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ट्रिपल तलाक बिल: राज्यसभा या संशोधन करे या मौजूदा बिल को कूड़ेदान में डाल दे

इस बिल का मूल मकसद मुस्लिम पुरुष को जेल भेजना दिखाई देता है और इससे पीड़ित महिला को कोई फायदा होता नजर नहीं आता

Tufail Ahmad Tufail Ahmad Updated On: Jan 05, 2018 08:25 PM IST

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ट्रिपल तलाक बिल: राज्यसभा या संशोधन करे या मौजूदा बिल को कूड़ेदान में डाल दे

3 जनवरी को राज्यसभा में मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज) बिल, 2017 पेश किया गया. यह बिल तलाक-ए-बिद्दत (एक बार में तीन तलाक) को आपराधिक दर्जा देता है. 28 दिसंबर को इस बिल को लोकसभा में बिना बहस और चर्चा के पास कर दिया गया. इस बिल में कई गंभीर दिक्कतें हैं. राज्यसभा को बिल में या तो संशोधन करना चाहिए या फिर मौजूदा रूप में इसे कूड़ेदान में डाल देना चाहिए. यह बिल मुस्लिम परिवारों को खत्म करता है.

तलाक के दूसरे जरियों में मेंटेनेंस का प्रावधान नहीं

यह बिल एक बार में तीन तलाक के जरिए तलाकशुदा महिला को मेंटेनेंस का हक देता है. यह तीन तलाक के दूसरे किसी भी रूप में पत्नी को मेंटेनेंस मुहैया नहीं कराता है. यह किसी भी दूसरे जरिए से तलाकशुदा महिला को मेंटेनेंस का हक नहीं देता है, खासतौर पर जब किसी मुस्लिम महिला को अदालत द्वारा तलाक प्रदान किया जाता है. यह बिल शाहबानो कानून को भी अवैध घोषित नहीं करता जिसे राजीव गांधी सरकार ने 1986 में पास किया था. शाहबानो कानून में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को किसी भी तरह का मुआवजा देने से इनकार कर दिया गया था.

मेंटेनेंस क्लॉज में भारी गड़बड़ी

इस बिल के मेंटेनेंस क्लॉज को लेकर कई गंभीर सवाल पैदा होते हैं. मसलन दो स्थितियों पर गौर करते हैं. पहला, एक सिक्योरिटी गार्ड जो कि दिहाड़ी वेतन पाता है, जो कि मासिक रूप से 10,000 रुपए बैठता है, वह तीन तलाक एक साथ बोलता है. दूसरा, एक यूनिवर्सिटी लेक्चरर, जो कि 60,000 रुपए महीना कमाता है, वह ट्रिपल तलाक देता है. पहले मामले में, जेल जाने वाला सिक्योरिटी गार्ड जेल में हर महीने करीब 8,000 रुपए कमाएगा. (संजय दत्त ने अपनी पांच साल की जेल अवधि में 38,000 रुपए कमाए थे). अगर वह यह पूरा पैसा भी अपनी पत्नी को दे दे तो भी पीड़ित महिला का इससे क्या भला होगा. कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर के सेक्शन 125 के तहत मुंबई की एक अदालत ने तो 8,000 रुपए कमा रही महिला को 1,500 रुपए के मेंटेनेंस को भी खारिज कर दिया था.

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दूसरी स्थिति में, अगर लेक्चरर की पत्नी भी लेक्चरर है या किसी दूसरी नौकरी से अच्छी-खासी कमाई हासिल करती है, तो उसे मेंटेनेंस दिए जाने का कोई मतलब नहीं है. उसके मेंटेनेंस के दावे को आर्टिकल 14 के तहत समानता के आधारभूत अधिकार के तहत चुनौती दी सकती है.

अदालतें हिंदू लॉ में शैक्षिक रूप से योग्य शादीशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता देने से इनकार कर चुकी हैं. अदालतों ने कई मामलों में पतियों को भी मेंटेनेंस देने के लिए उनकी पत्नियों को कहा है जो कि कमाती हैं और पति बेरोजगार हैं- यहां तक कि उन्हें कानूनी खर्च भी उठाने के लिए कहा गया.

तीन तलाक एक निहायत भ्रष्ट और गैरवाजिब तरीका है, जो मर्दों को महिलाओं के मुकाबले ऊंचा दर्जा दे देता है.

