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बजट 2017: क्या सरकार से मिलेगा 'गरीबी टैक्स?'

सुझाव है कि एक सीमा से नीचे की आमदनी वालों को सरकार एक निश्चित दर से पैसा दे यानी सरकार उन्हें 'गरीबी टैक्स' चुकाए!

Qamar Waheed Naqvi Qamar Waheed Naqvi Updated On: Jan 19, 2017 07:29 AM IST

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बजट 2017: क्या सरकार से मिलेगा 'गरीबी टैक्स?'

क्या मोदी सरकार गरीबों को नकद पैसा बांटनेवाली है? क्या सरकार वाकई यूनिवर्सल बेसिक इनकम की योजना लाने की तैयारी कर रही है कि हर गरीब को हर महीने या हर साल एक बंधी रकम सरकार से मिलने लगे? मोदी सरकार के अगले बजट में ऐसा कोई धमाका हो सकता है, इसकी बड़ी अटकलें हैं.

इसी बीच गरीबों को पैसा बांटने के लिए एक और दिलचस्प सुझाव आया है. वह है 'निगेटिव इनकम टैक्स' का. इसे आप आसान भाषा में समझने के लिए 'गरीबी टैक्स' भी कह सकते हैं. सुझाव है कि एक सीमा से नीचे की आमदनी वालों को सरकार एक निश्चित दर से पैसा दे यानी सरकार उन्हें 'गरीबी टैक्स' चुकाए!

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अब बजट में सचमुच ऐसी कोई ऐसी घोषणा होगी या नहीं, यह तो दावे के साथ कोई नहीं कह सकता, लेकिन सरकार में 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' यानी UBI पर चर्चा तो बड़ी गम्भीरता से हो रही है. संभावनाओं की पड़ताल हो रही है. सोच-विचार जारी है कि क्या ऐसा हो सकता है? और अगर हो सकता है, तो कैसे? क्या सरकार इतना बोझ उठा पाने की हालत में है? इतना पैसा आयेगा कहां से?

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यहां यह बता दें कि 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' या UBI एक बिलकुल नई अवधारणा है, जिस पर विकसित देशों में हाल में विचार शुरू हुआ है.

इसके तहत यह माना जाता है कि देश के हर नागरिक की कुछ न्यूनतम बुनियादी आमदनी होनी चाहिए और अगर नागरिक खुद उतना नहीं कमा पाते, तो सरकार को उसकी भरपाई करनी चाहिए.

अभी इसी 1 जनवरी से फिनलैंड में ऐसा ही एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ है. भारत में भी मध्य प्रदेश में 2011 में ऐसे दो पायलट प्रोजेक्ट कुछ समय के लिए चलाये गये थे.

असाधारण होगा आम बजट

तो मोदी सरकार क्या देश भर में गरीबों को कुछ न्यूनतम बुनियादी कमाई की गारंटी देने या 'निगेटिव इनकम टैक्स' जैसा बड़ा कदम उठा सकती है? जब पिछले पांच-सात सालों से केन्द्र सरकार अर्थव्यवस्था पर 'सब्सिडी' के भारी भरकम बोझ का रोना रोती रही है. जब ईंधन गैस तक की सब्सिडी लोगों से छुड़वाने के लिए मोदी सरकार बाकायदा अभियान चला रही हो. तब क्या करोड़ों लोगों को इतनी बड़ी सब्सिडी देने का बोझ सरकार उठाने के लिए तैयार होगी?

Indian PM Modi listens to FM Jaitley during the Global Business Summit in New Delhi

सवाल तो कई हैं, लेकिन नोटबंदी के तुरन्त बाद पेश हो रहा यह बजट शायद कई मायनों में 'असाधारण' होना चाहिए. इसके तमाम राजनीतिक कारण मौजूद हैं. नोटबंदी से एक तरह से सरकार की बड़ी किरकिरी हुई, क्योंकि कोई काला धन निकला ही नहीं.

जिसके लिए सरकार ने इतनी बड़ी कवायद की थी. और नोटबंदी से अर्थव्यवस्था का इंजन जिस तरह हांफ रहा है, वह सब भुगत रहे हैं. किसानों, मजदूरों, गरीब तबकों और छोटे-मंझोले धंधों पर बुरा असर पड़ा है. जिससे उबरने में समय लगेगा.

नोटबंदी पर सरकार का कहना था कि इससे थोड़े समय की तकलीफ होगी. लेकिन आगे चल कर बड़ा फायदा होगा. तो सरकार को लोगों को कुछ ऐसा करके दिखाना है, जिसे 'नोटबंदी के फायदे' के तौर पर पेश किया जा सके.

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खास कर गरीबों के लिए सरकार को कुछ तो बड़ा करना है. क्योंकि नोटबंदी और उसके बाद डिजिटल इकॉनॉमी की बात करते हुए सरकार की तरफ से बार-बार कहा गया कि इससे जो पैसा सरकार को मिलेगा, वह गरीबों के काम आयेगा.

गरीब तबका तभी से सरकार से बड़ी उम्मीद लगाये है. तो अगर सरकार यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी कोई योजना लाती है, तो गरीबों के खाते में तुरन्त पैसे आने लगेंगे!

इससे एक तो नोटबंदी को लेकर सरकार पर विपक्ष का पूरा हमला ही भोथरा हो जायगा और दूसरे अपनी 'कारपोरेट-मित्र' की छवि को सरकार एक झटके में धो कर 'गरीबों की सबसे बड़ी मित्र' भी बन जायेगी.

