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सियासत से लेकर सोशल मीडिया पर छाया गधा'पुराण', आप भी लुत्फ लें

सोशल मीडिया पर गधों पर लिखी कविताएं खूब शेयर की जा रही हैं

Updated On: Feb 24, 2017 09:15 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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सियासत से लेकर सोशल मीडिया पर छाया गधा'पुराण', आप भी लुत्फ लें

चुनाव यानि लोकतंत्र का महापर्व. कई मर्तबा जब हम चुनाव के बारे में सोचते हैं तो सिर्फ और सिर्फ राजनीति और राजनीतिक बयानबाजी की तरफ ध्यान देते हैं. अक्सर, हमें ऐसा लगता है कि जो कहा जा रहा है या जो कहा गया उसका असर सिर्फ चुनावी नतीजों पर पड़ने वाला है.

लेकिन, जैसा कि हमने पहले कहा- चुनाव का मतलब है लोकतंत्र का महापर्व और अगर कोई चुनाव ‘लोक’ यानि ‘लोगों’ से न जुड़ता हो तो वो चुनाव कैसा.

इस बार के चुनाव में लोकतंत्र के दायरे का विस्तार हुआ है. अजीबोगरीब तरीके से. अनोखे रूप में...आपने कभी सोचा है कि भारतीय राजनीति में गधा इतना महत्वपूर्ण हो जाएगा. उसकी चर्चा भी ऐसी उठेगी कि सीएम से लेकर पीएम तक जवाब देते फिरेंगे.

इस राजनीतिक धमा-चौकड़ी में हुआ ये कि सोशल मीडिया में हिंदी के कुछ शानदार कवियों द्वारा गधे पर लिखी गई कुछ कालजयी रचनाओं का दोबारा जन्म हो गया.

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सोशल मीडिया की भाषा में कहें तो- गधा और गधे पर लिखा साहित्य वायरल हो गया. एक नज़र डालिए इन रचनाओं पर- और जानिए कि आखिर क्यों साहित्य को समाज का आईना कहा जाता है.

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पटना में रहने वाले कवि और लेखक अमिताभ बच्चन ने ऐसी दो कविताएं शेयर की हैं, इसमें से पहली कविता है विष्णु नागर की, जिसकी पंक्तियां हैं:

अगर गधा कुर्सी पर बैठा हो, तो पहली बार ऐसा लगता है

कि नहीं यह उतना गधा नहीं हैं, जितना हम इसे समझ रहे थे

लेकिन हमारी राय फिर भी यही रहती है, कि अंतत: यह है तो गधा ही

और आज नहीं तो कल यह सिद्ध हो जाएगा,

लेकिन कल भी जब वह गधा सिद्ध नहीं होता तो

हम कहते हैं, है तो यह गधा ही

मगर कुर्सी ने इसे सिखा दिया है कि

गधे को भी कम से कम घोड़ा तो दिखना ही चाहिए

इसलिए अभी तक यह बचा हुआ है

और एक दिन जब यह सिद्ध हो जाएगा कि यह गधा है

तो उसी दिन से इसका खेल बिगड़ना शुरू हो जाएगा

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ऐसी ही एक और कविता है कवि भवानी प्रसाद मिश्र की, जिसे ट्वीटर पर शेयर किया है सौरभ गुप्ता ने,  इसकी पंक्तियां हैं:

मैं गंवार हूं और गधा हूं,

क्योंकि वचनों से अपने बंधा हूं,

तुम होशियार हो और हंस हो,

क्योंकि अपने प्रतिज्ञाओं के ध्वंस हो.

हमने जो कह दिया सो करते रहे,

अपने कहे पर मरते रहे,

तुमने जो कहा जो कभी नहीं किया,

जीवन इस इस तरह सुख से जीया,

और फिर भी मैं खुश हूं इस पर

कि मैं गंवार हूं और गधा हूं,

क्योंकि अपने वचन से बंधा हूं.

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ये भी पढ़ें: अखिलेश को गदहे का भी डर है

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने बुंदेलखंड के कवि अखिलेंदु अरजेरिया की ये कविता शेयर की, जिसकी पंक्तियां हैं:

गधा प्रेरणास्रोत है, सुना ये हम ने आज, इसी प्रेरणा से चले, अब भारत में राज? अब भारत में राज, कहा अखिलेश हैं डरते; डरता हर इंसान, गधा जब ढेन्चू करते. कहें "अखिल" कविराय, लगाते हैं जो दुलत्ती; तन मन धन पर वार, खोलते मन की बत्ती.

पत्रकार और कवि त्रिभुवन ने गोपाल प्रसाद व्यास की ये कविता शेयर की है. जो इस तरह से है..

मेरे सुकुमार गधे! 

मेरे प्यारे सुकुमार गधे!

जग पड़ा दुपहरी में सुनकर

मैं तेरी मधुर पुकार गधे!

मेरे प्यारे सुकुमार गधे!

तन-मन गूंजा-गूंजा मकान,

कमरे की गूंज़ीं दीवारें ,

लो ताम्र-लहरियां उठीं मेज

पर रखे चाय के प्याले में!

कितनी मीठी, कितनी मादक,

स्वर, ताल, तान पर सधी हुई,

आती है ध्वनि, जब गाते हो,

मुख ऊंचा कर, आहें भर कर

तो हिल जाते छायावादी

कवि की वीणा के तार, गधे!

मेरे प्यारे...!

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और अंत में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की लिखी कविता की कुछ पंक्तियां..

नेता के दो टोपी औ’ गदहे के दो कान, टोपी अदल-बदलकर पहनें गदहा था हैरान। एक रोज गदहे ने उनको तंग गली में छेंका, कई दुलत्ती झाड़ी उन पर और जोर से रेंका। नेता उड़ गए, टोपी उड़ गई उड़ गए उनके कान, बीच सभा में खड़ा हो गया गदहा सीना तान!

तो बात सिर्फ ये है भले ही हम हमारे राजनेताओं को उनके गिरते भाषणों के कारण चाहे जितना कोस लें...लेकिन ये जान लें कि ‘गधा’ हो या ‘गदहा’..आज के वक्त में उसकी मासूमियत से लेकर बेवकूफियत तक की चर्चा है. सोशल मीडिया पर वायरल है. चौक चौराहों की बहस में शामिल है. कहते थे न कि अच्छे दिन आएंगे...तो आ गए..

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