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डार्विन का सिद्धांत गलत, पढ़ाई जाए नई थ्योरी- बीजेपी HRD राज्यमंत्री

पूर्व आईपीएस ने डार्विन को गलत कहने के पीछे एक अलग ही सिद्धांत दिया है

Updated On: Jan 20, 2018 09:07 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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डार्विन का सिद्धांत गलत, पढ़ाई जाए नई थ्योरी- बीजेपी HRD राज्यमंत्री

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब राजस्थान के मंत्री ने कहा था कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की खोज नहीं की थी. अब केंद्रीय राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने दावा किया है कि डार्विन की थ्योरी ऑफ एवल्यूशन गलत है. इसे बदला जाना चाहिए और नए तरीके से स्कूल कॉलेजों में पढ़ाया जाना चाहिए.

मानव संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह की मानें तो हमारे पूर्वजों ने किसी भी बंदर को आदमी में बदलते नहीं देखा. इसके बारे में नहीं लिखा. इसलिए डार्विन का ये सिद्धांत गलत है. औरंगाबाद के ऑल इंडियन वैदिक सम्मेलन में दिए गए अपने इस 'वैज्ञानिक बयान' में सत्यपाल सिंह ने कहा कि जब से आदमी इस धरती पर है, उसको हमेशा आदमी की तरह ही देखा है. किसी किताब में एवॉल्यूशन का ज़िक्र नहीं है, किसी पूर्वज ने ये नहीं कहा कि उन्होंने किसी को बंदर से इंसान में विकसित होते देखा हो. सत्यपाल सिंह इससे पहले आईपीएस रह चुके हैं.

Charles Darwin

चार्ल्स डार्विन

वैसे मजेदार बात है कि डार्विन के सिद्धांत को खारिज करने की बात एक और शख्स करते हैं. कई वजहों से हिंदुत्ववादी संगठनों के निशाने पर रहने वाले ज़ाकिर नाइक भी डार्विन के सिद्धांत को गलत कहते हैं. जाकिर इसके समर्थन में एक तर्क भी देते हैं. वो कहते हैं कि ऊपरवाले ने हर चीज़ को पर्फेक्ट बनाया, इंसानी आंख किसी भी कैमरे से ज्यादा अच्छी और देखने के लिए पर्फेक्ट हैं. विज्ञान कभी इसकी बराबरी कभी नहीं कर सकता है. हालांकि जाकिर नाइक ये बात आंखों पर चश्मा लगाकर कहते हैं. वैसे डार्विन ने जब अपना एवॉल्यूशन का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा था, दुनिया भर में इसकी आलोचना हुई थी. अब भी डार्विन का सिद्धांत अक्सर गलत तरीके से समझा जाता है. डार्विन ने विकास का सिद्धांत दिया, न कि ये कहा कि इंसान पहले बंदर था, आचानक से इंसान में बदल गया. आइए डार्विन के सिद्धांत को आसान तरीके से समझते हैं.

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क्या है डार्विन का सिद्धांत

डार्विन 4-5 साल बीगल नाम के जहाज पर घूमे. इस सफर में उन्होंने कई रोचक जगहों के बारे में खूब नोट्स बनाए. बाद में किताब लिखी, ‘ओरिजिन ऑफ द स्पिशीज’. किताब के हिसाब से क्रमिक विकास में एक प्रजाति के जानवरों में कुछ जमीन पर रहने लगे, कुछ पेड़ों पर बस गए. इसके चलते उनके अंग उसी हिसाब से विकसित हो गए. लाखों सालों में ये अंतर इतना बढ़ गया कि प्रजातियां एक दूसरे से बिलकुल अलग हों गईं.

मतलब, आपके और आपके शहर के चिड़ियाघर में बंद चिंपैंजी के परदादा के परदादा के दादा... एक ही थे. आसानी से कहें तो रीढ़ की हड्डी वाले स्तनधारी जीव का एक बेटा पेड़ पर रहने लगा. एक जमीन पर सीधा चलकर खेती बाड़ी में लग गया तो उसे हम इंसान (होमो सेपियंस) कहने लगे. दूसरे ने पेड़ पर रहना सीख लिया तो हम उसे ओरैंगुटैन (पॉन्गो) कहने लगे. इंसान और ओरैंगुटैन का डीएनए 97 प्रतिशत तक आपस में मिलता है. मगर इसका मतलब ये नहीं कि ओरैंगुटैन के डीएनए में तीन प्रतिशत बढ़ने से वो इंसान बन जाता है. दोनों के पूर्वज करोड़ों साल पहले एक थे. करोड़ों सालों के विकास में अलग अलग आदतों के चलते इंसान और ओरैंगुटैन के डीएनए में ये फर्क आ गए. वैसे जानवरों में करीबी पूर्वज होने का मतलब ये कतई नहीं कि दोनों का रंग,रूप और आकार मिलता जुलता हो. जुरासिक पार्क में दिखाए गए सबसे खतरनाक डायनासोर टी रेक्स का डीएनए के आधार पर सबसे करीबी रिश्तेदार मुर्गा है. कह सकते हैं कि आज आप चिकन खा रहे हैं, एक जमाना था जब चिकन आपको खा सकता था. तो डार्विन के हवाले से कह सकते हैं कि आदमियों और बंदरों के पूर्वज एक हैं. न कि आदमियों का पूर्वज बंदर है.

सबसे योग्य ही जिंदा रहता है

Darwin Theory

(फोटो: फेसबुक से साभार)

डार्विन के नाम पर एक बात और इस्तेमाल की जाती है.‘Survival of the fittest’ वाक्य को डार्विन की सर्वाइवल थ्योरी की तरह खूब इस्तेमाल किया जाता है. मगर असल में ये फ्रेज पश्चिमी दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर का लिखा हुआ है. डार्विन ने बताया था कि प्रकृति सबसे योग्य का चुनाव करती है.

उदाहरण के लिए अफ्रीका में पहले लंबी और छोटी गर्दन वाले जिराफ होते थे. वहां की जलवायु में ऊंचे-ऊंचे पेड़ ही होने लगे तो छोटी गर्दन वाले जिराफ मर गए और लंबी गर्दन वाले बचे रहे. हालांकि डार्विन इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाए कि दो तरह की गर्दन वाले जिराफ विकसित ही क्यों हुए.

अकेले डार्विन का ही नहीं था एवोल्यूशन का सिद्धांत

Charles Darwin

डार्विन का मजाक उस समय भी खूब उड़ा

ब्रिटेन के वेल्स में पैदा हुए वैज्ञानिक अल्फ्रेड वॉलेस का भी डार्विन की विकास की थ्योरी में योगदान है. वॉलेस लंबे समय तक दुनिया भर में घूमे और अपनी रिसर्च की. डार्विन के साथ उनका पत्राचार होता था. बताया जाता है कि डार्विन 'थ्योरी ऑफ एवोल्यूशन' को दुनिया के सामने रखने में डर रहे थे क्योंकि उन्हें चर्च के विरोध का डर था. वॉलेस ने डार्विन को प्रेरित किया. पहली बार जब ये थ्योरी दुनिया के सामने आई तो इसमें दोनों का नाम था. वॉलेस को जीव विज्ञान की दुनिया में उनके काम का क्रेडिट मिलता है मगर आम जनता में डार्विन ही लोकप्रिय हैं.

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