S M L

तीन तलाक की 2 दर्दनाक कहानियां

एक महिला को सोते समय तो एक को उसके पति ने मोबाइल पर तलाक दे दिया.

Updated On: Dec 08, 2016 07:13 PM IST

FP Staff

0
तीन तलाक की 2 दर्दनाक कहानियां

तीन तलाक को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने इस मामले को और गरमा दिया है. हाईकोर्ट ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं है. यहां तक कि पवित्र कुरान में भी तलाक को सही नहीं माना गया है.

वैसे भी इन दिनों पूरे देश में कॉमन सिविल कोड और मुस्लिम शरीयत तलाक कानून में बदलाव को लेकर बहस चल रही है, तो वहीं एमपी में इससे जुड़े दो ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने एक बार फिर 'तीन तलाक' पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

अब इन मामलों में पहल करते हुए एक महिला समाजसेवी और मुस्लिम महिला संगठन ने पीड़िताओं को कानून के जरिए न्याय दिलाने की ठानी है.

दरअसल, ये दोनों ही मामले मध्य प्रदेश में सतना जिले के नजीराबाद इलाके के हैं. जहां पर एक महिला को सोते समय तो एक को उसके पति ने मोबाइल पर तलाक दे दिया.

इसके बाद से ये महिलाएं दो जून की रोटी  को लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं. जबकि पति इन्हें तलाक देने के बाद दूसरी शादी कर अपना घर बसा चुके हैं.

नींद में मिला तलाक

पहला मामला नजीराबाद स्थित शबाना निशा का है. शबाना की शादी 07 जुलाई 2013 को यूपी के बांदा के बसौदा निवासी सलीम सौदागर से हुई थी.

शादी के एक साल बाद जुलाई 2014 में सोते समय उसके पति ने उसे तलाक दे दिया. सोकर उठने के बाद तलाक देने की बात शबाना की देवरानी ने उसे बताई और कहा कि वो घर से चली जाए.

एक पैर से विकलांग शबाना को अब अपने गुजारे के लिए सिलाई बुनाई का काम करना पड़ रहा है.

जबरन मायके भेज मोबाइल पर दिया तलाक

तीन तलाक से जुड़ा दूसरा चौंकाने वाला मामला भी नजीराबाद का ही है. खुशबू की शादी 7 जून 2007 में इलाहाबाद के निरियारी गांव निवासी शाह आलम से हुई थी.

शादी के दो साल बाद से ही ससुराल पक्ष ने उसे दहेज के लिए मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देना शुरू कर दिया. इस बीच उसे एक बेटा भी हुआ, लेकिन उस पर अत्याचार कम नहीं हुए और उसे जबरदस्ती मायके भेज दिया गया.

मायके पहुंचने के एक दिन बाद ही शाह आलम ने उसे मोबाइल पर तलाक दे दिया. अपने तीन साल के मासूम बेटे को पालने के लिए अब खुशबू लोगों के घर में झाड़ू पोंछा कर रही है.

जब उनसे ये पूछा गया कि उन्होंने ये तलाक क्यों मान लिया, तो समाज और परंपरा को लेकर खुशबू की नाराजगी साफ नजर आई.

शरियत का गलत इस्तेमाल

शबाना और खुशबू के बारे में पता चलने पर मुस्लिम समाजसेवी महिला फहमीदा बेगम उनकी मदद को आगे आईं. उन्होंने दोनों महिलाओं को बताया कि उनके पतियों ने शरीयत कानून का बेजा इस्तेमाल किया है और वो न्याय के लिए कानून का सहारा ले सकती हैं. इसके बाद दोनों महिलाओं ने फहमीदा बेगम के जरिए भोपाल स्थित मुस्लिम महिला संगठन को चिट्ठी लिखकर उन्हें न्याय दिलाने की मांग की है.

दोनों महिलाओं के तलाक के मामले में सतना जिला अदालत के शरीयत कानून विशेषज्ञ मकसूद अहमद का मानना है कि जानकारी न होने के कारण मुस्लिम महिलाएं अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ पा रहीं है.

उन्हें लगता है कि महिलाएं शरीयत में दिए हक को पहचान नहीं रही हैं. तलाक से असंतुष्ट होने पर मुस्लिम महिलाएं कानून का सहारा ले सकती हैं. अपने गुजारे के लिए तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं वक्फ बोर्ड से गुजारे की गुहार लगा सकती हैं. जब तक मुस्लिम महिला शादी न कर ले तब तक वो अदालत के जरिए पति से गुजारा भत्ते की मांग भी रख सकती है.

Source: Getty Images

Source: Getty Images

मकसूद अहमद ने कहा कि शरीयत तलाक कानून एक सामाजिक व्यवस्था है जो संविधान और कानून में संरक्षित है. हालांकि, दोनों मामलों के सामने आने के बाद भी उन्होंने शरीयत कानून की वकालत करते हुए उसमें बदलाव और छेड़छाड़ किए जाने की कोशिश को गलत ठहराया.

उन्होंने कहा कि गलत तरीके से दिए गए तलाक की इस्लाम में भी जगह नहीं है, लेकिन इस धार्मिक व्यवस्था में राजनीति की रोटियां सेंकने के खातिर बदलाव करने की कोशिश की गई तो परिणाम सही नहीं होगा और समाज विघटन की ओर जाएगा.

(प्रदेश 18 से साभार)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi