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तीन तलाक: संविधान की आड़ लेने के बजाए मुस्लिम औरतों की मदद क्यों नहीं करता बोर्ड?

अब अगर मजहब की आजादी पर खतरा मंडरा रहा है, तो पर्सनल लॉ बोर्ड को चाहिए कि वो खुद को पीड़ित बताने का ढोंग करना बंद करके तीन तलाक के विवादों को खत्म करने की कोशिश करे

Hassan M Kamal Updated On: Dec 29, 2017 09:49 AM IST

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तीन तलाक: संविधान की आड़ लेने के बजाए मुस्लिम औरतों की मदद क्यों नहीं करता बोर्ड?

मुस्लिम महिला (निकाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2017 को लोकसभा ने पास कर दिया है. इसे गुरुवार को ही लोकसभा में पेश किया गया था. इस विधेयक को गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के समूह ने तैयार किया था. ये विधेयक एक बार में तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को गैरकानूनी करार देता है. फिर चाहे तीन तलाक बोलकर दिया गया हो, लिख कर या किसी और आधुनिक माध्यम जैसे ई-मेल, एसएमएस या व्हाट्सऐप के जरिए. ऐसा करने वाले पति को तीन साल कैद की सजा का प्रावधान भी इस विधेयक में है.

इस विधेयक में मुस्लिम महिलाओं को नाबालिग बच्चों को अपने पास रखने और नियमित रूप से गुजारा भत्ता पाने का हकदार भी बनाया गया है. तो, अगर ये कानून भारतीय मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है, तो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसका विरोध क्यों कर रहा है? आखिर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की हिफाजत के लिए क्यों नहीं काम कर रहा है? जबकि इस विधेयक का विरोध करने पर तमाम लोग इसे महिला विरोधी मुल्लाओं का संगठन करार दे रहे हैं.

बोर्ड ने बाकायदा पीएम को चिट्ठी लिखी है

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस बिल का विरोध सिर्फ औपचारिकता में नहीं किया. न ही बोर्ड ने सिर्फ न्यूज चैनलों से इसके खिलाफ बात कही. बल्कि पर्सनल लॉ बोर्ड ने 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर इस विधेयक को वापस लेने की अपील की थी.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क है कि ये विधेयक संविधान की धारा 21 के तहत मिले अधिकारों के खिलाफ है. बोर्ड को इस बिल में तीन तलाक की परिभाषा पर भी ऐतराज है. बोर्ड का दावा है कि इस विधेयक में तलाक-ए-बैन को भी शामिल कर लिया गया है. ये तलाक देने का वो तरीका है जिसमें शौहर तय वक्त गुजर जाने के बाद दूसरी और फिर तीसरी बार तलाक देता है. बोर्ड का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी तलाक-ए-बैन को नाजायज नहीं ठहराया है. मुस्लिम महिलाएं जब पति से अलग होती हैं, तो इसे खुला कहते हैं. शरीयत के मुताबिक, खुला भी तलाक-ए-बैन का ही एक रूप है.

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पीएम मोदी को भेजी चिट्ठी में पर्सनल लॉ बोर्ड ने लिखा था कि, 'अगर आप की सरकार इस बारे में कानून लाना जरूरी समझती हो, तो आप को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम महिलाओं के संगठन से सलाह मशविरा करना जरूरी है'.

पैगंबर साहब नहीं खलीफा उमर का हवाला

पर्सनल लॉ बोर्ड के विरोध की बुनियाद इस सोच पर आधारित है कि तीन तलाक की इजाजत इस्लाम देता है. इस बारे में दूसरे खलीफा यानी उमर का हवाला दिया जाता है. तमाम रिपोर्ट के मुताबिक उमर ने एक बार में तीन तलाक को कई बार इजाजत दी थी. हालांकि ये भी कहा जाता है कि पैगंबर मुहम्मद साहब तीन तलाक के खिलाफ थे. फिर भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खलीफा उमर से जुड़ी बातों को ही ज्यादा तरजीह देता है.

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तलाक के बारे में कुरान की आयतों से तस्वीर साफ नहीं होती. कुरान के खिलाफ जाना कुफ्र है, तो कुरान के हवाले से कोई गलत मतलब निकालना भी कुफ्र कहा जाता है. यही वजह है कि आम मुसलमान कुरान को समझने के लिए आलिमों की मदद लेते हैं. लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस बारे में नई चर्चा छेड़ने और मुस्लिम समाज को जागरूक करने के बजाय, संविधान की धारा 25, 26 और 29 का हवाला देकर मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी दखल का विरोध कर रहा है.

