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तीन तलाक: सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोबारा पढ़ने की जरूरत

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क है कि फैसला उनके पक्ष में है क्योंकि अदालत ने सभी पक्षों को एक साथ आने और नया कानून बनाने को कहा है

Updated On: Aug 22, 2017 09:37 PM IST

Hilal Ahmed

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तीन तलाक: सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोबारा पढ़ने की जरूरत

ऐसा लगता है कि विवादास्पद तीन तलाक के प्रचलन पर बहस जल्द खत्म होने नहीं जा रहा है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अगले 6 महीने के लिए तत्काल इस पर तुरंत ‘प्रतिबंध’ लगा दिया है ताकि इस दौरान संसद नया मुस्लिम तलाक कानून तैयार कर सके. लेकिन, इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

वास्तव में इस बात की पूरी संभावना है कि तकनीकी आधार पर दिए गए इस फैसले का इस्तेमाल ‘राष्ट्रवादी सुधार की राजनीति’ को जन्म देने जा रहा है. इसलिए तीन तलाक पर मुसलमानों की क्या स्थिति है, उस पर नजर डालने की जरूरत है. तभी यह परखा जा सकेगा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को किस नजरिए से देखा, समझा या उसका अर्थ लगाया जा रहा है.

याचिका

सुप्रीम कोर्ट में शायरा बानो की ओर से दायर याचिका हमें जरूर याद रखना चाहिए, जिसमें पांच मुख्य मांगें हैं-

पति की ओर से जारी तलाकनामे को अवैध और असंवैधानिक माना जाना चाहिए, क्योंकि यह संविधान की अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करता है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट 1937 को असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह तीन तलाक को मान्यता देता हुआ और निकाह हलाला व बहुविवाह को वैध बताता नजर आता है.

मुस्लिम विवाह कानून 1939 को खत्म किए जाने को भी असंवैधानिक घोषित करना चाहिए क्योंकि यह भारतीय मुस्लिम महिलाओं को द्विविवाह से रक्षा करने में विफल है.

वैध और कानूनी तरीके से मान्य तलाक के द्वारा जिन मुस्लिम पत्नियों की शादी उनके पति ने रद्द की है, वे अपने पति से दोबारा शादी कर सकें, जिसके लिए किसी और के साथ हलाला विवाह न करना पड़े.

याचिका में राज्य को एकसमान नागरिक कानून लागू करने की अपील की गई है ताकि मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके.

supreme court

याचिका पर जवाब

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एएलआईएमपीबी), जिसने इस मामले में प्रतिवादी बनकर हलफनामा दायर किया है, ने निम्न आधारों पर याचिका का विरोध किया :

याचिका में जो प्रश्न उठाए गए हैं वह विधायिका से संबद्ध है.

-पर्सनल लॉ को बदला नहीं जा सकता क्योंकि इससे संविधान के पार्ट तीन का उल्लंघन होता है. किसी समुदाय के पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा नहीं लिखा जा सकता.

-भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 जो समान नागरिक कानून संहिता की वकालत करता है, वह केवल राज्य की नीतियों का निर्देशक सिद्धांत है. उसे जबरन लागू नहीं किया जा सकता. मुस्लिम पर्सनल लॉ पवित्र ग्रंथों- अल कुरान और अल कुरान पर आधारित सूत्रों के मुताबिक है.

-हलफनामे में तर्क दिया गया है कि तीन तलाक भारत में मुसलमानों के बीच आम है. यह कहता है:

-तकरीबन 90 फीसदी मुसलमान सुन्नी हनाफी हैं और बाकी 10 फीसदी में शामिल हैं शैफ और अहले-हदीस. हनाफी का जो रुख इस तीन तलाक के मुद्दे पर है वही शैफ का भी है कि एक बार में ही तलाक प्रभावी हो और शादी तुरंत रद्द हो जाए.

सबको सामान्य तरीके से देखने पर अहले हदीस के धार्मिक रुख का पता नहीं चलता, जो तीन तलाक के प्रचलन को नहीं मानता. अहले हदीस के धार्मिक विद्वानों के साथ एक इंटरव्यू में मौलाना असगर अली इमाम मेहदी ने तर्क दिया कि वे तीन तलाक के विचार का विरोध करते हैं क्योंकि 'इसमें कुरान और हदीस का पालन नहीं होता' इसका सीधा मतलब ये है कि एआईएमपीएलबी विविध सुन्नी इस्लामिक धार्मिक प्रचलन और मान्यताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता.

मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और उनकी वकालत करने वाले समूहों के बीच भी यह दिलचस्प बहस देखी जा सकती है. उदाहरण के लिए मुस्लिम महिलाओं की अग्रणी संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए), जो लंबे समय से तीन तलाक के खिलाफ अभियान चलाता रहा है लेकिन यह समान नागरिक कानून के पक्ष में नहीं है.

