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रास्ता रोककर नमाज़ पढ़ना इबादत नहीं ढकोसला है

मुसलमानों के मज़हबी रहनुमा मुसलमानों को सड़कों पर नमाज़ पढ़ने से क्यों नहीं रोकते? आखिर क्यों ऐसी नौबत आई कि हिंदू संगठनों को सड़क पर जुमे की नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी लगाने की मांग करनी पड़ रही है?

Yusuf Ansari Updated On: May 03, 2018 08:46 AM IST

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रास्ता रोककर नमाज़ पढ़ना इबादत नहीं ढकोसला है

दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम में खुली जगह मुसलमानों के नमाज पढ़ने पर बवाल मचा हुआ है. कई हिंदू संगठनों ने मुसलमानों के सड़क और खाली पड़ी सरकारी ज़मीनों पर नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी लगाने लगाने की मांग की है. इन संगठनों ने धमकी दी है कि अगर प्रशासन ने उनकी मांग नहीं मानी तो वो खुद मुसलमानों को खुली जगहों पर नमाज़ पढ़ने से रोकेंगे. ऐसे में शांति व्यवस्था बिगड़ने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की होगी.

रास्ता रोककर नमाज पढ़ने की क्या जरूरत?

गौरतलब है कि 20 अप्रैल को कुछ लोगों ने गुरुग्राम में एक खाली पड़ी ज़मीन पर जुमे की नमाज़ पढ़ रहे मुसलमानों को रोकने की कोशिश की थी. इस दौरान इन लोगों ने नारेबाजी करते हुए जमकर हंगामा किया था. इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद छह लोगों की गिरफ्तारी हुई. हालांकि सभी को अदालत से ज़मानत मिल गई है. इसके बावजूद कई हिंदू संगठनों ने आरोपियों पर से मुकदमा वापस लेने का मांग करते हुए प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर सड़कों और खुली जगहों पर नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी लगाने की मांग की.

इस घटना से मुसलमानों के मस्जिद के आसपास की सड़कों पर जुमे की नमाज़ पढ़ने का मुद्दा गर्मा गया है. इससे पहले भी इस पर बवाल मच चुका है. सवाल पैदा होता है कि क्या मुसलमानों के किसी खाली प्लॉट पर मुसलमानों के जुमे की नमाज़ पढ़ने से आसपास के लोगों को वाकई इतनी दिक्कत होती है कि इस पर रोक लगाने की मांग की जाए..? दूसरी तरफ मुसलमानों को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उनके नमाज़ पढ़ने से किसी को किसी तरह की तकलीफ न पहुंचे. किसी खाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ने से तो किसी को तकलीफ पहुंचने की बात तो गले नहीं उतरती लेकिन सड़क ब्लॉक करके नमाज़ पढ़ने को किसी सूरत उचित नहीं ठहराया जा सकता.

हदीसों में भी है मनाही

इस संबंध में मैं दो हदीसों का हवाला दूंगा. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद ( सल्लल्लाहु अलैयहि वसल्लम) ने फ़रमाया- 'तुम रास्ते में बैठने से बचो.' लोगों ने पूछा, 'ऐ अल्लाह के रसूल ! यह तो हमारे लिए जरूरी है.'

आपने फ़रमाया, 'अगर तुम्हारे लिए यह ज़रूरी है तो रास्ते को उसका हक दो.' उन्होंने मालूम किया, 'रास्ते का क्या हक़ है ?'

आप (स.अ.व.) ने फ़रमाया, 'निगाहें नीची रखना, तकलीफ़ देने वाली चीजों को रास्ते से हटा देना, सलाम का जवाब देना, नेकी का हुक्म देना और बुराई से मना करना.' - बुख़ारी और मुस्लिम

इस हदीस से पता चलता है कि मुहम्मद (सअव) साहब ने रास्ते में बैठने तक से परहेज करने को कहा है. रास्ता रोक कर नमाज़ पढ़ने की इजाज़त देना तो बहुत दूर की बात है. फिर खुद को मुसलमान कहने वाले और रसूल की कही बातों पर अमल करने का दावा करने वाले हम मुसलमान जुमे की नमाज़ के वक्त मस्जिदों के आस-पास का रास्ता रोक कर वहां नमाज पढ़ने की हिमाकत क्यों करते हैं?

मुसलमानों के मज़हबी रहनुमा मुसलमानों को सड़कों पर नमाज़ पढ़ने से क्यों नहीं रोकते? आखिर क्यों ऐसी नौबत आई कि हिंदू संगठनों को सड़क पर जुमे की नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी लगाने की मांग करनी पड़ रही है. मुस्लिम समाज के भीतर से इस पर पहल क्यों नहीं हुई?

अक्सर देखने में आता है कि जुमे की नमाज के वक्त मस्जिद के आसपास की गलियां ब्लॉक कर दी जाती है. मुसलमान सड़क पर ही मुसल्ला बिछाकर नमाज़ पढ़ते हैं. इस दौरान इन सड़कों पर आवाजाही एकदम रुक जाती है. कई बार लोगों को बड़ी दिक्कतें होती है. लेकिन मज़हब का मामला समझकर लोग इसपर आपत्ति नहीं करते. नमाज पढ़ रहे मुसलमानों को उस रास्ते से गुजरने वालों की दिक्कतों का जरा भी ख्याल नहीं होता. ऐसे मंजर देखकर बड़ी घुटन होती है.

namaz

क्या दूसरों को तकलीफ पहुंचा कर कोई इबादत हो सकती है? मुसलमानों को सोचना चाहिए कि सड़क चलने को लिए बनाई गई है नमाज़ पढ़ने के लिए नहीं. सड़क रोक कर नमाज़ पढ़ना पूरी तरह गैर-इस्लामी है.