तीन तलाक एक निहायत भ्रष्ट और गैरवाजिब तरीका है, जो मर्दों को महिलाओं के मुकाबले ऊंचा दर्जा दे देता है.

तीन तलाक एक निहायत भ्रष्ट और गैरवाजिब तरीका है, जो मर्दों को महिलाओं के मुकाबले ऊंचा दर्जा दे देता है.

शरीयत को छोड़िए, इन सवालों के जवाब दीजिए

अब सवाल सिर्फ ये नहीं है कि तीन तलाक को कुरान और सुन्नत में जायज ठहराया गया है, या नहीं. कुरान और सुन्नत मिलकर ही शरीयत कानून बनते हैं. तीन तलाक को लेकर जारी खींचतान से बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि क्या मर्दों का अपनी बीवियों को एक बार में तीन तलाक देना वाजिब है? क्या ऐसा करने पर उन्हें कोई सजा नहीं मिलनी चाहिए? क्या ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ये नहीं मानता कि तलाक के मसले पर महिलाओं को भी बोलने का हक होना चाहिए? और आखिर अलगाव के बाद मुस्लिम महिलाओं को गुजारे भत्ते का हक नहीं होना चाहिए क्या?

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इस्लाम में शादी एक समझौता है. ऐसे में सिर्फ मर्दों को तीन तलाक का अधिकार देने का मतलब ये है कि शादी के समझौते में सिर्फ एक पक्ष को इस समझौते को खत्म करने का अधिकार है. उसे इसके अंजाम की भी कोई फिक्र नहीं करनी होगी. ऐसे में इस्लाम जिस बराबरी की बात करता है, वो आखिर कहां है?

कुरान के मुताबिक, रोज-ए-महशर पर सब के साथ इंसाफ होगा. लेकिन अगर इसी जिंदगी में इंसाफ करना मुमकिन है, तो उसकी कोशिश क्यों न की जाए? किसी भी मुसलमान का फर्ज है कि वो ईमानदारी और नैतिकता भरी जिंदगी जिए. जैसे पांच वक्त की नमाज और रोजे रखना उस पर पाबंद है. ठीक उसी तरह उस पर वाजिबाना जिंदगी भी फर्ज है. ऐसे में तीन तलाक एक निहायत भ्रष्ट और गैरवाजिब तरीका है, जो मर्दों को महिलाओं के मुकाबले ऊंचा दर्जा दे देता है.

इस्लाम में शादी एक समझौता है. ऐसे में सिर्फ मर्दों को तीन तलाक का अधिकार देने का मतलब ये है कि शादी के समझौते में सिर्फ एक पक्ष को इस समझौते को खत्म करने का अधिकार है.

इस्लाम में शादी एक समझौता है. ऐसे में सिर्फ मर्दों को तीन तलाक का अधिकार देने का मतलब ये है कि शादी के समझौते में सिर्फ एक पक्ष को इस समझौते को खत्म करने का अधिकार है.

तीन तलाक अपराध है

इस में कोई दो राय नहीं कि एक बार में तीन तलाक मुस्लिम परिवारों की तमाम मुश्किलों की जड़ है. ये एक ऐसा हथियार है, जिसे न तो किसी महिला के पति और न ही उसके ससुराल वाले इस्तेमाल करने से हिचकते हैं. कई बार इसकी धमकी देकर मुस्लिम महिला और उसके घरवालों का मुंह बंद कराया जाता है. ये मुस्लिम महिलाओ को घरेलू हिंसा का शिकार होने के बावजूद मुंह बंद रखने को मजबूर करता है. तीन तलाक ऐसा जरिया बन गया है, जिसके तहत मुस्लिम मर्दों ने औरतों को इस्तेमाल करके फेंकने की चीज बना दिया.

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मुस्लिम समुदाय और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को शरीयत कानून की ओट में छिपना बंद करना चाहिए. उन्हें इसका हवाला देकर मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले जुल्मों को ढंकना भी बंद करना चाहिए. संविधान की धारा 25, 26 और 29 का हवाला देकर खुद को छुपाने के बजाय बोर्ड को हदीस की वो बात याद रखनी चाहिए, जिसमें कहा गया है कि तलाक वो चीज है जिससे अल्लाह को सब से ज्यादा नफरत है.

अब अगर मजहब की आजादी पर खतरा मंडरा रहा है, तो पर्सनल लॉ बोर्ड को चाहिए कि वो खुद को पीड़ित बताने का ढोंग करना बंद करके तीन तलाक के विवादों को खत्म करने की कोशिश करे. बोर्ड मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने वाली बातें शरीयत कानून में शामिल करने में नाकाम रहा है.

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