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ठग्स ऑफ हिंदुस्तान: धुंधली पड़ चुकी है सरकारी तंत्र और माफियाराज के बीच की रेखा

ऐसा लगता है कि सरकार को ये अंदाजा ही नहीं है कि ताकत के इस्तेमाल की सीमा क्या है, तो उसने अंडरवर्ल्ड को रिझाकर अपने साथ कर लिया है. आज सरकार और अंडरवर्ल्ड के बीच का फर्क मिट चुका है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jun 19, 2018 04:15 PM IST

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ठग्स ऑफ हिंदुस्तान: धुंधली पड़ चुकी है सरकारी तंत्र और माफियाराज के बीच की रेखा

हो सकता है कि ये कहानी झूठी लगे लेकिन ये किस्सा मुझे लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार यूं ही बातों-बातों में सुनाया था. पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के बारे में बात करते हुए, लालकृष्ण आडवाणी ने मुझसे कहा था कि अपनी तमाम सनक के बावजूद देसाई की ईमानदारी बेदाग थी.

आडवाणी ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि 1977 में जब मोरारजी देसाई की अगुवाई में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसके कुछ दिनों बाद एक उपचुनाव होने वाला था. पार्टी के नेता एक ऐसे उम्मीदवार को उतारना चाहते थे, जिसकी छवि अच्छी नहीं थी. आडवाणी ने बताया कि जब मोरारजी देसाई ने उस नेता को उम्मीदवार बनाने की बात सुनी, तो उन्होंने उसकी दावेदारी पर सवाल उठाए. देसाई के साथी नेताओं ने कहा कि हमें सिर्फ वो उम्मीदवार ही चुनाव जिता सकता है. इसके जवाब में देसाई ने कहा कि अगर ऐसा है, तो बेहतर है कि हम चुनाव हार जाएं.

इंदिरा गांधी दौर से शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन में अपराधियों को बढ़ावा देने का चलन

इसमें कोई शक नहीं कि मोरारजी देसाई गांधीवाद के आखिरी पहरेदारों में से थे, जो सार्वजनिक जीवन में सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों को, खुलेआम डकैती पर तरजीह देते थे. आपराधिक छवि वाले लोगों के प्रति उनकी नफरत की एक बड़ी वजह उनसे पहले प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी थीं. इंदिरा के राज में उनके बेटे संजय गांधी की अगुवाई में सार्वजनिक जीवन में अपराधियों को इस कदर बढ़ावा दिया गया कि शासन पर उनका एकाधिकार सा हो गया था. देसाई का मिजाज और उनके जीवन मूल्य उस दौर की इस सियासी संस्कृति ठीक उलट थे.

उसके बाद तो देश की राजनीति का पूरी तरह से अधोपतन हो गया. भारत ने वो दिन भी देखे जब एक शेयर दलाल ने दावा किया कि उसने सूटकेस में नोट भर कर अपने हाथ से उसे प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के घर पहुंचाया था. राव को बार-बार इसे गलत साबित करने के लिए जोर लगाना पड़ा. ये तो सार्वजनिक जीवन में पतन की बहुत बड़ी मिसाल बन गया. देश में आर्थिक सुधार लागू करने वाला प्रधानमंत्री एक घोटालेबाज से हेल-मेल कर रहा था.

1980 के दशक में पहली बार मेरा पाला अपराधियों के बेखौफ राज से पड़ा था. लखनऊ में मैं एक शाम साइकिल से शहर के मशहूर बंदर पुल से गुजर रहा था. ये पुल लखनऊ के केडी सिंह बाबू स्टेडियम के पास ही है. जैसे ही मैं स्टेडियम के पास पहुंचा तो गोलियों की आवाज से शाम का सन्नाटा टूट गया. अपराधियों का एक गिरोह खुली जीप में बैठकर एक कार का पीछा कर रहा था. कार में उस दौर का मशहूर माफिया गुरबख्श सिंह बख्शी जा रहा था. बख्शी को इस फायरिंग में गोली लगी थी, लेकिन उसका ड्राइवर बड़ी चतुराई से कार को डीएम आवास के बगल में ले गया. पीछा कर रहे अपराधी वहां रुक गए और बख्शी की जान बच गई.