पैसा आएगा कहां से

पांच राज्यों में चुनाव हैं. नोटबंदी के झमेले में घिरी सरकार के लिए इन चुनावों में भारी जीत दर्ज करना बहुत ही अहम है. पिछले ढाई साल में विकास का ऐसा कोई कारनामा हुआ नहीं, जिसकी भव्य मार्केटिंग हो सकती हो. नोटबंदी से सरकार को बड़ी उम्मीद थी. वह पूरी नहीं हुई.

तो बजट में ग़रीबों के लिए कुछ बड़ा ही करना होगा. करना तो मध्य वर्ग और कारपोरेट के लिए भी बड़ा ही होगा. इसीलिए पिछले बजटों में अब तक फूंक-फूंक कर कदम रखनेवाली मोदी सरकार शायद इस बार कुछ बड़े आर्थिक सुधारों का जोखिम ले. क्योंकि सरकार के पास अब समय कम है. दो साल बाद ही उसे अगले चुनावों का सामना करना है.

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'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' को लेकर फिलहाल तरह-तरह की चर्चाएं हैं. एक सुझाव यह है कि  यह सिर्फ ढाई करोड़ बेरोजगारों पर लागू हो और उन्हें पांच हजार रुपये सालाना दिया जाये. इस पर खर्च बैठेगा 12 हजार करोड़ रुपये. और हर बेरोजगार को मिलेंगे हर महीने 416 रुपये. लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इससे क्या होगा.

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इसलिए दूसरा सुझाव यह है कि 'अत्यन्त गरीब' की श्रेणी में आनेवाले 20 करोड़ लोगों को हर महीने 1500 रुपये दिये जायें. अगर ऐसा किया जाय तो सरकार पर हर साल तीन लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इतनी बड़ी रकम कहां से आयेगी?

निगेटव इनकम टैक्स योजना

उधर, दो प्रमुख अर्थशास्त्रियों सुरजीत भल्ला और अरविन्द विरमानी ने 'निगेटिव इनकम टैक्स' का सुझाव देते हुए एक नयी 'इनकम टैक्स क्रान्ति' की बात कही है. भल्ला और विरमानी का फार्मूला वाकई देखने में तो बड़ा 'क्रान्तिकारी' लगता है. उन्होंने इनकम टैक्स के सारे आंकड़ों को जोड़ घटा कर निष्कर्ष निकाला है.

सरकार को जो टैक्स मिलता है, उसका कम से कम दोगुना टैक्स चोरी कर लिया जाता है. दूसरी तरफ दस, बीस, तीस प्रतिशत के मौजूदा तीन टैक्स स्लैब की दरें भले ही हैं, लेकिन सब मिला कर सरकार को इनकम टैक्स की औसतन दर 12 प्रतिशत के आसपास ही बैठती है.

इसलिए उनका सुझाव है कि ढाई लाख तक कर-मुक्त आय की मौजूदा सीमा को बरकरार रखा जाय और इसके ऊपर की जितनी भी आमदनी हो, उस पर केवल 12 प्रतिशत की एक ही दर से इनकम टैक्स लिया जाय. इससे टैक्स चोरी रुकेगी, क्योंकि काले धन को सफेद करने के लिए दस-बारह प्रतिशत पैसा तो लोगों को यों ही खर्च करना पड़ता है. तो फिर लोग टैक्स चुराने की झंझट में क्यों पड़ेंगे? दूसरी तरफ, जिन लोगों की कमाई ढाई लाख से जितनी कम है, उसका 12% सरकार उन्हें चुकाए.

मसलन जो बेरोजगार है, जिसकी कोई आमदनी नहीं, उसे ढाई लाख का 12% यानी 30 हजार रुपये सालाना सरकार दे. इसी तरह अगर किसी की सालाना कमाई डेढ़ लाख है, तो वह ढाई लाख से एक लाख कम हुई. उसे एक लाख का 12% यानी 12 हजार दिया जाय, जिसकी कमाई सालाना दो लाख है, वह ढाई लाख से पचास हजार कम है, इसलिए उसे पचास हजार का 12% यानी छह हजार दिया जाय.

Voters line up to cast their votes outside a polling station during the seventh phase of India's general election at Rasan Hedi village in the northern Indian state of Punjab April 30, 2014. Around 815 million people have registered to vote in the world's biggest election - a number exceeding the population of Europe and a world record - and results of the mammoth exercise, which concludes on May 12, are due on May 16. REUTERS/Ajay Verma (INDIA - Tags: POLITICS ELECTIONS) - RTR3N7G2

उनका हिसाब है कि इस तरह से 'निगेटिव इनकम टैक्स' देने के लिए सरकार को 2.9 लाख करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी और टैक्स दर 12% करने से टैक्स चुकानेवालों की जो संख्या बढ़ेगी, उससे इतना राजस्व बढ़ जायगा कि इस 2.9 लाख करोड़ की भरपाई आसानी से हो जायगी.

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इसका एक बड़ा फ़ायदा यह भी होगा कि इनकम टैक्स रिटर्न सबको भरना पड़ेगा. क्योंकि गरीबों को भी अगर सरकार से पैसा लेना है, तो अपनी आमदनी का रिटर्न भर कर ही तो वह क्लेम फाइल कर सकेंगे!

इससे एक फायदा यह भी होगा कि अगर सरकार से पैसा लेना है, तो हर आदमी को बैंकिंग और डिजिटल लेन-देन को अपनाना भी पड़ेगा. इस तरह डिजिटल इकॉनॉमी का लक्ष्य बहुत जल्दी पाया जा सकता है. दूसरी तरफ, संकेत हैं कि बैंकों से नकद निकासी पर सरकार टैक्स भी लगा सकती है. कुल मिला कर अगला बजट दिलचस्प होगा, ऐसा लगता है.

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