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30 साल तक जेल में रहने वाले इस क्रांतिकारी के बिना देश की आजादी की कथा अधूरी

दिवंगत चक्रवर्ती ढाका अनुशीलन समिति के सदस्य थे. चक्रवर्ती की अपेक्षा उनसे अधिक समय तक किसी अन्य नेता ने इतनी लंबी जेल यातनाएं नहीं सही थीं.

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Aug 22, 2017 01:58 PM IST

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30 साल तक जेल में रहने वाले इस क्रांतिकारी के बिना देश की आजादी की कथा अधूरी

एक ऐसे व्यक्ति के जिक्र के बिना इस देश की स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा अधूरी रहेगी जिन्होंने कुल मिलाकर तीस साल जेलों में बिताए. ऐसे थे जाने माने क्रांतिकारी त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती.

दिवंगत चक्रवर्ती ढाका अनुशीलन समिति के सदस्य थे. चक्रवर्ती की अपेक्षा उनसे अधिक समय तक किसी अन्य नेता ने इतनी लंबी जेल यातनाएं सही थीं, इन पंक्तियों के लेखक को अब तक ये तथ्य मालूम नहीं है. देश के विभाजन के बाद त्रैलोक्यनाथ चकवर्ती पूर्वी पाकिस्तान में ही रह गए थे. अब उसे बांग्लादेश कहते हैं.

चक्रवर्ती ने पूर्वी पाकिस्तान में रहना इसलिए मंजूर किया था ताकि वहां के अल्पसंख्यकों के दुख-सुख में वे उनका साथ दे सकें. 1947 में पूर्वी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं का प्रतिशत कुल आबादी का करीब 31 था. पर, बांग्लादेश में 2011 में वह घटकर आठ फीसदी रह गया. पूर्वी पाकिस्तान की सरकार ने भी त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती को लंबे समय तक जेल में रखा था. उन पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाला गया था.

चक्रवर्ती का जन्म अविभाजित भारत के मैमन सिंह जिले के कापासापी गांव में साल 1889 में हुआ था. उनका निधन 1970 में हो गया. चर्चित अनुशीलन समिति के सदस्य रहे चक्रवर्ती निधन से ठीक पहले भारत आए थे. अनुशीलन समिति की स्थापना सन 1902 में कलकत्ता में हुई थी. इस समिति के संरक्षक थे बैरिस्टर प्रेमनाथ मित्र. समिति बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की शिक्षाओं पर आधारित थी. स्थापना के समय महर्षि अरविंद घोष और देशबंधु चितरंजन दास समिति के उपाध्यक्ष बनाए गए थे.

वायसरॉय लाॅर्ड कर्जन ने जुलाई, 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया. कर्जन का तर्क था कि इससे शासन में चुस्ती आएगी. बड़े राज्य होने के कारण पूर्वी हिस्सा उपेक्षित है. पर बंगालवासियों ने माना कि ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत हिंदू और मुसलमानों को अलग-अलग करके आंदोलन को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों ने यह बंटवारा किया है.

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अविभाजित बंगाल के पूर्वी इलाके में मुसलमानों की आबादी अधिक थी और पश्चिमी क्षेत्र में हिदुओं की. इस विभाजन से बंगाल में अंग्रजों के खिलाफ गुस्सा था. इस विभाजन के बाद अनुशीलन समिति ने पूर्णकालिक क्रांतिकारी संस्था का स्वरूप ग्रहण कर लिया. इस संस्था की ओर से युगांतर नामक साप्ताहिक पत्रिका भी निकाली जाती थी.

महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन की जगह समिति ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना था. फिरंगियों के खिलाफ लड़ाई में त्रैलोक्यनाथ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का साथ दिया. देश को आजाद कराने में त्रैलोक्य नाथ का बहुमूल्य योगदान था. इसके बावजूद पाकिस्तानी हुकूमत ने उनके साथ अत्याचार किया.

त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती पर चर्चित केस बारीसाल षड्यंत्र केस दायर हुआ था. इस केस में ब्रिटिश सरकार ने त्रैलोक्यनाथ सहित 44 लोगों पर देशद्रोह का आरोप लगाया था. उन पर आरोप था कि उन लोगों ने ब्रिटिश सेना में भारतीय मूल के सैनिकों को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाया.

पुलिस के अनुसार बारीसाल जिले में अनुशीलन समिति ने सैकड़ों नौजवानों को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ गोलबंद किया था. याद रहे कि अनुशीलन समिति की पूर्वी पाकिस्तान शाखा के प्रमुख नेता थे त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती और प्रफुल्ल कुमार गांगुली.

बारीसाल षड्यंत्र केस के कुल 44 आरोपितों में से 32 लोगों को छोड़ दिया गया. उनमें से कुछ को क्षमादान किया गया तो किसी को दोषमुक्त घोषित कर दिया गया. कुछ के खिलाफ केस वापस ले लिया गया.

चर्चित राष्ट्रवादी दैनिक ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने बारीसाल केस पर कई किस्तों में लेख लिखा था. इस लेखमाला को लेकर स्थानीय अदालत नाराज थी. उसने अखबार के संपादक मोती लाल घोष को कारण बताओ नोटिस जारी किया. उनसे पूछा गया था कि उन पर क्यों नहीं अदालत की मानहानि का केस चलाया जाए?

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इस नोटिस के खिलाफ अखबार ने हाई कोर्ट में अपील कर दी. हाईकोर्ट ने उस नोटिस को रद्द कर दिया. बारीसाल केस की सुनवाई 1913 में कलकत्ता में हुई. जनवरी, 1914 में कोर्ट का फैसला आ गया. आठ लोगों को सजा हुई जिनमें त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती भी शामिल थे.

लंबे समय तक जेल यातना के कारण उनका शरीर जर्जर हो चुका था. इलाज के सिलसिले में वे 1970 में भारत आए थे. तब भी उन्होंने यहां कहा था कि पाकिस्तान का आम आदमी भारत से दोस्ती चाहता है. भारत के भी आम लोग पाकिस्तान से देास्ती चाहते हैं. मुस्लिम राज के जमाने में हिंदू-मुसलमान मिल जुल कर रहते थे.

ब्रिटिश शासन काल के पूर्वार्ध में भी दोनों समुदायों में सद्भाव था. पर बाद में ब्रितानी सरकार ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए बांटो और शासन करो की नीति अपनाई. उन्हें यह बरदाश्त नहीं हो रहा था कि दोनों समुदाय मिलजुल कर फिरंगियों के खिलाफ आंदोलनरत रहें.

अपनी भारत यात्रा के दौरान त्रैलोक्य नाथ नई दिल्ली में जनपथ स्थित सांसद सुरेंद्र मोहन घोष के आवास में रुके थे. उन्होंने यहां राष्ट्रपति वी.वी.गिरि से भी मुलाकात की थी.

अपने जीवन के आखिरी दिनों में त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती ने एक पत्रकार से विस्तार से बातचीत की थी. उनसे पूछा गया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच मित्रता के लिए आप खुद क्यों नहीं कुछ करते? इस पर उन्होंने दयनीय भाव से कहा कि ‘यह काम कोई हिंदू नहीं कर सकता. क्योंकि ऐसा करने पर उस पर भारतीय एजेंट होने का आरोप लग जाएगा.’

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