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तीन तलाक जैसी सामाजिक बीमारी का इलाज करना होगा

मुस्लिम महिलाएं सामाजिक और कानूनी न्याय की हकदार हैं

Updated On: Nov 17, 2016 08:32 AM IST

FP Staff

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तीन तलाक जैसी सामाजिक बीमारी का इलाज करना होगा

ज़किया सोमन, नूरजहां नियाज़

यह बेवजह नहीं है कि सामान्य मुस्लिम महिलाएं एकतरफा तलाक को कानूनी रूप से खत्म करने की मांग कर रही हैं. मुस्लिम महिलाएं जितनी संख्या में, जिस भयानक तरीके से तीन तलाक का सामना कर रही हैं, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उसके समर्थक उस दुखद प्रक्रिया को लेकर चिंतित नहीं है.

बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दाखिल करके तीन तलाक को जायज ठहराना विशुद्ध रूप से पितृसत्ता से निकला क्रूर मजाक है. दरअसल, उन्हें तीन तलाक के रूप में होने वाली हिंसा और अन्याय की जमीनी स्थिति के बारे में कुछ भी अंदाजा नहीं है.

भोपाल में हमने एकतरफा तलाक झेल चुकीं युवा महिलाओं से मुलाकात की. यह मुलाकात बेहद दुख से भरी और संवेदनशील रही.हमने उनकी हृदय विदारक कहानियां सुनीं. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की मध्य प्रदेश यूनिट और जन पहल की कुछ स्त्रीवादी दोस्तों ने यह मुलाकात करवाई थी.

हमने तीस ऐसी महिलाओं से मुलाकात की जिन्हें उनके पतियों ने एकतरफा तलाक दिया है और घर से निकाल फेंका है. वे सभी 20 से 25 साल की उम्र की हैं. उन सबकी पढ़ाई बीच में छुड़वा दी गई है. उनमें से एक है जो बीएससी कर रही थी. कुछ मां बन चुकी हैं. उनसे मुलाकात के बाद हम सभी स्तब्ध थे.

ये सभी महिलाएं दतिया, खरगांव, छतरपुर, पीपलगांव, सतना, बड़वानी, भोपाल और खंडवा से अपनी दुख भरी कहानियां सुनाने आई थीं. यह ध्यान देने की बात है कि भयानक यातना सहने के बाद ये महिलाएं न्याय पाने के लिए लड़ने को प्रतिबद्ध हैं. वे चाहती हैं कि तीन तलाक को अनिवार्य रूप से खत्म किया जाए.

उन सभी महिलाओं की कहानियां सुनकर हमने पाया कि उनके तलाक के कारण अलग-अलग थे. कुछ मामले तो ऐसे थे कि महिलाओं को पता ही नहीं कि उन्हें तलाक क्यों दिया गया. ज्यादातर मामलों में तलाक के कारण बेहद मामूली हैं.

एक लड़की को इसलिए तलाक दे दिया गया कि वह अपने साथ पर्याप्त दहेज नहीं लाई थी. दूसरी को इसलिए तलाक दिया गया क्योंकि उसने लड़की को जन्म दिया था. एक और महिला को इसलिए तलाक दे दिया गया क्योंकि उसका चेहरा सुंदर नहीं था! सभी मामलों में तलाक का तरीका ऐसा है जो स्वीकार्य नहीं है.

एक लड़की को रात में तलाक दिया गया, उस वक्त वह सो रही थी. जब वह सोकर उठी तो उसके पति ने कहा कि जब तुम सो रही थीं, मैंने तुम्हें तलाक दे दिया है. अब तुमको अपने माता-पिता के पास वापस चली जाना चाहिए.

एक शौहर ने अपनी बीवी को उसके मामू के जरिये तलाक का संदेश भेजा. एक महिला को उसके पिता के ही सामने पानी की पाइप से पीटा गया और फिर तलाक दे दिया गया. एक महिला के पति ने उसके साथ अपना एमएमएस क्लिप तैयार किया. अब कह रहा है कि उससे तलाक ले ले वरना वह क्लिप वायरल कर देगा.

