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आर्थिक सर्वेक्षण 2017: नोटबंदी का अर्थव्यवस्था में नकारात्मक असर

वित्त मंत्री अरुण जेटली ये बजट पेश करना वित्त मंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Feb 01, 2017 10:43 AM IST

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आर्थिक सर्वेक्षण 2017: नोटबंदी का अर्थव्यवस्था में नकारात्मक असर

आर्थिक सर्वेक्षण 2017 को लोकसभा के पटल रख दिया गया है. इस सर्वे में कहा गया है कि 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री ने जिस नोटबंदी का ऐलान किया था उससे फिलहाल तो अर्थव्यवस्था में नकारात्मक असर होगा.

लेकिन सर्वे में सरकार के नोटबंदी के फैसले का ये कह कर भी बचाव किया गया है कि आगे चलकर यह लंबे वक्त के लिए फायदेमंद साबित होगा. सर्वे के मुताबिक नोटबंदी के फैसले से काले धन में कमी आएगी और टैक्स कलेक्शन में सुधार होगा और इससे दीर्घकालिक विकास मुमकिन हो सकेगा.

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने इस बार आर्थिक सर्वे को केंद्रीय वित्त मंत्री को सौंपा है. उनके मुताबिक मौजूदा वित्तीय वर्ष में आर्थिक विकास दर के 6.5 फीसदी रहने की उम्मीद है.

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हालांकि विकास दर के इस आंकड़े के उलट सीएसओ और आरबीआई ने आर्थिक विकास दर के 7.1 फीसदी रहने की उम्मीद जताई थी. जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत के आर्थिक विकास दर के 6.6 फीसदी रहने की बात कही थी.

आर्थिक सलाहकार की चेतावनी

हालांकि, मोदी सरकार की नोटबंदी के फैसले और डिजिटलाइजेशन की मौजूदा प्रक्रिया पर मुख्य आर्थिक सलाहकार की राय जानना काफी दिलचस्प है.

सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने चेताया है कि एक बार कैश की सामान्य आपूर्ति बहाल हो जाने पर अर्थव्यवस्था भी सामान्य हालत में लौट आएगी. सर्वे के मुताबिक, 'जितनी जल्दी अर्थव्यवस्था में पुनर्मुद्रीकरण बहाल होगा उतनी ही तेजी से नोटबंदी का नकारात्मक असर भी कम होगा.'

Economic Survey

इस वित्तीय वर्ष में औद्योगिक उत्पादन दर के 7.4 फीसदी से घट कर 5.2 फीसदी हो सकती है

सर्वे में पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले इस वित्तीय वर्ष में औद्योगिक उत्पादन दर के 7.4 फीसदी से घट कर 5.2 फीसदी रहने की आशंका जताई गई है.

आर्थिक सर्वे में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि नोटबंदी से नकदी पर आधारित सेक्टरों पर नकारात्मक असर होगा. कृषि से लेकर रियल इस्टेट और ज्यूलरी सेक्टर पर नोटबंदी का नकारात्मक असर पड़ेगा.

सर्वे के मुताबिक 'रिकॉर्डेड जीडीपी इनफॉर्मल सेक्टर पर होने वाले असर को छिपा लेगा क्योंकि इनफॉर्मल मैन्युफैक्चरिंग की समीक्षा में फॉर्मल सेक्टर के मानकों का ही इस्तेमाल किया जाता है.'

हालांकि सर्वे में आगे कहा गया है कि, 'लंबे समय में अर्थव्यवस्था जैसे-जैसे सामान्य होती जाएगी अंडरएस्टीमेशन कम होती जाएगी. रिकॉर्डेड जीडीपी में भी सुधार आएगा क्योंकि बैंक में अभी जो पैसा आया है उससे अर्थव्यवस्था में वैल्यू जुड़ेगी.'

डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को लेकर अरविंद सुब्रमण्यन ने अपनी सहमति जाहिर की. लेकिन उन्होंने कहा कि ये बदलाव धीरे-धीरे होगा न कि इसके लिए लोगों पर दबाव बनाया जाए.

सर्वे में कहा गया है कि, 'डिजिटाइजेशन हर मर्ज की दवा नहीं है. ना ही नकदी खराब है. जन नीतियों में दोनों तरह के भुगतान के फायदे और नुकसान में संतुलन को बनाया जाना चाहिए. दूसरी बात ये है कि डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया को नियंत्रित नहीं किया जाना चाहिए.'

अरुण जेटली की चुनौती

मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले और अर्थव्यवस्था को इंसेन्टिव के जरिए कैशलेस बनाने को लेकर मुख्य आर्थिक सलाहकार के ये बयान काफी अहम हैं. हालांकि, इसे लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली की चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं.

Economic survey

नोटबंदी के तीन महीने गुजरने के बाद भी कैश की किल्लत बरकरार है

जैसा कि आर्थिक सर्वे इशारा करता है, वित्त मंत्री को पहले रिमॉनिटाइजेशन प्रक्रिया को तेज कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना होगा. नोटबंदी के तीन महीने गुजरने के बाद भी कैश की किल्लत बरकरार है.

हालांकि, सोमवार को आरबीआई ने एटीएम से नकदी निकालने पर कुछ राहत दी है. लेकिन पूरी तरह से नकद निकासी पर रोक कब तक हटेगी इस बारे में रिज़र्व बैंक ने कोई अंतिम तारीख का ऐलान नहीं किया है.

कैश की किल्लत से इनफॉर्मल सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ है. इससे उपभोक्ताओं की मांग में कमी आई है जिससे रोजगार प्रभावित हुआ है. ऑल इंडिया मैनुफैक्चर्रस ऑर्गेनाइजेशन के स्टडी के मुताबिक नोटबंदी के शुरुआती 34 दिनों में लघु एंव छोटे उद्योगों में 35 फीसदी रोजगार की कमी आई है.

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इन लघु उद्योगों के राजस्व में भी 50 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. इस अध्ययन में पाया गया कि नोटबंदी के बाद सभी लघु एवं मझोले दर्जे के उद्योग में करीब-करीब सारी गतिविधियां स्थिर हो गई थीं.

सुब्रमण्यन ने जिस आर्थिक विकास दर की उम्मीद जताई है और नोटबंदी के असर पर जो बातें कहीं हैं. दरअसल वो इस बात की ओर इशारा करती है कि आखिर क्यों सरकार के लिए अर्थव्यस्था से कैश की किल्लत को जल्द से जल्द खत्म करना जरूरी है.

दूसरी बात जो ये सर्वे कर रहा है वो टैक्स और वित्तीय सेक्टर में सुधार की वकालत है. साथ ही कॉरपोरेट टैक्स में भी कमी लाने की बात कहता है.

बैंकिग सेक्टर की समस्या

इसके अलावा वित्त मंत्री अरुण जेटली के सामने बैंकिंग सेक्टर से संबंधित समस्याओं को निपटाने की भी चुनौती है. हालत ये है कि सार्वजनिक क्षेत्र की 7 बैंकों के पास टियर-1 कैपिटल एडिक्वेसी 8.5 फीसदी से भी कम है और एक अन्य बैंक के पास 8 फीसदी से भी कम.

Economic survey

बैंकों के नॉन परफॉर्मिंग एसेट भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं

इसके अलावा बैंकों के नॉन परफॉर्मिंग एसेट भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं. सितंबर 2016 तक ये आंकड़ा 6 लाख करोड़ तक जा पहुंचा है. जबकि, कुल बैंक कर्ज का ये 8 फीसदी है. समस्या 'बैड लोन्स' और 'रिसट्रक्चर्ड लोन' को लेकर भी है. ये आंकड़ा कुल बैंक कर्ज का 12 से 13 फीसदी तक जा पहुंचा है.

सरकार की इंद्रधनुष योजना के अंदर बैंकों को बेसल-III के तहत 1.8 लाख करोड़ की पूंजी की दरकार है. जबकि सरकार ने वर्ष 2018-19 तक चार वर्षों में 70 हजार करोड़ पूंजी देने की बात कही है. सरकार चाहती है कि 1.1 लाख करोड़ की शेष राशि बैंक बाजार से व्यवस्था करे.

समस्या यहीं खत्म नहीं होती है. राज्य संचालित बैंकों के भी कोई लेनदार नहीं हैं. इससे भी समस्या और जटिल हो जाती है. अब तक बैंकिंग सेक्टर में भी अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है.

मौजूदा वित्त वर्ष में आर्थिक विकास की दर में गिरावट आने की आशंका जाहिर कर मुख्य आर्थिक सलाहकार ने दरअसल वित्त मंत्री को अर्थव्यवस्था का आइना दिखाया है. क्योंकि बुधवार को अरुण जेटली को केंद्रीय बजट पेश करना है.

जैसा कि पहले भी इस बात को चिन्हित किया जा चुका है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ये बजट पेश करना वित्त मंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. क्योंकि वित्त मंत्री को नोटबंदी की मार झेल रहे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का ब्लूप्रिंट तैयार करना है.

इसके साथ ही आर्थिक विकास को और तेजी देनी है. ऐसे समय में वित्त मंत्री अरुण जेटली पर ही सारी उम्मीदें टिकी हैं.

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