार्टियों और समाज में खुद को स्थापित करने का नया रास्ता खोजा है. फ़र्स्टपोस्ट यूपी में घूमकर दलित राजनीति का जायजा लेगा. गांवों, शहरों और कस्बों में क्या है दलित राजनीति का हाल, जानिए हमारे साथ:

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने हिंदू धर्म में दलितों की स्थिति को देखकर काफी पहले निर्णय ले लिया था कि वो उस धर्म में प्राण नहीं त्यागेंगे, जिस धर्म में उन्होंने जन्म लिया है. बाबा साहब ने 1950 में ‘बुद्ध और उनके धर्म’ नाम का एक लेख लिखा था. उन्होंने लिखा था कि ‘अगर नई दुनिया पुरानी दुनिया से अलग है तो नई दुनिया को पुरानी दुनिया से अधिक धर्म की जरूरत है.’ 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया. लेकिन बौद्ध धर्म अपनाने से पहले उन्होंने हिंदू धर्म और इसकी जड़ताओं का बारीकी से अध्ययन किया था.

बाबा साहब अंबेडकर के बताए रास्ते पर चलने वाले दलितों के लिए नई दुनिया पुरानी दुनिया से थोड़ी और अलग हो गई है. इसलिए नए धर्म की जरूरत बनी हुई है. दलितों की इसी नई दुनिया को समझने के लिए हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के दलितों एक गांव न्यामू पहुंचे. यहां पिछले दिनों गांव के दलितों ने सामूहिक तौर पर बौद्ध धर्म अपना लिया था.

मुजफ्फरनगर शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर चरथावल प्रखंड में पड़ने वाले न्यामू की आबादी करीब 7 हजार है. इसमें करीब 3.5 हजार मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. दलितों की आबादी 2 हजार के करीब है. इस पिछड़े इलाके में गांव तक सड़क तो पहुंची है लेकिन मरम्मत के अभाव में टूटी-फूटी हैं. नालियों का पानी सड़क पर बहता है. एक प्राइमरी स्कूल दिखता है जिसके मुख्य द्वार पर ही गदंगी का अंबार लगा है. लोग बचते-बचाते इस गांव से गुजरते हैं.

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पिछले साल गांव के दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था

गांव के एक छोटे से मकान के आगे कुछ बड़े-बुजुर्ग और युवा दिख जाते हैं. थोड़ी देर बात करते ही इनमें अपनी मुश्किल बताने की आपाधापी मच जाती है. ये बताते हैं कि जून 2017 में गांव के तकरीबन सभी दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. कहते हैं कि गांव के दलित समाज के भेदभाव से तंग आ गए थे. कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही थी. आजिज आकर इन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया. बौद्ध धर्म अपनाने से पहले इन्होंने चरथावल पुलिस थाने से लेकर कई जगहों पर ज्ञापन सौंपा था. लेकिन उनकी दुर्दशा जानने कोई नहीं आया. जून 2017 में यहां हरिद्वार से धर्मसागर भंते आए थे. गांव के रविदास मंदिर में धर्म परिवर्तन का कार्यक्रम रखा गया था. आसपास के गांवों के दलित भी इस मौके पर आए थे. करीब 800 लोगों ने हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया. बौद्ध धर्म अपनाने वाले सभी लोगों को एक सर्टिफिकेट भी दिया गया.

अब ये लोग खुद को हिंदू कहलाया जाना पसंद नहीं करते. सभी ने अपने नाम के आगे बौद्ध लगा लिया है. बौद्ध धर्म अपनाने की वजह सामाजिक भेदभाव ही है या कुछ और भी? गहराई से बातचीत करने पर पता चलता है कि इनके बौद्ध धर्म अपनाने का एक कारण पिछले साल सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव के दलितों और ठाकुरों के बीच हुआ जातीय दंगा भी है. इन्हें लगता है कि इन दंगों में प्रशासन ने दलितों के साथ नाइंसाफी की है. नरेश बौद्ध कहते हैं, ‘शब्बीरपुर में दलितों के घर में आग लगा दी गई. वहां के ठाकुरों ने बाबा साहब को गाली दी. रविदास जी की प्रतिमा तोड़ दी. कल को ये हमारे घरों में आग लगा देंगे. तो हम क्या करें? इसलिए हमने विरोध में बौद्ध धर्म में अपना लिया.’

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जातीय दंगा भी रहा है धर्म परिवर्तन की वजह

मुजफ्फरनगर के आखिरी छोर पर बसे इस गांव की सीमा सहारनपुर से लगती है. सहारनपुर का शब्बीरपुर गांव जहां 5 मई 2017 को जातीय दंगा हुआ था, यहां से थोड़ी ही दूर पर है. गांव के लोग बताते हैं कि 5 मई की घटना के बाद ये लोग 9 मई को सहारनपुर में हुई दलितों की बैठक में भी शामिल हुए थे. इस बैठक की अगुआई भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण ने की थी. पुलिस ने शांतिपूर्ण बैठक कर रहे दलितों पर लाठीचार्ज कर दिया. फिर पथराव भी हुआ. इस पूरे वाकये से दलित खासे नाराज दिखते हैं. विरोधस्वरूप बौद्ध धर्म अपनाने की बात करते हैं.

बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित अब अपने नाम के आगे बौद्ध लगाते हैं.

बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित अब अपने नाम के आगे बौद्ध लगाते हैं.

गांव के युवा दीपक कुमार बौद्ध कहते हैं, ‘देखो मुसलमानों में कोई छूत नहीं है. ये बीमारी हिंदू समाज में ही है. हम उनके घर जाएं तो हमारे लिए चाय अलग से आएगी और उनके लिए अलग. हमारे बड़े-बुजुर्गों ने सहन कर लिया लेकिन हमारे वश का तो नहीं है. बाबा साहब ने राह दिखाई थी, हम उस पर चल पड़े.’

न्यामू गांव में 2004 में भी कुछ दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था. उस वक्त भी दलितों की हिंदुओं से नाराजगी की वजह जातिगत भेदभाव ही था. गांव के युवा विनय कुमार बौद्ध कहते हैं कि हिंदुओं को जब मुसलमानों से झगड़े की नौबत आती है, तब तो वो कहते हैं कि तुम हमारे हिंदू भाई हो और जब हमारी जरूरत नहीं रहती है तो वो हम पर अत्याचार करते हैं. हमारे साथ भेदभाव करते हैं. हमारे लिए हिंदू से ज्यादा अच्छे मुसलमान हैं. वो हमसे किसी तरह की छूत नहीं मानते. हालांकि जब मैं ये पूछता हूं कि क्या बौद्ध धर्म अपना लेने से उनकी समस्या खत्म हो गई. तो थोड़ी देर के लिए खामोशी छा जाती है. उन्हें कोई जवाब नहीं सूझता. फिर विनय बौद्ध कहते हैं,‘ अब हम बराबर हैं. बौद्ध धर्म में कोई भेदभाव नहीं है.’

विनय और दीपक बौद्ध.

विनय और दीपक बौद्ध.

भीम आर्मी का भी है प्रभाव

इस गांव के दलितों में भीम आर्मी का कुछ प्रभाव है. दलित कहते हैं कि समाज में सहयोग की बात आती है तो वो भीम आर्मी के साथ खड़े होते हैं. 2 अप्रैल को हुए भारत बंद में भी यहां के दलितों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. गांव में भीम आर्मी की तर्ज पर एक पाठशाला चल रही है. हालांकि वो इसे भीम पाठशाला नहीं कहते. दलितों ने अपने बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था मिलकर की है.

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दलितों के लिए राजनीतिक पार्टियों की तरफ से चलाए जा रहे कई कार्यक्रमों से ये गांव दूर ही है. बीजेपी के ग्राम स्वराज अभियान में भी यहां कोई नेता नहीं आया. गांव के दलितों के वोट बीएसपी को जाते हैं. लेकिन यहां बीएसपी का भी कोई नेता नहीं आता. दलितों ने जिस वक्त बौद्ध धर्म अपनाने का कार्यक्रम रखा उस वक्त भी यहां कोई नेता नहीं आया था. गांव वाले कहते हैं कि दूसरी पार्टियों के लोग इसलिए नहीं आते क्योंकि वो मानते हैं कि हम बीएसपी के वोटर्स हैं और बीएसपी के नेता इसलिए नहीं आते कि उन्हें लगता है कि वो नहीं भी आएं तो हम बीएसपी को छोड़कर जाएंगे कहां. हालांकि इस दौरान वो ये भी कहते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां मोदी के चेहरे के नाम पर भी वोट पड़े थे.

पिछले दिनों खबर आई थी कि बीएसपी दलित समुदाय के पास जाकर गांव चौपाल लगाएगी. इसमें दलितों से जुड़ी समस्याओं का हल निकाला जाएगा. अभी तक इस इलाके में ऐसी कोई चौपाल नहीं लगी है. बीएसपी से जुड़े स्थानीय निवासी डॉ गुलबीर कहते हैं, ‘हम नहीं चाहते कि दलितों के लिए चौपाल लगे. हम चाहते हैं कि चौपाल पिछड़ों और सामान्य वर्ग में लगाएं जाएं. दलितों के साथ हो रहे सामाजिक भेदभाव के लिए उन्हें समझाना चाहिए.’

मुजफ्फरनगर के इस पिछड़े इलाके में दलितों के भीतर असंतोष तो है ही. वो आज के राजनीतिक हालात में खुद को फंसा हुआ पाते हैं.

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