हालांकि इससे जुड़ी महिलाएं शायरा बानो के साथ सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हैं लेकिन वे मानती हैं कि समान नागरिक कानून राजनीति से प्रेरित प्रॉजेक्ट है. बीएमएमए की ओर से प्रकाशित एक रिपोर्ट (तलाक, तलाक, तलाक अब और नहीं: गैर इस्लामी प्रचलन पर प्रतिबंध के लिए मुस्लिम महिलाओं का आह्वान) में तर्क दिया गया है:

'भारत में मुस्लिम कट्टरपंथ पर्सनल लॉ में सुधार पर बात करना नहीं चाहता और दक्षिणपंथी हिन्दू समान नागरिक कानून को आगे बढ़ा रहे हैं. इन दोनों तबकों से चरमपंथी नजरिया सामने आ रहा है और दोनों ही समान रूप से पुरुषवादी हैं.

लिंगभेद और समाज में महिलाओं को सम्मान के सवाल पर इन दोनों की विश्वसनीयता पक्षपातपूर्ण हैं. बीजेपी के घोषणापत्र 2014 में समान नागरिक कानून को लेकर स्पष्टता नहीं है कि इसका मतलब क्या है. क्या वे हिंदू विवाह अधिनियम 1955 को रद्द करने की मांग कर रहे हैं? दूसरी तरफ मुस्लिम रूढ़िवादी तीन तलाक जैसे अत्याचारों पर अपनी आंखें और दिमाग बंद नहीं रख सकते.'

triple talaq

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की फेसबुक वाल से

फैसले को नए तरीके से पढ़ने की जरूरत

मुसलमानों के बीच ऐसी बहस से जोड़कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोबारा पढ़ने की जरूरत है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क है कि फैसला उनके पक्ष में है क्योंकि अदालत ने सभी पक्षों को एक साथ आने और नया कानून बनाने को कहा है. अगर एआईएमपीएलबी को प्रस्तावित नए कानून तैयार करने के लिए आमंत्रित किया जाता है (जैसा कि 1985 में शाह बानो केस में हुआ था!) तो रूढ़िवादी उलेमाओं को मुसलमानों के प्रतिनिधि के तौर पर अपनी खोती प्रतिष्ठा बचाने का मौका मिलेगा.

अदालत की ओर से तुरंत तलाक के प्रचलन पर रोक से इस मामले पर अहले हदीस के रुख को भी मान्यता मिल जाती है. यह ताकतवर सुन्नी वर्ग अब ये दावा कर सकता है कि तीन तलाक असंवैधानिक होने के साथ-साथ गैरइस्लामी भी है. इस रुख से ‘धर्मनिरपेक्ष अल्पसंख्यक अधिकार’ के दायरे में काम करने में उनको सहूलियत होगी.

बीएमएमए की ओर से तीन तलाक और समान नागरिक कानून का तीखा विरोध भी इस फैसले में झलकता है. अदालत ने संसद से कहा है कि वे एक मुस्लिम तलाक कानून बनाएं. समान नागरिक कानून का मुद्दा निश्चित रूप से इससे अलग है. कानूनी रूप से इस साफ रुख के बाद अब मुस्लिम महिलाओं को समान नागरिक कानून पर भी अपना रुख मजबूती से रखने में आसानी होगी.

आखिरकार यह फैसला याचिका से जुड़े महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ताओं और पीड़िताओं को निराश नहीं करता. अदालत ने तीन तलाक के प्रचलन पर संवैधानिक आधार पर सवाल उठाए हैं और सभी दलों से अपील की है कि वे लिंगभेद के प्रति संवेदनशील होते हुए इस मामले पर खासकर मुस्लिम महिलाओं के लिए फ्रेम वर्क तैयार करें.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को संभावित रूप में इन्हीं तरीकों से पढ़ा जाएगा, जो मुस्लिम राजनीतिक व धार्मिक विविधता को व्यक्त करता है और जिन्हें अक्सर तीन तलाक जैसे मुद्दों पर बहस और चर्चा के दौरान नजरअंदाज किया जाता है.

अगर सरकार वास्तव में नए मुस्लिम तलाक कानून के प्रति गम्भीर है तो जिस तरह से कांग्रेस ने शाहबानो केस में उदाहरण रखा था वैसा दोबारा नहीं होना चाहिए. तब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भारत में मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर बुलाया गया था.

इस्लाम और मुसलमानों की पहचान एक नहीं है. इसलिए नए तलाक कानून को निश्चित रूप से उन सभी बेचैनी, आशंकाएं, चिंता और डर को व्यक्त करना चाहिए. इसमें ‘मुस्लिम महिला’ कही जाने वाली श्रेणी भी बेहतर कानूनी तरीके से परिभाषित की जानी चाहिए.

(एसोसिएट प्रोफेसर, सीएसडीएस)

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