तीन तलाक की सामाजिक बीमारी की व्यापकता इस तथ्य के सहारे आंकी जानी चाहिए कि एक गांव के एक ही मोहल्ले में 20 से ज्यादा लड़कियां हैं जिन्हें एकतरफा तलाक दिया गया है. अब वे बच्चों के साथ अपने माता-पिता के यहां रह रही हैं.

ऐसे भी परिवार हैं जिसमें दो से अधिक महिलाएं हैं जिन्हें तलाक दे दिया गया है. इन महिलाओं ने अपने वैवाहिक जीवन में परिवार की तरफ से प्रताड़ना झेली है, यहां तक कि पतियों ने यौन प्रताड़ना भी दी है. उनमें से कुछ की हालत इतनी दयनीय है कि अगर वे इस एकतरफा तलाक को स्वीकार न करें तो भी उन्हें नहीं पता कि उनकी सामाजिक हैसियत क्या होगी.

उनके पतियों ने उनका परित्याग कर दिया और अब उन्हें वापस लेने से इनकार कर रहे हैं. उनमें हर लड़की को यह उम्मीद है कि एक दिन उनका पति उन्हें वापस ले जाएगा.

एक लड़की शारीरिक रूप से अक्षम है और बेहद गरीब परिवार की है. उसकी शादी दो साल पहले एक ऐसे आदमी से हुई जो दो बच्चों का बाप था. अब उस आदमी ने उसे तलाक दे दिया है. अब उसके रहने और खाने का संकट है.

हमने देखा कि ज्यादातर महिलाएं गुस्से में हैं और न्याय चाहती हैं. कुछ लड़कियां हैं जो वापस अपनी पढ़ाई करना चाहती हैं ताकि आर्थिक रूप से सक्षम हो सकें. ज्यादातर अपने पति के पास वापस जाना चाहती हैं. इसका कारण समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है.

वे सभी पितृसत्तात्मक तंत्र में जी रहे गरीब परिवारों से हैं जहां लड़की का तलाक के बाद वापस आना किसी कलंक से कम नहीं माना जाता. वे मां-बाप इतने गरीब हैं कि लड़की और उसके बच्चों का खर्च नहीं उठा सकते. उन्हें अपने और बच्चों की शादियां भी करनी हैं.

वे तलाकशुदा लड़कियां शादी नहीं करना चाहतीं. इसके पीछे जो तर्क वह सबसे चिंताजनक है. वे कहती हैं कि अगर दूसरी शादी करती हैं तो दूसरा पति भी उतना ही क्रूर होगा या नहीं, यह उन्हें नहीं पता. इसलिए वे अकेले ही रहना चाहती हैं. जब दूसरी शादी करके दूसरे पति के साथ खुशी की गारंटी नहीं है तो ऐसे में वे पहले पति के साथ ही जाने के लिए संघर्ष कर रही हैं. यही वजह है कि ज्यादातर ने पति द्वारा दिए गए एकतरफा तलाक को स्वीकार्य करने से मना कर दिया है.

वे ऐसा भविष्य नहीं चाहती हैं कि सम्मान और गरिमा के बगैर वे एक के बाद एक शादियां करें और फिर अंत में उन्हें तलाक दे दिया जाए. यही कारण है कि इनमें से कई लड़कियों ने कोर्ट जाकर यह तलाक रद्द करने की अपील की है. कुछ ने हर्जाना पाने के लिए केस दर्ज कराया है तो कुछ ने घरेलू हिंसा का मामला भी दर्ज कराया है. वे सभी इस उम्मीद में हैं कि उनके पति दबाव के बाद उन्हें वापस ले लेंगे. वे वकीलों की व्यवस्था कैसे करती हैं इसकी अलग कहानी है.

तीन तलाक कुरान-सम्मत नहीं है. कुरान के मुताबिक शादी एक सामाजिक अनुबंध है, संबंध-विच्छेद की स्थिति में समन्वय और मध्यस्थता के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था है. कुरान तलाक के लिए 90 दिन की प्रक्रिया पूरी करने पर जोर देता है. लेकिन पीड़ित महिलाओं की कहानी सुनकर पता चलता है कि स्थानीय काजी और मुफ्ती की भूमिका बड़ी भयानक है.

