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बजट 2017: नोटबंदी से उबारने, सामाजिक विकास पर होगा जोर

लिहाजा यह बजट निवेशकों और उपभोक्ताओं का उत्साह बढ़ाने पर जोर देगा.

Aditi Nayar Updated On: Jan 21, 2017 02:56 PM IST

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बजट 2017: नोटबंदी से उबारने, सामाजिक विकास पर होगा जोर

वित्तीय वर्ष 2017-18 का आम बजट कई बदलावों के साथ आएगा. इस बार रेल बजट को आम बजट का हिस्सा बना दिया गया है. इसे अलग से पेश नहीं किया जा रहा. सरकार अपने खर्चों को योजना व्यय और गैर-योजना व्यय में विभाजित करने की परंपरा को खत्म कर सकती है.

वित्तीय घाटे के अनुमान को भी एक निश्चित आंकड़े से बदलकर, इसे दो आंकड़ों के बीच की सीमा में लाया जा सकता है. मसलन 3 प्रतिशत की बजाय इसे 3-3.5 प्रतिशत की सीमा में दिखाया जा सकता है. अप्रत्यक्ष करों से होने वाली कमाई को वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी के अंतर्गत शामिल करने की पहल की जा सकती है.

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यह बजट ऐसे समय पेश किया जा रहा है जब अर्थव्यवस्था नोटबंदी के बाद दोबारा उबरने के लिए जूझ रही है. इस समय बाजार में सीमित मांग का माहौल है. कॉरपोरेट भी अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में उन्हें भी नोटबंदी के असर से बाहर आने में तीन से छह महीने लग सकते हैं.

कैसे उबारेंगे नोटबंदी की मार से

जाहिर है इस बजट से सरकार निवेशकों और उपभोक्ताओं का उत्साह बढ़ाने की कोशिश करेगी. आक्रामक मौद्रिक नीति के बावजूद सरकार का वित्तीय संकट ऐसा करने की छूट नहीं देता.

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नोटबंदी से सबसे ज्यादा नुकसान मजदूरों और किसानों को उठाना पड़ा है

हमें उम्मीद है कि भारत सरकार इस बजट में आधारभूत संरचना के लिए बजट आवंटन बढ़ाएगी. खासतौर पर सस्ते मकान, सड़क, नवीन ऊर्जा और रेलवे  के लिए और अधिक पैसा दिया जा सकता है. बाजार से पैसा उगाहने के लिए केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को भी छूट दी जा सकती है.

अधोसंरचना में निवेश बढ़ाने से ठेकेदारों और निर्माण क्षेत्र में लगी कंपनियों को थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है.

सरकार की कोशिश बैंको को कर्ज के बोझ से उबारने की भी होगी. बजट के जरिए सरकार बैंकों को देश के विकास में ज्यादा भागीदार बनाना चाहती है. डिजिटल लेन-देन के साथ-साथ नरेगा, खाद्य सब्सिडी, बीमा योजनाओं और दूसरी जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए भी सरकार अधिक बजट मुहैया करा सकती है.

नोटबंदी से जो कमाई हुई है उसे सरकार अधोसंरचना विकास और समाज कल्याण की योजनाओं में खर्च करेगी.

इस बजट में सरकार कॉरपोरेट टैक्स को कम कर सकती है. कॉरपोरेट टैक्स घटाने से सरकार की कमाई में कमी होगी. जाहिर है इसका मतलब होगा कॉरपोरेट को मिलने वाली सुविधाओं में कमी.

टैक्स घटने से राज्यों के हिस्से आने वाली रकम भी कम हो जाएगी. ऐसे में जीएसटी को पर केंद्र और राज्य के बीच गतिरोध बन सकता है. जीएसटी से होने वाले नुकसान के लिए केंद्र पहले ही पांच साल तक भरपाई करने का वादा कर चुका है.

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नोटबंदी के बाद मायूस लोगों में उत्साह भरने के लिए सरकार आयकर छूट की सीमा में कुछ बदलाव कर सकती है.

करों में होगा बदलाव 

जीएसटी सितंबर तक लागू हो पाएगा. लेकिन इससे पहले कुछ करों में हम बदलाव देख सकते हैं. खासकर सर्विस टैक्स को बढ़ाया जा सकता है ताकि उसे जीएसटी दरों के नजदीक लाया जा सके. आयात को सस्ता करने के लिए भी सरकार उससे जुड़े हुए कुछ टैक्सों में बदलाव कर सकती है.

जीएसटी

सौजन्य: जीएसटी इंडिया के फेसबुक वाल से

सरकार, वित्तीय वर्ष 2018 के लिए वित्तीय घाटा 3 से 3.5 प्रतिशत के बीच होने का अनुमान रख सकती है. हमारी जीडीपी के हिसाब से यह घाटा 5.1 लाख करोड़ से 5.9 लाख करोड़ के आसपास रहेगा. इसका मतलब यह हुआ कि हम पर कर्ज भी बढ़ेगा. इसके मुताबिक वित्तीय वर्ष 2017 में 4.1 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले 2018 में 4.3 लाख करोड़ से पांच लाख करोड़ रुपए रहेगा.

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आरबीआई के पास अपनी मौद्रिक नीति में और उदारता बरतने का गुंजाइश नहीं बची है. अमेरिका में भी ब्याज दरें लगातार बढ़ती जा रही हैं. ऐसे में बॉन्ड से होने वाली कमाई के और घटने की आशंका कम ही है.

(लेखक आईसीआरए की प्रमुख अर्थशास्त्री हैं)

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