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यूपी की दलित राजनीति, ग्राउंड रिपोर्ट (पार्ट 4): हम यहां के ‘अंग्रेज’ हैं- सहारनपुर में जाटोवाला गांव के दबंग दलित

इस गांव में दलित बहुसंख्य आबादी है, इसलिए दलितों को लेकर यहां अत्याचार, जातीय भेदभाव, छुआछूत और दूसरी जातियों से संघर्ष नहीं होता है

Updated On: May 09, 2018 10:46 AM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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यूपी की दलित राजनीति, ग्राउंड रिपोर्ट (पार्ट 4): हम यहां के ‘अंग्रेज’ हैं- सहारनपुर में जाटोवाला गांव के दबंग दलित
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एडिटर नोट: बीजेपी, इसकी वैचारिक शाखा आरएसएस और दलितों से पहचानी जानी वाली पार्टियां यहां तक कि बीएसपी भी, पिछले कुछ महीनों में दलित समुदाय से दूर हो रही है. इस समुदाय ने भारतीय राजनीतिक पार्टियों और समाज में खुद को स्थापित करने का नया रास्ता खोजा है. फ़र्स्टपोस्ट यूपी में घूमकर दलित राजनीति का जायजा लेगा. गांवों, शहरों और कस्बों में क्या है दलित राजनीति का हाल, जानिए हमारे साथ:

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर हाइवे पर बसे एक इलाके का नाम है जाटोवाला. ये पूरा इलाका दलित बहुल है. जाटोवाला की कहानी दिलचस्प है. सरकारी दस्तावेजों में कहीं जाटोवाला का अस्तित्व नहीं हैं लेकिन यहां के लोग इसे जाटोवाला गांव कहते हैं. इस पूरे इलाके के 4-5 गांवों को साथ मिलाकर नाम दिया गया है जाटोवाला. इसमें फतेहउल्लापुर, सहरील्लापुर, महमूदपुर, अक्षरपुर और तारपुर गांव आते हैं. जाटोवाला की कुल आबादी 6 हजार के करीब होगी. जिसमें 80 फीसदी लोग दलित समुदाय से आते हैं. साथ ही घीमर, बनिया जैसी ओबीसी जातियों के लोग भी हैं. तारपुर में कुछ सवर्ण जातियां भी हैं और सहरील्लापुर में कुछ घर मुसलमानों के भी हैं.

अब सवाल ये उठा कि दलित बहुल इलाके का नाम जाटोवाला कैसे पड़ा. इसका जवाब राजवीर देते हैं. फतेहउल्लापुर के दलित समुदाय से आने वाले राजवीर कहते हैं,‘ पहले यहां जाट रहते थे. उनकी घर-जमीनें यहां थीं. लेकिन उन्हें यहां से भगा दिया गया. अब यहां दलितों का बोलबाला है.’ जाट यहां से चले गए लेकिन उनका नाम इलाके के साथ जुड़ा रह गया. राजवीर इस किस्से को गर्व से बताते हैं.

'हमें यहां कोई छू भी नहीं सकता, हम यहां के अंग्रेज हैं'

दलित यहां की बहुसंख्य आबादी है, इसलिए दलितों को लेकर यहां अत्याचार, जातीय भेदभाव, छुआछूत और दूसरी जातियों से संघर्ष नहीं होता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां दलितों पर हाथ डालने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता. राजवीर कहते हैं, ‘यहां तो सारा मामला ठीक है. यहां कोई हमें टच भी नहीं कर सकता. हम यहां के ‘अंग्रेज’ हैं. जात बिरादरी वाला यहां कोई मामला नहीं है.’

राजवीर के साथ खड़े शोभाराम उनकी बात की तस्दीक करते हैं. जाटोवाला में दूसरी बिरादरी के लोग भी दलितों को अपना जैसा ही मानते हैं. इस दलित बहुल इलाके का माहौल शांत है. यहां मंदिर को लेकर कोई समस्या नहीं है, अंबेडकर की मूर्ति लगाने का कोई झगड़ा नहीं है, अंबेडकर जयंती मनाने से इन्हें कोई नहीं रोकता. गांव में एक रविदास मंदिर भी है और एक शिव मंदिर भी. लोग सारे हिंदू देवी-देवताओं को पूजते हैं. न मंदिर में प्रवेश की मनाही है न पूजा करने को लेकर कोई रोक-टोक.

बायीं तरफ राजवीर और दायीं तरफ शोभाराम.

बायीं तरफ राजवीर और दायीं तरफ शोभाराम.

लेकिन अब हो रही है आंबेडकर की मूर्ति लगाने की तैयारी

इलाके में यहां-वहां बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर और पोस्टर दिख जाते हैं लेकिन कोई मूर्ति नहीं है. इस इलाके के दलित इतने दबंग हैं कि उन्हें बाबा साहब की मूर्ति लगाकर अपनी पहचान पुख्ता करने का संकट नहीं दिखता. अब आसपास के दलित आंदोलन और विरोध प्रदर्शन देखकर यहां की भी आबोहवा थोड़ी बदली है. लोग बाबा अंबेडकर की एक मूर्ति लगाने की तैयारी कर रहे हैं.