गुरबख्श सिंह बख्शी कोई छोटा-मोटा अपराधी नहीं था. उसे पनाह देने वालों में हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे दिग्गज नेता शामिल थे. बहुगुणा कभी खुद भी यूपी के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. बाद में वो जनता पार्टी में भी बड़े नेता रहे. लेकिन, उस दौर में राजनीतिक दलों का अपराधियों से मेल-जोल किसी खास विचारधारा की वजह से नहीं होता था. खुद को समाजवादी सिद्धांतों के समर्थक कहने वाले वामपंथियों से लेकर कांग्रेसी नेताओं तक, बहुत से ऐसे नेता थे, जो अपराधियों को नए दौर का रॉबिन हुड समझते थे.

अस्सी के दशक में राजनीति में पैदा हुआ पहला बाहुबली

हरि शंकर तिवारी का ही किस्सा ले लीजिए. तिवारी, पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे कुख्यात ब्राह्मण माफिया डॉन हुआ करते थे. तिवारी का सियासी दलों के बीच जो जलवा था, उसी से आप को अंदाजा हो जाएगा कि भारतीय राजनीति में माफिया किस तरह का दखल और असर रखते थे. खास तौर से उत्तरी भारत में.

अस्सी के दशक के आखिर में हरिशंकर तिवारी गोरखपुर जिले की चिल्लूपार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले थे. वो उस वक्त जेल में थे. लेकिन इससे उनके इरादों पर कोई ब्रेक नहीं लगा. तिवारी ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर बड़े आराम से ये चुनाव जीत लिया था. जेल में रहते हुए कोई बड़ा चुनाव जीतने वाले हरिशंकर तिवारी पहले बड़े अपराधी थे.

हरिशंकर तिवारी उन शुरुआती अपराधियों में से हैं, जो रातों-रात राजनेता बन गए. आज हम जिन्हें बाहुबली कहते हैं, हरिशंकर तिवारी उसकी पहली पीढ़ी के नेता थे.

उनसे जुड़े कुछ तथ्यों पर नजर दौड़ाइए: उनके खिलाफ चुनाव लड़ने के वक्त हत्या जैसे गंभीर 30 मुकदमे दर्ज थे. वो तमाम तजुर्बेकार नेताओं पर भारी पड़ते हुए पांच और चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे. तिवारी ने करीब 20 साल तक यूपी विधानसभा में चिल्लूपार की नुमाइंदगी की (आज तिवारी के बेटे विधायक हैं). तीसरी अहम बात ये कि हरिशंकर तिवारी की हर पार्टी में पूछ रही थी. हालांकि तिवारी ने सियासी पारी कांग्रेस की मदद से शुरू की थी. लेकिन बाद में वो समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह, बीजेपी के कल्याण सिंह की सरकारों में मंत्री रहे थे. आखिर में हरिशंकर तिवारी मायावती की बीएसपी में भी शामिल हो गए थे.

हरिशंकर तिवारी.

हरिशंकर तिवारी.

वैसे अपराध से राजनीति में आने वाले हरिशंकर तिवारी अकेले नहीं. भारत की आजादी के बाद के कुछ साल तक स्वतंत्रता संग्राम की भावना राजनीति में बनी रही थी. लेकिन, नेहरू युग के अंत के बाद, और खास तौर से जब इंदिरा गांधी ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, तब से भारत की राजनीति गांधीवाद से मैकियावेली की तरफ मुड़ने लगी थी.

बदल गया है माफियाओं का स्वरूप

सत्ता की होड़ में कुछ दलों पर सिर्फ जीतने की फिक्र सवार रहने लगी. इसका नतीजा ये हुआ कि इसने राजनीति के दरवाजे अपराधियों के लिए खोल दिए. खास तौर से वो अपराधी जो अंडरवर्ल्ड से जुड़े थे और संगठित रूप से अपराध की दुनिया में सक्रिय थे. ऐसे लोगों की मांग राजनीति में बढ़ गई. ऐसे अपराधियों ने यूपी और बिहार ही नहीं देश के तमाम हिस्सों में सियासत की दुकानें सजानी शुरू कर दीं. इन दुकानों के पास सियासी खरीदार भी जमा हो गए. उसके बाद के दशकों में अंडरवर्ल्ड का परंपरागत रंग-रूप पूरी तरह से बदल गया है.

अपराध की दुनिया अब वो नहीं रही, जैसी पहले थी. पहले के जैसे माफिया अब कमोबेश खत्म हो चुके हैं. आज उन्होंने खुद को विनम्र, सुशील बना लिया है. आज वो दुनिया भर में भ्रष्ट सरकारों और उद्योगपतियों के बीच दलाल बन गए हैं. वो पूरी दुनिया को रौंदते चलते हैं. उनके पास बेपनाह ताकत है. वो बार-बार सरकारी संस्थानों की ताकत को चुनौती देते हैं. अपने इशारों पर नचाते हैं.

आज पूरे देश में सीबीआई, इनकम टैक्स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय को जिस तरह से धमकी देने, ब्लैकमेल करने और अवैध वसूली का जरिया बना लिया गया है, उससे इन अपराधियों की ताकत का साफ अंदाजा होता है. आज अपराध के अंडरवर्ल्ड और सरकारी सिस्टम में फर्क करना असंभव सा हो गया है. ये कहना गलत नहीं होगा कि पिछले कुछ दशकों में भारत की प्रशासनिक व्यवस्था अपने नजदीकी दुश्मन यानी अंडरवर्ल्ड की नकल करते करते काफी हद तक उस जैसी ही बन गई है.

रूस का वोरी मॉडल अब हर जगह मौजूद है

रूस में राजनीति और सिस्टम में घुसे बैठे अपराधियों को 'वोरी' कहते हैं. रूस में वोरी का उदय और भी उसका प्रशासन की नसों में समा जाना इस बात की बेहतरीन मिसाल है कि किस तरह अंडरवर्ल्ड देश की मुख्यधारा का हिस्सा बन जाते हैं. चेक रिपब्लिक की राजधानी प्राग के रहने वाले रिसर्च स्कॉलर मार्क गैलियोटी ने रूस में राजनीति और सिस्टम के अपराधीकरण और वोरी के राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा बनने का अपनी किताब The Vory: Russia's Super Mafia में बखूबी बखान किया है.

इस किताब में रूसी संगठित अपराधियों वोरी के 18वीं सदी में उदय से लेकर इसकी तरक्की के बारे में विस्तार से लिखा गया है. इस किताब में वोरी के खास कोड, इसकी जबान, रणनीति और हर हाल में अपना वजूद बचाकर तरक्की करने के बारे में तफ्सील से लिखा गया है.

रूस ने बहुत उतार-चढ़ाव के दौर देखे हैं. बीसवीं सदी की शुरुआत में बोल्शेविक क्रांति, फिर स्टालिन का तानाशाही दौर, पश्चिमी देशों के साथ शीत युद्ध, अफगानिस्तान में युद्ध, सोवियत संघ का विघटन और फिर आखिर में पूंजीवादी सरकार. इन तमाम अनिश्चितताओं के बीच वोरी लगातार बढ़ते रहे. खूब फले-फूले. राष्ट्रपति पुतिन के राज में रूस में वोरी ने एकदम नया रूप ही धर लिया है.

मार्क गैलियोटी लिखते हैं कि पुतिन के राज में वोरी सरकार के सहयोगी बन गए हैं. ये उसी तरह तेजी से फल-फूल रहे हैं, जैसे बोल्शेविक क्रांति के दौर में बढ़ रहे थे. इस बात को बोल्शेविक राज के एक जज पावेल स्टच्का ने बखूबी बयां किया था. पावेल ने रूस में 1917 में हुई बोल्शेविक क्रांति के दस साल बाद यानी 1927 में कहा था कि 'साम्यवाद का मतलब सामाजिक कानून की विजय नहीं बल्कि कानून पर समाजवाद की जीत है' लेनिन से लेकर स्टालिन और फिर गोर्बाचोव तक, वोरी ने खुद को हर हुकूमत के हिसाब से ढाल लिया और सिर्फ एक मकसद के लिए काम करते रहे. ज्यादा से ज्यादा ताकत और संपत्ति जुटाना.