सभी महिलाओं का कहना है कि उनके पति द्वारा दिए गए तलाक को काजी ने जायज ठहराया. कुछ एक केस ऐसे भी हैं जब पति को तलाक पर पछतावा हुआ और उसने तलाक वापस लेना चाहा तो काजी से हराम बताकर ऐसा करने से मना कर दिया.

किसी भी काजी ने दोनों के बीच मध्यस्थता करने या समझौता कराने की कोशिश नहीं की, न ही उसने मर्द के उस अधिकार को चुनौती दी जिसके तहत वह झटपट एकतरफा तलाक दे देता है. कोई हैरानी नहीं है कि उन महिलाओं में इन काजियों के प्रति नाराजगी है क्योंकि उन्होंने इनका जीवन बर्बाद करने में अहम भूमिका निभाई है.

हर महिला अपनी कहानी बताते हुए रो पड़ती है. यह स्वाभाविक है क्योंकि वे बेहद भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक सदमे से गुजर रही हैं. वे ऐसा महसूस करती हैं कि वे अपमानित हुई हैं और उनकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ हुआ है. उन्हें लगता है कि उन्हें शारीरिक और भावनात्मक रूप से इस्तेमाल किया गया है.

ऐसी नई उम्र में हिंसा, खासकर यौन हिंसा किसी भी महिला को तोड़ कर रख देती है. उनमें से एक महिला गुस्से से भरकर कहती है, 'मेरे शौहर ने मुझसे कहा कि यह पैसा ले लो और मेरी जिंदगी से निकल जाओ. जब तक तुम मेरे साथ रहीं, यह उसकी कीमत है. इसे ले लो और मेरी जिंदगी से चली जाओ.'

यह बताते हुए वह बेहद दुख में थी. यह हमारे समाज का आईना है कि एक लड़की को उसी आदमी के पास लौटकर जाना है जिसने उसे न सिर्फ एकतरफा तलाक दिया है, बल्कि उसे शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित भी किया है. उसके पास और कोई विकल्प नहीं है.

हमने यह जानने की कोशिश की कि ऐसे गलत आदमी के पास जाना ही क्यों? हमें समझ में आया कि इस मजबूरी की जड़ में गरीबी और शैक्षिक पिछड़ापन है. उनमें से कइयों ने कहा कि उनके गांव या शहर में एक लड़की को शादी करनी ही होती है. उसके अकेले रहने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

उनका कहना है कि 'हमारा समाज इज्जत नहीं देगा'. यह साफ समझ में आता है कि उनके सामने अकेले पड़ जाने का भय है. एक युवा लड़की के लिए गांव या छोटो शहर में कहीं आने जाने या आर्थिक अवसरों की संभावना बेहद कम है. इसका मतलब यह नहीं कि बड़े शहरों की सूरत बड़ी अच्छी है.

हम एक पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं और पितृसत्तात्मक नियमों व कानूनों के शिकंजे में ही जीवन जीते हैं. ये नियम कहते हैं कि लड़की को जल्दी शादी करनी है और यदि वह मुसलमान है तो उसे झटके में तलाक भी दे दिया जाना चाहिए.

हमें यह शक्ति असंतुलन ठीक करने की जरूरत है जहां एक मर्द अपनी पत्नी को एकतरफा तलाक देता है. हमें इस आम धारणा पर ध्यान देने की जरूरत है कि एकतरफा तीन तलाक दे देना मुस्लिम मर्द का हक है और मुस्लिम औरत एक के बाद दूसरे के पीछे भागने को मजबूर बनी रहे. मुस्लिम महिलाएं सामाजिक और कानूनी न्याय की हकदार हैं. भोपाल मीटिंग में जो महिलाएं शामिल हुईं, वे यही चाहती हैं.

(नूरजहां नियाज़ और ज़किया सोमन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक हैं)

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