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शरीयत से अदालत तक तीन तलाक, क्या सुधरेगी महिलाओं की हालत

खाने में नमक कम ज्यादा होने जैसी बातों पर तलाक खत्म होना ही चाहिए

Tabassum Kausar Updated On: Dec 02, 2017 03:10 PM IST

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शरीयत से अदालत तक तीन तलाक, क्या सुधरेगी महिलाओं की हालत

तलाक, तलाक, तलाक... एक बार में बोले गए ये शब्द एक शादीशुदा मुस्लिम महिला की जिंदगी को दोजख बनाने के लिए काफी हैं. ये तीन लफ्ज जिसके डर के साए में न जाने की कितनी मुस्लिम महिलाएं अपनी जिंदगी बसर कर रही हैं. लंबे अरसे से इन तीन शब्दों ने उन्हें गुलामी की बेड़ियों में जकड़ भी रखा है. कहने को ये शरई रिवाज है, लेकिन असल में देखा जाए तो इसका शरीयत से कोई भी वास्ता नहीं. यही वजह है कि तीन तलाक एक ऐसा मुद्दा बना जिसने प्रदेश से लेकर देश की राजनीति गरमा दी. महिलाएं जब खुलकर सामने आईं तो सरकार से लेकर सामाजिक संगठनों ने उनके हक में आवाज उठाना शुरू कर दिया.

एक तरफ मजहबी अलमबरदार जो तीन तलाक को पूरी तरह से शरीयत से जुड़ा मसला मानते हैं, तो दूसरी तरफ ये मुद्दा अदालत तक पहुंच गया और इन सबके बीच खड़ी हैं मुस्लिम महिलाएं जिनका रुख अब बहुत हद तक साफ हो चुका है. इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर रोक लगा दी. केंद्र सरकार को छह महीने वक्त दिया गया कानून बनाने का. इस कानून के लिए जो हाल ही में जो मसौदा बना, उसमें तय हुआ कि एक बार में तीन तलाक संज्ञेय व गैर जमानती अपराध होगा. तलाक देने वाले शख्स को तीन साल की सजा होगी. पीड़ित और उसके नाबालिग बच्चों को खर्च भी देना होगा. इसका नाम ‘मुस्लिम वुमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज बिल’ रखा गया.

एक बात तय है, तीन तलाक के मुद्दे को उठाकर कहीं न कहीं भाजपा ने मुस्लिम महिलाओं में अपनी पैठ बनाने की कोशिश की. इसका फायदा भी विधानसभा के चुनाव में बीजेपी के हिस्से में आया. तीन तलाक को सियासत से अलग कर देखें तो इसके दुरुपयोग से इंकार नहीं किया जा सकता. इससे महिलाओं की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है. मुस्लिम समाज में चाहे पढ़ा लिखा तबका हो या मिडिल व अपर क्लास फैमिली, दोनों ही जगह महिलाएं इससे घिरी हैं.

क्या कहती है शरीयत

Supreme Court Strikes Down Instant Triple Talaq

इस्लाम में महिलाओं को पाक दर्जा दिया गया है बावजूद इसके तीन तलाक उनके खिलाफ जाता है. मजहब के जानकार मानते हैं कि इस्लाम में महिलाओं को बहुत सुरक्षा दी गई है. तलाक कहीं भी उनके खिलाफ नहीं है. तलाक का हक महिलाओं को भी दिया गया है. पर इसके बाद भी देखा जाता है कि मामूली बातों पर शौहर तीन तलाक देकर एक झटके से बीवी से रिश्ता खत्म कर लेता है. पूरे देश में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं. अब खाने में नमक कम या ज्यादा भर हो जाने पर तलाक तक की नौबत, शौहर की अजीब मानसिकता को दर्शाता है. कभी शराब के नशे में तो कभी ऐसी बातों पर तलाक हो गया तो बिलकुल गैर वाजिब होती हैं.

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दरअसल देखा जाए तो इस्लाम में भी एक बार दिए गए तीन तलाक को गैर शरई माना गया है. जानकार कहते हैं इस्लाम में सबसे बुरी चीज मानी जाने वाली चीज तलाक ही है. यही वजह है कि इस्लामिक मुल्कों में भी तीन तलाक़ पर पर प्रतिबंध है. इस्लाम में निकाह एक कांट्रैक्ट है. मियां और बीबी को बराबर का हक और इख्तियार है. उनके बीच नहीं बनती और वो अलग होना चाहते हैं तो तलाक से पहले सुलह समझौते का पूरा मौका दिया जाता है. फिर भी अगर तलाक की नौबत आती है तो इस्लाम में इसकी अपनी एक प्रक्रिया है जो कि तीन महीने में पूरी होती है. खत, फोन, मैसेज, व्हाट्सएप, ई-मेल से तलाक का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता.

जब जब मुस्लिम महिलाओं ने ये मुद्दा उठाया, उन्हीं इस्लामिक जानकारों ने उनका विरोध किया. बहस तीन तलाक की बुराई छोड़कर इस पर शुरू हो गई कि ये तीन तलाक का मुद्दा मजहबी और इसमें न तो सरकार की दखल उन्हें बर्दाश्त है और ना ही किसी अदालत की. इसका हल शरीयत की रौशनी में ही निकाला जाएगा. बहरहाल तीन साल पहले सत्ता में आई भाजपा सरकार ने इसे मुद्दा बनाया. उधर सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे गंभीरता से लिया. तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं की मानवीयता को प्राथमिकता दी. तीन तलाक पर रोक लगाई. केंद्र सरकार कानून लाने जा रही है. बहुत उम्मीद है कि शाह बानो, शायरा, निदा खान, फरहत नकवी जैसी तीन तलाक की पीडि़तों को कुछ सुकून मिले.

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फिलहाल यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि तीन तलाक को शरीयत के लिहाज से रहने दिया जाए या उसमें अदालती दखल हो. पर इससे इतर जरूरी है कि लोगों की सोच में बदलाव आए. इसमें कोई दो राय नहीं कि शरीयत को ढाल बनाकर बरसों से महिलाओं को बिना किसी ठोस वजह के तलाक का दर्द झेलना पड़ रहा है. यह बात बिलकुल सच है कि अगर मौजूदा वक्त में शरीयत के सिद्धांतों का मूल रूप से पालन किया गया होता महिलाओं की बदतर नहीं होती. जरूरी है कि तीन तलाक जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे को सियासी चश्मे से न देखा जाए बल्कि ऐसा रास्ता निकले जो महिलाओं को सुरक्षा दे सके और ये तभी मुमकिन होगा जब लोगों की जहनी सोच में बदलाव हो.

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