स्टालिन के दौर में वोरी ने बोल्शेविक क्रांति की भाषा और मुहावरे सीख लिए. वो बड़े आराम से समाजवाद की आड़ में अपने आपराधिक कृत्य करते रहे. यहां तक कि लेनिन ने भी कम्युनिस्टों के बीच अपराधियों की घुसपैठ को होने दिया. अगर लेनिन ने अपराधियों को कम्युनिस्ट क्रांति में शामिल करने के बजाय उन्हें मार दिया होता, तो रूस का इतिहास ही अलग होता. हालांकि रूस के माफिया ने खुद को कॉरपोरेट जगत जैसे संगठित आपराधिक रूप में ढाला गोर्बाचोव के राज में. जब गोर्बाचोव ने पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त अभियानों की शुरुआत की. जिसके तहत कम्युनिस्ट शासन में नई जान फूंकने और खुलेपन पर जोर दिया गया. तो, रूस के माफिया ने भी अपना रंग-रूप बदल लिया.

पुतिन के दौर में सरकार के अंगों और वोरी के बीच फर्क और फासला और भी धुंधला पड़ गया है. माना जाता है कि आज रूस के संगठित अपराधियों यानी वोरी ने अपने पांव पूरी दुनिया में पसार लिए हैं.

क्या हम रूस के वोरी जैसे संगठित अपराधी भारत में तलाश सकते हैं?

रूस के वोरी की तरह एक दौर में भारत में ठगों के गिरोह सक्रिय थे. वोरी की तरह ही ठगों का अपना कोड यानी कुछ नियम-कायदे थे. ये नियम बेहद सख्त थे और इनका वास्ता धार्मिक कर्मकांडों से था. इन्हें शाही परिवारों की शह भी हासिल थी. ऐसा कहा जाता है कि मध्य प्रांत में सत्ताधारी सिंधिया राजवंश ठगों को प्रश्रय देता था. ठग बेगुनाह और मुसाफिरों को धोखे से फंसाने और फिर लूटने और बेरहमी से मारने पर बहुत गर्व करते थे.

फिलिप मेडोज टेलर ने अपनी किताब Confession of a Thug (1839) में ठगों की करतूतों का बेहद डरावना वृत्तांत लिखा है. इस किताब के सबसे अहम किरदार अमीर अली ने ठगी के पेशे को बहुत शानदार तरीके से बयां किया है. अमीर अली कहता है कि, 'ठगी दिमाग को बहुत मजबूती से रौशन करती है. इसे कभी खत्म नहीं किया जा सकता, न किया जा सकेगा. उन सैकड़ों-हजारों लोगों पर नजर डालो जो इस पेशे की वजह से सताए जा रहे हैं: क्या इससे तुम्हारे कैदियों की तादाद घटी है? नहीं! इससे कैदियों की संख्या और बढ़ गई है. जिन ठगों ने कैद के बजाय फांसी पर चढ़ना बेहतर समझा, हर उस ठग की जगह तमाम नए ठग पैदा होंगे और देश के तमाम हिस्सों में ठगी का पेशा जारी रहेगा. यकीन जानो ये पेशा उन इलाकों में भी होने लगेगा, जहां पहले इसका वजूद नहीं था.'

अमीर अली की ये भविष्यवाणी कितनी सच साबित हुई! उस दौर के ठग आज रूस के वोरी की तरह भेष बदल चुके हैं. अब वो शैतान नया रूप गढ़कर राजनीति की मुख्यधारा में आ चुके हैं. आज वो देश की प्रशासनिक व्यवस्था का अटूट हिस्सा बन चुके हैं. रूस के वोरी की ही तरह ये ठग सत्ता की नसों में ऐसे समा गए हैं कि आज प्रशासन और अपराधियों में फर्क करना कमोबेश नामुमकिन हो गया है.

सीबीआई में भयानक रूप से है गुटबाजी

अगर आप को कोई शक है, तो देखिए कि किस तरह देश की बड़ी एजेंसियां भ्रष्टाचार का मुकाबला करती हैं. सीबीआई के भीतर गैंगवार छिड़ा हुआ है. ऐसा शायद सीबीआई के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि जांच एजेंसी में इतनी गुटबाजी हो गई हो. अलग-अलग अफसरों के अपने-अपने कैम्प हैं. इस गुटबाजी का नतीजा ये है कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच, 'तेरा भ्रष्ट बनाम मेरा भ्रष्ट' की बुनियाद पर हो रही है. सीबीआई रातों-रात ऐसे हालात में नहीं पहुंची है. तमाम सरकारों ने इसे सत्ता की कठपुतली बनाया और विरोधियों से निपटने में इसका इस्तेमाल किया. ये सिलसिला आज भी जारी है.

अगर आप को उनके काम करने के तरीके पर जरा भी शक है, तो याद कीजिए खून जमा देने वाली 2016 की वो घटना जब सीनियर अफसर बी के बंसल, उनकी पत्नी और बेटी ने पूर्वी दिल्ली में खुदकुशी कर ली थी. तब सीबीआई के कुछ अधिकारी बंसल के खिलाफ बेहद डराने वाले अंदाज में भ्रष्टाचार के आरोप की जांच कर रहे थे. बंसल के परिवार के लिए सीबीआई अधिकारियों की बदसलूकी और जुल्म झेलना इतना शर्मनाक और डरावना रहा कि वो उसे झेल नहीं पाए. सुसाइड नोट में उन्होंने पांच सीबीआई अधिकारियों के नाम लिखे थे. लेकिन इस से प्रशासन में किसी की भी अंतरात्मा नहीं हिली (सीबीआई की अंदरूनी जांच में कोई अधिकारी दोषी नहीं पाया गया).

हाल ही में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक कारोबारी ने खुदकुशी कर ली. उसे एक मंत्री की अश्लील सीडी बनाने के मामले में आरोपी बनाया गया था. ऐसे मामले तो उस गंभीर बीमारी की छोटी सी मिसाल हैं, जिसने पूरे सिस्टम को अपनी चपेट में ले रखा है. आज सीबीआई का इस कदर अपराधीकरण हो गया है कि ये सरकार के एजेंडे को ही धूल चटा सकती है. और एजेंसी के अपराधीकरण की ये बीमारी बहुत तेजी से फैल रही है.

मजे की बात ये है कि 1993 में राजनीति के अपराधीकरण पर आई एनएन वोहरा कमेटी की रिपोर्ट ने अपनी जांच में सीबीआई की एक रिपोर्ट का बड़े पैमाने पर जिक्र किया था. सीबीआई का ये स्टडी पेपर महाराष्ट्र में अपराधियों, अफसरों और नेताओं की साठ-गांठ पर था. इस रिपोर्ट में खास तौर से इकबाल मिर्ची नाम के एक छोटे अपराधी के बड़े माफिया बनने की कहानी का जिक्र था. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि किस तरह सरकारी सिस्टम ने मिर्ची के मामूली चोर से माफिया बनने में अहम रोल निभाया था. इस रिपोर्ट ने साफ तौर पर बताया था कि किस तरह अपराधियों, नेताओं और अफसरों की मिलीभगत से ऐसा सिस्टम बन गया है जिसमें ऐसे माफिया फलते-फूलते और आबाद होते हैं. पहले जहां ठग हिंसा के जरिए अपना मकसद पूरा करते थे. वहीं, अब नए दौर के माफिया बड़ी सज्जनता और मान-मनौव्वल से काम लेते हैं. हालांकि जरूरत पड़ने पर उन्हें हिंसक तरीके अपनाने से भी कोई गुरेज नहीं. वो लोकतंत्र की अंधेरी गलियों में फलते-फूलते हैं. वो सार्वजनिक भलाई और निजी स्वतंत्रता को अलग करने वाली तंग गली में डेरा जमाए बैठे हैं.

रूस में वोरी के विकास का हवाला देते हुए मार्क गैलियोटी सिस्टम के अपराधीकरण के बारे में बड़े सटीक अंदाज में लिखते हैं, 'बाजारवादी अर्थव्यवस्था और छद्म लोकतांत्रिक राजनीति के इस दौर में जब राजनीति किसी खास विचारधारा से कटी हुई है, जहां राष्ट्रवाद का शुरुआती घालमेल है, वहां इसमें कोई शक नहीं कि ये वोरी ही है, जिसने नए-नए इलाकों में विस्तार किया है, रूस के कुलीनों को अपना गुलाम बनाया है. आज रैकेटियर, ड्रग तस्कर, इंसानों के तस्कर और हथियारों का अवैध कारोबार करने वाले लोग हैं. इनका राजनीति और कारोबार से रिश्ता गहराता जा रहा है'.

क्या ये बात भारत के बारे में भी सही नहीं है?

हालांकि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु, सार्वजनिक जीवन में शुचिता को बेहद पवित्र मानते थे, लेकिन राजनीति और सरकारी सिस्टम के अपराधीकरण की शुरुआत उनकी बेटी के राज से ही हुई. छल-प्रपंच और हिंसा को इंदिरा ने ही सियासी हथियार बनाया. देश में इमरजेंसी लगाई. उस दौर में सरकार, अंडरवर्ल्ड का आईना बन गई थी. उस दौर में सिर्फ राजनीति का अपराधीकरण नहीं हुआ. उसी दौर में कानून की रक्षा करने वाली तमाम एजेंसियों ने भी संगठित अपराधियों के तौर-तरीके अपना लिए. न केवल सीबीआई, बल्कि टैक्स अधिकारी भी गैंगस्टरों के तौर-तरीके अपनाने लगे. उनकी छापेमारी के अभियान कई बार धमकाकर वसूली करने का जरिया बन गए. एजेंसियों के काम करने का तरीका और जबान, दोनों ही माफिया जैसी हो गई.

लाइसेंस राज और इंस्पेक्टर राज के उस दौर में प्रतिबंधित चीजों की तस्करी बेहद मुनाफे का धंधा थी. ऐसे में अंडरवर्ल्ड ने इस मौके का अकेले अपने बूते तो फायदा उठाया नहीं होगा. तब तक स्वाधीनता सेनानियों की जगह नई पीढ़ी ने ले ली थी, जो नए भारत में राजनीति कर रहे थे. इसलिए न केवल कांग्रेस, बल्कि कट्टर समाजवादियों को भी सत्ता के लिए हिंसा को वाजिब ठहराने और अपराधियों को अपने पाले में लाने से कोई परहेज नहीं था.

जब 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तो राजनीतिक व्यवस्था में माफिया के बढ़ते असर से वो अनजान नहीं थे. लेकिन, जल्द ही वो भी माफिया के नियंत्रण वाली राजनीतिक व्यवस्था और सत्ताधारी संस्कृति का हिस्सा बन गए. बोफोर्स के दलाल और हथियारों के सौदागर ओत्तावियो क्वात्रोची से उनके परिवार की नजदीकी इस बात की मिसाल है कि भारतीय राजनैतिक व्यवस्था में माफिया की जड़ें कितनी गहरे पैठ जमा चुकी हैं. ये सोचना गलत होगा कि राजीव गांधी के दौर में राजनीतिक व्यवस्था की ताकत कमजोर पड़ी थी. बल्कि भारी बहुमत की वजह से इस व्यवस्था के प्रधानमंत्री के तौर पर राजीव गांधी के पास बहुत ताकत थी.

1990 के दशक में ये सरकारी सिस्टम बहुत मजबूत हो चुका था. यहां एक बार फिर हम मार्क गैलियोटी के हवाले से रूस की वोरी की मिसाल दे सकते हैं. अपनी किताब में गैलियोटी लिखते हैं, 'आज के रूस में माफिया गैंग सरकार के खिलाफ नहीं बल्कि सरकार के साथ मिलकर आगे बढ़ रहे हैं. आज राजनीति की एक नई पीढ़ी सत्ता तक पहुंची है. ये नई पीढ़ी अपने सत्ता सुख के लिए क्रेमलिन के आसरे है, न कि अंडरवर्ल्ड के'.