गरीब मुस्लिम परिवारों में ज्यादा प्रचलित है यह कुप्रथा

एक बार में तीन तलाक के ज्यादातर मामले ऐसे मुस्लिम परिवारों में दिखाई दिए हैं जिनकी आमदनी कम है. इनमें मैकेनिक, लेबर, टेलर और इसी तरह की आजीविका से जुड़े लोग शामिल हैं. ऐसे मामलों में ज्यादा बड़ी दिक्कत महिला के लिए होगी क्योंकि उसे कोर्ट जाकर यह साबित करना होगा कि उसके पति ने उसे एक बार में तीन तलाक बोलकर तलाक दे दिया है.

मौखिक रूप से तीन तलाक देने के मामलों में महिला के लिए यह तकरीबन नामुमकिन होगा कि वह पति के खिलाफ कोई केस साबित कर सके. पति बरी होने तक जेल की सजा जरूर काट आएगा. ऐसे में साफ है कि ट्रिपल तलाक बिल को ठीक तरह से नहीं बनाया गया है.

मुस्लिम पुरुष को जेल भेजना मूल मकसद?

इस बिल का मूल मकसद मुस्लिम पुरुष को जेल भेजना दिखाई देता है और इससे पीड़ित महिला को कोई फायदा होता नजर नहीं आता. यह बिल सुनिश्चित करता है कि मुस्लिम पुरुष तीन साल तक के लिए जेल चला जाए.

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22 अगस्त के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत एक बार में तीन तलाक को गैरकानूनी माना गया. ऐसे में सवाल उठता है कि जब तलाक हुआ ही नहीं तो पुरुष को किस आधार पर जेल में डाला जा सकता है. शादी और तलाक को हमेशा सिविल कानून के तहत रखा जाना चाहिए. अगर इसका मतलब एक और घरेलू हिंसा कानून लाना था तो सरकार को एक बार में तीन तलाक को डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट, 2005 के तहत डालना चहिए था. हालांकि, मुझे नहीं लगता है कि किसी सिविल मामले को आपराधिक कानून के तौर पर तैयार करना चाहिए.

बच्चों की कस्टडी संयुक्त हो

बिल के तहत महिला को बच्चों की कस्टडी मिलेगी. धार्मिक चीजों को एक तरफ भी रख दें तो भी यह पिता के साथ अन्याय है. बच्चे के जीवन में पिता का एक अहम रोल होता है. अलग हुए या तलाकशुदा परिवारों में बच्चों को संयुक्त कस्टडी में दिया जाना चाहिए. यह बिल बच्चों को सजा देता है.

इसकी सबसे बड़ी खामी यह है कि यह मानता है कि एक बार में तीन तलाक हो गया है. यह बिल मूल रूप में इस्लामी मौलवियों की उस राय से इत्तेफाक दिखाता है कि एक बार में तीन तलाक वैध है. यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के 22 अगस्त के आदेश का उल्लंघन है जिसमें उसने तलाक के इस तरीके को अमान्य करार दिया था. इस बिल की खामियों पर जर्नलिस्ट अजय कुमार ने तर्क दिया है, ‘अगर तलाक नहीं होता है, तो मेंटेनेंस या कस्टडी का सवाल ही नहीं उठता है. ये चीजें तभी वाजिब हैं जबकि तलाक हो गया हो.’

इस्लाम में शादी एक समझौता है. ऐसे में सिर्फ मर्दों को तीन तलाक का अधिकार देने का मतलब ये है कि शादी के समझौते में सिर्फ एक पक्ष को इस समझौते को खत्म करने का अधिकार है.

तलाक के दूसरे दोनों तरीके रहेंगे वाजिब!

यह बिल निश्चित तौर पर मुस्लिम फैमिली कानूनों में रिफॉर्म नहीं करता है. यह मुस्लिम पतियों द्वारा एकतरफा दिए जाने वाले तलाक के सवाल को हल नहीं करता. यहां तक कि इसके कानून बनने के बाद भी कोई मुस्लिम पति तलाक के दूसरे दो जरियों का इस्तेमाल कर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है.

इनमें पहला तरीका है कि पत्नी को पहला तलाक भेजा जाए और तीन महीने तक तलाक के प्रभावी होने तक का इंतजार किया जाए. दूसरा जरिया यह है कि हर महीने एक तलाक दिया जाए और इस तरीके से शादी को अमान्य कर दिया जाए. चूंकि, यह बिल एकतफा दिए जाने वाले तलाक को अवैध नहीं घोषित करता है, ऐसे में इसे किसी भी लिहाज से एक रिफॉर्म नहीं माना जा सकता है.

तलाक के लिए मुस्लिम पतियों के कोर्ट जाने का रास्ता खोलें

ज्यादातर गैरमुस्लिम यह चीज नहीं पचा पाते कि मुस्लिम पति को तलाक के लिए कोर्ट जाने से प्रभावी तौर पर रोक दिया गया है. मौजूदा वक्त में कोई मुस्लिम महिला अदालतों, इस्लामिक धर्मगुरुओं या समुदाय के मुअज्जिज लोगों के पास जाकर तलाक मांग सकती है. हालांकि, मुस्लिम पति तलाक के लिए अदालत नहीं जा सकता है.

राज्यसभा को बिल में संशोधन करना चाहिए या एक नया कानून लाना चाहिए ताकि मुस्लिम पुरुष अदालत जा सकें. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया था कि मुस्लिम पतियों के पास तलाक के लिए न्यायिक फोरम का सहारा लेने का हक नहीं है.

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15 मई को तबके अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि अगर एक बार में तीन तलाक को खत्म कर दिया जाएगा तो सरकार को मुस्लिमों में शादियों और तलाक को रेगुलेट करने के लिए एक कानून लाना होगा. लोकसभा में पास हुआ बिल इस वादे को पूरा करने में नाकाम रहा है.

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तस्वीरः मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की फेसबुक वाल से

जब बिल को लोकसभा में पेश किया गया था, उस वक्त कांग्रेस के नेता सदन मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य विपक्षी सांसदों ने अनुरोध किया था कि बिल को कानून और न्याय की स्थायी समिति के पास भेजा जाए. लोकतांत्रिक देशों में विपक्ष पॉजिटिव बदलावों में एक उत्प्रेरक का काम करते हैं. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में सरकार के वादे के बावजूद ऐसा होता दिखाई नहीं देता.

याद रखिए, एक बार में तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाली मुस्लिम महिलाएं भी इस वजह से कोर्ट गईं ताकि अपनी शादियों को बचा सकें, क्योंकि भारतीय समाज में तलाकशुदा महिलाओं को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता.

इस बिल से जिंदा रहेगा ट्रिपल तलाक का मसला

अपने मौजूदा रूप में यह बिल ट्रिपल तलाक के मसले को जिंदा रखने के लिहाज से बनाया गया है. इसके पीछे चुनावी और राजनीतिक वजहें हैं. इसके अलावा दूसरी भी चिंताएं हैं. मुस्लिम पुरुषों को पुलिस वाले परेशान करना शुरू कर देंगे, खासतौर पर अगर किसी एक इलाके में सांप्रदायिक नेता चुनाव जीतेंगे तो ऐसा होने के आसार और बढ़ जाएंगे. इस बिल के तहत एक बार में तीन तलाक को एक संज्ञेय अपराध बना दिया गया है, जिसका मतलब है, जैसा कि लेखिका राना सफवी ने लिखा है, किसी पुलिसवाले को अरेस्ट करने के लिए वॉरंट की जरूरत नहीं होगी, नहीं शिकायत का किसी मुस्लिम महिला की ओर से दाखिल करना जरूरी है. कोई भी शख्स किसी मुस्लिम पति के खिलाफ शिकायत कर सकता है और उसे जेल जाना पड़ेगा. यह बिल मनमाने तरीके से तैयार किया गया है.

ऐसे में राज्यसभा को इस बिल में संशोधन पेश करने चाहिए या इसे कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए और एक व्यापक कानून लिखना चाहिए जो कि मुस्लिम फैमिली कानूनों के इर्दगिर्द मौजूद समस्याओं को हल करता हो. मुसलमानों में रिफॉर्म और इनके भारतीय सामाजिक व्यवस्था के साथ इंटीग्रेशन के लिए बेहद जरूरी है. किसी भी मुस्लिम फैमिली रिफॉर्म बिल में मुस्लिम पतियों द्वारा एकतरफा दिए जाने वाले तलाक की पूरी व्यवस्था खत्म होनी चाहिए.

साथ ही इसमें मेहर, हलाला, बहुविवाह, एक पुरुष के बराबर दो मुस्लिम महिलाओं की गवाही मानने, लड़की को विरासत में संपत्ति का हक लड़के मुकाबले आधा होना, महिलाओं के मुकाबले पुरुष का अभिभावक होना जैसे प्रचलनों को भी कानून के जरिए खत्म करना होगा. मुस्लिम परिवारों के साथ ये वास्तविक मसले हैं.

(तुफैल अहमद मीडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट, वॉशिंगटन डीसी में इस्लामिज्म और काउंटर-रैडिकलाइजेशन इनीशिएटिव के सीनियर फैलो हैं. वह @tufailelif से ट्वीट करते हैं)

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