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पिछले 14 अप्रैल को यहां धूमधाम से अंबेडकर जयंती मनाई गई थी. शोभाराम कहते हैं, ‘यहां अंबेडकर जयंती पर खूब रौनक थी. प्रशासन हमें जयंती मनाने से रोक नहीं सकता. दो बैंड लगाए थे, दो डीजे था. तगड़ा ड्रामा हुआ था.’ वो कहते हैं कि इस जलसे में बीजेपी के कुछ बड़े नेता भी पहुंचे थे.

बीएसपी के कोर वोटर्स, लेकिन 2014 में बीजेपी के साथ, अब निराश

जाटोवाला गांव के लोग राजनीतिक तौर पर सचेत दिखते हैं. ये खुद को बीएसपी के कोर वोटर्स बताते हैं लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां का मिजाज भी बदला था. मोदी लहर ने जाटोवाला गांव के दलितों को भी पिघला दिया था. हालांकि 4 साल बाद अब उनके भीतर बीजेपी को लेकर नाराजगी झलकती है. इलाके में परचून की दुकान चलाने वाले रामशरण कहते हैं, ‘2014 में मैंने बीजेपी के लिए घर-घर जाकर काम किया था. उनके लिए वोटर्स इकट्ठा किए थे. लोगों ने मोदी के नाम पर वोट दिया था. लेकिन अब लोग नाराज हैं. बीजेपी दलितों पर जुल्म कर रही है.’

रामशरण.

रामशरण.

यहां के दलितों पर अत्याचार भले ही नहीं हो रहा हो लेकिन वो पिछले साल हुई शब्बीरपुर की घटना से वाकिफ हैं. चंद्रशेखर रावण को जेल में डालने को राजनीतिक साजिश मानते हैं. ये देशभर में हो रहे दलित अत्याचार की खबरें बताने लगते हैं. ऐसी खबरों ने बीजेपी के लिए दलितों के मन में गुस्सा पैदा किया है.

भीम आर्मी कर रही है प्रभावित

जाटोवाला गांव में भी चंद्रशेखर आजाद रावण के भीम आर्मी का प्रभाव दिखता है. रामशरण कहते हैं कि अब जो चंद्रशेखर कहेगा वही करेंगे. उनकी बात को पास खड़े युवक दीपचंद आगे बढ़ाते हैं. दीपचंद 20-22 साल के युवा हैं. 8वीं तक पढ़ने के बाद शादी करके मेहनत-मजदूरी में लग गए. दीपचंद कहते हैं, ‘ये लोग आरक्षण से छेड़छाड़ कर रहे हैं. दलितों को लेकर इनकी नीयत ठीक नहीं है.’ दीपचंद के पास स्मार्टफोन है. वो फेसबुक का इस्तेमाल करना जानते हैं. भीम आर्मी के बारे में बहुत कुछ जानकारी उन्हें सोशल मीडिया से ही मिलती है.

दीपचंद.

दीपचंद.

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जाटोवाला इलाके में फतेहउल्लापुर से सटा गांव है सहरील्लापुर. यहां हाइवे किनारे चारपाई पर आराम फरमाते तीन बुजुर्ग मिल जाते हैं. शाम के वक्त तीनों दोस्त अपने सामने एक अजनबी को देखकर पहले भांपने की कोशिश करते हैं. फिर खुलकर बात करने लग जाते हैं. इस मंडली में शांति प्रकाश बनिया जाति से हैं, रामपाल भगत धीमर (दलित) समुदाय और मंजूर अली मुसलमान हैं. तीनों ही अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर हल्के तरीके से एकदूसरे पर तंज कसते दिखते हैं.

शांति प्रकाश कहते हैं, ‘देखो बीजेपी बढ़िया काम कर रही है. ये लोग 95 फीसदी फिर वापसी करेंगे. (रामपाल भगत की ओर इशारा करते हुए) ये भी बीजेपी के सपोर्ट में है. और ये (मंजूर अली) समाजवादी पार्टी के साथ है.’ हालांकि बातों-बातों में शांति प्रकाश ये भी कहते हैं कि बीजेपी ने कुछ गलतियां की हैं.

दायें से मंजूर अली, राम भगत और शांति प्रकाश.

बायें से मंजूर अली, रामपाल भगत और शांति प्रकाश.

कई बार दलित और मुसलमान बीजेपी के खिलाफ खुलकर नाराजगी जाहिर नहीं करते. वो कुछ कहने से बचते हैं. लेकिन उनकी मंशा पता चल जाती है. जाटोवाला गांव के तीन दोस्तों के इस मंडली को देखकर खुशी होती है. एकदूसरे से अलग राजनीतिक विचारधारा भी इनकी दोस्ती में कड़वाहट नहीं घोल पाती.