इन सात जगहों पर नमाज पढ़ने की है मनाही

मुहम्मद (सअव) साहब ने रास्ता रोक कर नमाज़ पढ़ने से साफ मना किया है. एक हदीस में जिन जगहों पर नमाज़ पढ़ने से सख्त मना किया गया है उनमें रास्ता भी शामिल है. हदीस इस तरह हैः 'सात जगहों पर नमाज़ पढ़ने की इजाज़त नहीं है: 'अल्लाह के घर (काबा) की छत पर, कब्रिस्तान में, गोबर या कूड़े के ढेर (यानी अपशिष्ट क्षेत्रों) पर, जानवरों को ज़िबह करने की जगह, आरामगाह, ऊंटों के आराम करने की जगह और रास्ते के बीच में. ' (तिर्मिज़ी और इब्ने माज़ा)

इस हिसाब से देखें तो मुसलमान नबी के आदेश के खिलाफ काम कर रहे हैं और मज़हबी रहनुमा मुसलमानों से यह ग़ैर-इस्लामी काम करवा रहे हैं. जबकि मज़हबी रहनुमाओं की ज़िम्मेदारी मुसलमानों को ग़लत रास्ते पर चलने से रोकने की है.

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सअव) ने तो आम हालात में लोगों का सड़कों पर बैठना पसंद नहीं फ़रमाया और लोगों को तिजारत वग़ैरह जायज जरूरतों की वजह से वहां बैठने की इजाज़त दी भी तो इन शर्तों के साथ कि वे रास्ता चलने वालों का हक न मारें, उनके लिए परेशानी खड़ी न करें बल्कि अगर उन्हें परेशान करने वाली कोई झाड़ी वगैरह वहां पड़ी हो तो उसे हटा दें.

आज मुसलमान इसका उलटा कर रहे हैं. सड़क पर जहां कुछ भी पड़ा हुआ नहीं है वहां स्टूल वगैरह डालकर या बाइक वगैरह खड़ी करके उसे ब्लॉक किया जा रहा है. ऐसे में परेशान राहगीर मुसलमानों के साथ-साथ उनकी नमाज़ और उनके दीन को भी कोसते हैं. इबादतखाने के बाहर दीन के खिलाफ़ अमल हो रहा है और यह अमल वो करवा रहे हैं जिन पर लोगों को दीन समझाने की ज़िम्मेदारी है.

मुसलमानों को समझना होगा, उनका आदर्श कौन है

ऐसे मौके पर प्रशासन अक्सर ख़ामोश रहता है. उसे अपनी दखलंदाज़ी से बात बिगड़ने का खतरा महसूस होता है. प्रशासन की ख़ामोशी से यह मतलब निकाल लिया जाता है कि उसे कोई आपत्ति नहीं है. जब इस पर कोई आपत्ति करता है तो मुसलमानों का तरफ से अक्सर कहा जाता है कि धार्मिक जागरण और कांवड़ जैसे धार्मिक कार्यों के लिए भी तो सड़कें ब्लॉक कर दी जाती हैं? हर धर्म के लोग सड़कों अपने धार्मिक कार्यों के लिए सड़कों का इस्तेमाल करते हैं.

यह तर्क मुसलमानों को शोभा नहीं देता बल्कि शर्मिंदा करता है. मुसलमान खुद से पूछें कि उनके लिए आदर्श कौन है? अपने धार्मिक कर्मकांड के लिए सड़कें जाम करके लोगों को तकलीफ देने वाले या फिर रास्ते पर राहगीरों के हक का ख्याल रखने की नसीहत देने वाले पैग़ंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (सअव).

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नबी का फ़रमान मुसलमानों के सामने है. मुसलमान उसे मानने के लिए पाबंद हैं. मुसलमानों की ज़िम्मेदारी खुद को दूसरों के सामने मिसाल के रूप में पेश करने की है. उनके लिए यह बिल्कुल मुनासिब नहीं है कि वो दूसरों का गलतियां दिखाकर अपनी गलतियों को सही ठहराएं.

अक्सर मस्जिदों के इमाम जुमे की नमाज़ से पहले अपने खुत्बे में दीन से जुडे़ मसलों पर बात करते हैं. उन्हें सड़क पर नमाज़ की अदायगी जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी दीनी हुक्म की सही जानकारी देनी चाहिए. नमाज़ पढ़ने के लिए रास्ता नहीं रोकना भी लोगों के साथ रहम के बर्ताव में से ही एक अमल है. मुसलमानों को इस दीनी हुक्म पर अमल करके बेहतर नागरिक होने का अहसास कराना चाहिए.

हर शहर में बड़ी-बड़ी मस्जिदें हैं. मुसलमानों को चाहिए कि वो जुमे की नमाज़ के लिए बड़ी मस्जिदों में जाएं. ऐसी मस्जिदों में भी जुमे की नमाज़ शुरू की जाएं जहां अभी जुमे की नमाज़ नहीं होती है. नमाज़ के वक्त से थोड़ा पहले घर या दफ्तर से निकलें. अगर मस्जिदें छोटी हैं तो उनके आसपास की ज़मीन खरीद कर उनका दायरा बढ़ाया जा सकता है.

मस्जिदों में जगह बढ़ाने के लिए कई मंज़िलें बनाई जा सकती हैं. इसके लिए मुसलमान अपने-अपने वक्त और पैसे की कुर्बानी दें. मुसलमानों को यह बात समझनी चाहिए कि अपनी नमाज़ के लिए दूसरों को तकलीफ़ देकर अपने ही दीन को बदनाम करने का उन्हें कोई हक़ नहीं है. दूसरों को तकलीफ पहुंचा कर नमाज़ का ढकोसला तो किया जा सकता है इबादत नहीं का जा सकती.

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