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शादी में भांजी को गोद में उठाने वाली परंपरा गैर-इस्लामी, मामा के मन में आ सकता है गलत खयाल: दारुल उलूम

दारुल उलूम देवबंद ने कहा कि एक महिला और उसके मामा के बीच का रिश्ता बहुत पवित्र होता है. मुस्लिम कानून के हिसाब से एक माम कभी भी अपनी जवान भांजी को गोद में नहीं उठा सकता

Updated On: Nov 11, 2018 02:31 PM IST

FP Staff

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शादी में भांजी को गोद में उठाने वाली परंपरा गैर-इस्लामी, मामा के मन में आ सकता है गलत खयाल: दारुल उलूम

विश्व प्रसिद्ध इस्लामी सेमीनरी दारुल उलूम देवबंद हमेशा की तरह अपनी दकियानूसी फतवे के लिए सुर्खियों में है. इस बार सेमीनरी ने अपने फतवे में कहा है कि दुल्हन को डोली तक मां के भाई यानी मामा के गोद में बैठकर जाने वाली रस्म को बंद कर देना चाहिए.

दारूल उलूम के अनुसार जब लड़की यानी दुल्हन का मामा उसे अपनी गोद में उठाकर डोली में बिठाने जाता है, इस दौरान दोनों में से किसी को भी काम- वासना का खयाल आ सकता है. ऐसे में बेहतर होगा कि दुल्हन डोली तक चलकर जाए या उसकी मां इसकी जिम्मेरी उठाए.

इस परंपरा को गैर-इस्लामिक बताते हुए सेमीनरी के एक हाई-रैंकिंग बेंच ने कहा, 'एक महिला और उसके मामा के बीच का रिश्ता बहुत पवित्र होता है. मुस्लिम कानून के हिसाब से एक माम कभी भी अपनी जवान भांजी को गोद में नहीं उठा सकता. अगर इस प्रथा से दोनों में से किसी के भी मन में काम-वासना आती है, तो इस रिश्ते के तबाह होने का खतरा बना रहता है.'

उधर एक और फतवा जारी कर के सेमीनरी ने मुस्लिम समुदाय में शादी की तारीख भेजने के लिए 'लाल खत' की रस्म को गलत बताया है. मुफ्तियों का कहना है कि ये रस्म गैर मुस्लिमों से आई है इसलिए इस रस्म को करना और इसमें शामिल होना जायज नहीं है. बेंच का कहना है कि 'लाल खत' के बजाए साधारण चिट्ठी भेजनी चाहिए या फिर फोन पर बातचीत कर तारीख तय की जानी चाहिए.

इसके अलावा दारुल उलूम ने ऐसे जेवरों को भी पहनने के लिए मना किया है जिस पर कोई इमेज बना हो. विडंबना है कि कई मौलवियों ने दारुल उलूम के इस फैसले का स्वागत किया है.

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