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उत्तराखंड: विकास और पर्यावरण के संतुलन का संघर्ष जारी है

बीजेपी की वापसी ने राज्य को केंद्र के ठोस सहयोग के लिए नई उम्मीदें जगा दी हैं

Updated On: May 20, 2017 10:04 PM IST

Namita Singh

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उत्तराखंड: विकास और पर्यावरण के संतुलन का संघर्ष जारी है

उत्तराखंड में बीजेपी सरकार के गठन के तीन महीने बाद, राज्य के विकास और पर्यावरण के मुद्दों के बीच संतुलन सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष जारी है. जहां तक 'विकास बनाम पर्यावरण' का संबंध है, तो सत्ता में बीजेपी की वापसी ने राज्य को केंद्र के ठोस सहयोग के लिए नई उम्मीदें जगा दी हैं.

हालांकि दिल्ली में हाल में हुई नीति आयोग की बैठक में नए मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने पर्यावरण के हिसाब से संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड) के जिस मुद्दे को सामने लाया था, वो अब भी विचाराधीन है. इसी बैठक में रावत ने पहाड़ी राज्यों के मुद्दे से निपटने के लिए नीति आयोग के भीतर एक अलग सेल बनाने का सुझाव दिया था, जिस पर सकारात्मक परिणाम आना अभी बाकी है.

उत्तराखंड अपनी चिंता जाहिर करता रहा है

उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच तालमेल को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है

ईएसजेड से संबंधित अधिसूचना के कुछ प्रावधानों के बारे में उत्तराखंड लगातार अपनी चिंता जाहिर करता रहा है. यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 18 दिसंबर, 2012 को जारी राजपत्र अधिसूचना में भागीरथी नदी के विस्तार यानी गौमुख से उत्तरकाशी तक के 4,979.59 वर्ग किलोमीटर वाटरशेड क्षेत्र को ईएसजी के रूप में घोषित किया गया था.

क्रॉस रोड ढलान 60 डिग्री तक होनी चाहिए

तब से ईएसजेड अधिसूचना के कुछ प्रावधानों पर उत्तराखंड नियमित रूप से अपनी चिंता जताता रहा है. खास बात यह है कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के पूर्ववर्ती हरीश रावत ने भी इसी मुद्दे पर दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन किया था.

वह प्रावधान, जिस पर उत्तराखंड को आपत्ति है, उसमें ईएसजी और 20 डिग्री के रूप में क्रॉस रोड ढलान के भीतर भूमि उपयोग में बदलाव पर प्रतिबंध शामिल है. स्थानीय लोगों की यह दलील है कि भूमि उपयोग में बदलाव के प्रतिबंध का मतलब छोटे-छोटे मामलों में भी केंद्र की सिफारिश की जरूरत होगी.

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गंगोत्री के विधायक गोपाल रावत ने पहले ही इस विशेष प्रावधान पर अपनी आपत्ति जता दी थी. उन्होंने कुछ महीने पहले इस संवाददाता से कहा था, 'यह हमारे अधिकार का सवाल है.' उत्तराखंड भी चाहता है कि क्रॉस रोड ढलान 60 डिग्री तक हो.

इस बीच उत्तराखंड सरकार ने ईएसजेड से संबंधित अपने मास्टर प्लान को बदलाव के साथ पहले ही भेज दिया है. अतिरिक्त सचिव मीनाक्षी जोशी ने फोन पर फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'हमने अपने संशोधित मास्टर प्लान को पर्यावरण मंत्रालय के पास भेज दिया है. यह अभी विचाराधीन है.'

इससे पहले राज्य सरकार को ईएसजेड से संबंधित अधिसूचना के दिशा-निर्देशों के अनुसार क्षेत्रीय मास्टर प्लान तैयार करने के लिए कहा गया था. राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों के आसपास पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों को घोषित करने का मकसद संरक्षित क्षेत्रों के लिए एक तरह का ‘शॉक एब्जॉर्वर' बनाना है.

पारिस्थिति के हिसाब से संवेदनशील क्षेत्रों में इन गतिविधियों पर रोक के बजाय उन्हें रेगुलेट करने को ज्यादा तरजीह दी गई है. इससे कुछ बदलाव भी देखे गए हैं. भागीरथी घाटी में अब होटल और रिसॉर्ट के निर्माण के दौरान पेड़ों की कटाई रोकने के बजाय उन्हें रेगुलेट ही किया जा रहा है.

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के लिए उसके गौरव के आधार इसके वनस्पति और जीवों के अलावा 12 राष्ट्रीय उद्यान, जंगली जीवन अभ्यारण्य और दो विश्व विरासत स्थल हैं.

ऐसा लगता है कि राज्य में होने वाले विकास कार्य, परेशान करने वाली आदत और विभिन्न जानवरों की प्रजातियों के निवास के चलते पर्यावरण को खतरे में डालते हैं. इससे वनस्पति बर्बाद हो रही है. इस तरह के उदाहरणों में 'सभी मौसम में चारधाम यात्रा मार्ग', केदार घाटी में तीर्थ यात्रियों को हेलिकॉप्टर सुविधा, गढ़वाल और कुमाऊं के बीच कांडी सड़क के जरिए बेहतर कनेक्टिविटी शामिल है.

Uttarakhand Village 3

हेलीकॉप्टर सेवा अभियान इस क्षेत्र में जीव-जन्तुओं के लिए अशांति का बड़ा कारण है

गंगा के साथ वाले ढलानों पर मिट्टी को डंप कर रहे थे

हाल ही में एक रिपोर्ट में बताया गया था कि ठेकेदार गंगोत्री के पास गंगा के साथ वाले ढलानों पर हजारों टन खुदाई वाली मिट्टी को डंप कर रहे थे. सड़क चौड़ीकरण के चल रहे इस काम से बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई का अंदेशा जताया जा रहा है.

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इसके अलावा, रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मंदिर की यात्रा के लिए 16 किमी ट्रैक के लंबे रास्ते से बचने के लिए तीर्थ यात्रियों की एक बड़ी संख्या तय स्थान तक पहुंचने की खातिर हेलिकॉप्टर सेवाओं की तलाश करते हैं.

देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के अध्ययन के मुताबिक, हेलिकॉप्टर सेवा अभियान इस क्षेत्र में वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के लिए अशांति का बड़ा कारण है. इस समस्या के समाधान के रूप में हेलिकॉप्टर को केदारनाथ घाटी में 600 मीटर की ऊंचाई पर उड़ने के लिए कहा गया है.

सबसे छोटे मार्ग के जरिए उत्तराखंड के दो बड़े हिस्सों गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ने वाले कांडी मार्ग को शुरू करने की कोशिश भी अधर में है. क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा टाइगर रिजर्व जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से होकर गुजर रहा है जिसके चलते वहां रह रहे जंगली जीवों को खतरा पैदा हो सकता है.

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