राजनीति का हो गया है और इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं

जब चिमनभाई पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब अब्दुल लतीफ नाम का मामूली सा शराब तस्कर किसी कैबिनेट मंत्री से ज्यादा ताकतवर हुआ करता था. ये वही अब्दुल लतीफ था, जिसने दाऊद के खास गुर्गे के तौर पर बाद में काफी शोहरत बटोरी. बॉलीवुड की फिल्म रईस लतीफ की जिंदगी पर आधारित थी. भारत के नए युग के इन ठगों ने हर नाटकीय बदलाव के बाद खुद को नए सिरे से ढालकर अपने आप को बचाने में कामयाबी हासिल की. आर्थिक उदारीकरण इसकी मिसाल है. भले ही उदारीकरण से लाइसेंस-कोटा राज खत्म हो गया, मगर माफिया राज खत्म नहीं हुआ. राजनीति का अपराधीकरण लगतार बढ़ता गया है. हम आज इसे सांसदों और विधायकों के खिलाफ दर्ज मुकदमों से परख सकते हैं. सरकार के अन्य अंगों के अपराधीकरण की प्रक्रिया भी उसी तरह बदस्तूर जारी है, जिस तरह से सियासी दलों की.

मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश में चल रही मुठभेड़ों को ही देखिए, जिसमें अगर बेगुनाह नहीं, तो, छोटे-मोटे अपराधी ही मारे जा रहे हैं. जबकि जाने-माने बाहुबली पूरी तरह से सुरक्षित हैं. इससे भी बेशर्मी की बात ये है कि राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुलेआम बड़े गर्व के साथ इसका श्रेय ले रहे हैं. योगी आदित्यनाथ की भाषा माफिया की 'ठोक देंगे' वाली भाषा लगती है. इसमें कोई दो राय नहीं कि ये भाषा गोरखपुर के अंडरवर्ल्ड से सीखी गई है.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काले धन के खात्मे के लिए देशव्यापी अभियान छेड़ने की बात की, तो इससे सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीडीटी और दूसरी एजेंसियों के अधिकारियों के हौसले बढ़ गए. उन्होंने कारोबार जगत के खिलाफ अभियान छेड़ दिया. अधिकारियों के इस अभियान के पीछे बदनीयती थी. बैंकों में फर्जीवाड़े ने इन एजेंसियों के अधिकारियों को अपने डराने-धमकाने वाले तौर-तरीके आजमाने का एक और मौका दे दिया है.

हम ये मान लें कि हिंसा आधुनिक शासन-व्यवस्था का अटूट हिस्सा है, जहां सरकार के पास हिंसा का एकाधिकार है (केवल सरकार ही ताकत का इस्तेमाल कर सकती है, मार सकती है, कोई और नहीं). लेकिन अपराध अलग बात है. गैलियोटी के हिसाब से जो रूस में हुआ और ऐसा लगता है कि भारत में भी हो रहा है, वो ये है कि सरकार को ये अंदाजा ही नहीं है कि ताकत के इस्तेमाल की सीमा क्या है, तो उसने अंडरवर्ल्ड को रिझाकर अपने साथ कर लिया है. आज सरकार और अंडरवर्ल्ड के बीच का फर्क मिट चुका है.

विडंबना ये है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का ख्वाब ये नहीं इसके उलट था. हालांकि वो बड़े व्यवहारिक थे. महात्मा गांधी ने बहुचर्चित 'सात सामाजिक पापों' के जिक्र से पहले 1925 में यंग इंडिया में डैन ग्रिफिथ के हवाले से लिखा था कि, 'आधुनिक समाज अपने आप में अपराध का कारखाना है. सैन्यवादी विचारधारा रखने वाला एक कातिल का रिश्तेदार है, और सेंध लगाने वाला शेयर दलाल'.

( यह लेख गवर्नेंस नाउ पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है. )

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