एससी-एसटी एक्ट में बदलाव से गुस्सा

जाटोवाला में हाइवे से लगता एक रविदास मंदिर है. बाहर से देखने पर ये किसी घर जैसा दिखता है. सिर्फ एक ही बड़ा हॉल है, जिसमें सबकुछ जोड़कर रखा गया है. सोने के लिए एक तरफ चारपाइयां बिछी हैं. एक कोने में गैस सिलेंडर और चूल्हे के साथ बर्तन और खाने का सामान रखा है. सामने छोटे से हिस्से में संत रविदास को भी जगह दे दी गई है. संत रविदास के आसपास लाइट वाले झालरें लगाकर थोड़ी बहुत सजावट की गई है.

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अक्सर शाम को यहां दलित समाज के लोग इकट्ठा होकर चिंतन करते हैं. एक ऐसी ही बैठक में मुझे भी शामिल होने का मौका मिलता है. मैं माहौल को भांपने के लिए सबसे मुश्किल मानकर पहला सवाल दागता हूं- ये एससी-एसटी एक्ट में जो बदलाव हुआ है, उसके बारे में क्या जानते हैं. छत्तर सिंह समझाने के अंदाज में कहते हैं, ‘ये बहुत बुरा हुआ है. अब अगर हमारे साथ कुछ होता है तो एसडीएम पहले जांच करेगा फिर गिरफ्तारी होगी. पहली बात कि एसडीएम हमारी क्यों सुनेगा. हमारी तो रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती है. जांच में उलझाकर दलितों को परेशान किया जाएगा.’

मैं सवालिया लहजे में कहता हूं कि ये तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला है इसमें सरकार क्या करेगी? जवाब में एकसाथ कई आवाजें आती हैं- ‘अजी ये सब इन्हीं का है. सुप्रीम कोर्ट भी और सीबीआई भी.’

इनकी नाराजगी दूर करने के लिए मैं कहता हूं कि कम से कम आपको इस बात से खुश होना चाहिए कि सरकार ने एक दलित को राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर बिठाया. मेरी इस कोशिश को झटका देते हुए लोग कहते हैं कि आपको बता दूं कि राष्ट्रपति कोरी समाज से आते हैं. और कोरी समाज हमारे साथ बैठकर खाना भी पसंद नहीं करता. ये समाज खुद को दलित नहीं मानता. सिर्फ दलित कैटेगरी में होने की मलाई खाता है.

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'सत्ता बदलने के लिए वोट दिया था लेकिन अब पछता रहे हैं'

ये लोग खुद को बीएसपी का कोर वोटर बताते हैं. लेकिन सब इस बात पर हामी भरते हैं कि 2014 में इन्होंने अपने मिजाज से अलग जाकर वोट दिया था. सतीश कुमार कहते हैं, ‘हमने कहा कि भाई कांग्रेस को साठ साल से देख रहे हैं. एक बार सत्ता बदलकर देख लो. मोदीजी को वोट देकर देख लो. क्या पता हमारा प्रधानमंत्री कुछ और ही तमाशा कर दे. इसलिए समीकरण बनाकर मोदी को वोट दे दिया जाए. अब पछता रहे हैं.’

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ये लोग फिर से बीएसपी के साथ हैं. बैठक के एक हिस्से से आवाज आती है कि जब तक मायावती का राज रहा, दलितों में 11 हजार वोल्ट का करंट था. कोई छेड़खानी नहीं होती थी. कोई अत्याचार नहीं होता था. मैं इन्हें थोड़ा उलझाने की गरज से पूछता हूं कि आपलोग तो भीम आर्मी के समर्थक हैं. भीम आर्मी और बीएसपी में से किसी एक को चुनना हो तो क्या करेंगे. लोग मुझे आश्वस्त करते हैं कि पहली बात तो ऐसा होगा नहीं. भीम आर्मी और बीएसपी अलग नहीं है. और अगर ऐसा हो भी गया तो निश्चित तौर पर लोग बंटेंगे.

लोग मानते हैं कि यहां भीम आर्मी का बहुत बड़ा क्रेज है. बिरादरी का शोषण होता है तो भीम आर्मी वाले खड़े होते हैं. ये बताते हैं कि हमारा समाज इतना दबा-पिछड़ा है कि कोई कांड हो जाता है तो हमारी आवाज कोई सुनता नहीं. पुलिस प्रशासन तक हम पहुंच नहीं पाते. अगर भीम आर्मी साथ हो तो पुलिस प्रशासन भी हमारी सुनती है.

सहारनपुर के एक छोर पर बसे बेहट विधानसभा क्षेत्र में आने वाला ये इलाका यूपी का बॉर्डर इलाका है. इसकी सीमाएं उत्तराखंड, हिमाचल और हरियाणा से लगती हैं. यहां के लोग खनन से जुड़े हैं. 12 किलोमीटर दूर हथिनीकुंड के यमुना नदी के किनारे बजरे और रेत के खनन से लोगों की आजीवका जुड़ी थी. 5 साल पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खनन का काम बंद हो गया. अब लोग बेरोजगार हो गए हैं. अब वो मेहनत मजदूरी करने उत्तराखंड और हिमाचल जा रहे हैं. ये इलाका शांत है और यहां के लोग कहते हैं कि ये दलित बहुल इलाका है, इसलिए यहां के माहौल में अशांति नहीं है.

(सभी तस्वीरें: विवेक आनंद)

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