S M L

जंगल की आग से निपटने के लिए इस बार ज्यादा तैयार है उत्तराखंड

केंद्र सरकार ने जंगल में लगने वाली आग को प्राकृतिक आपदा में शामिल कर लिया है

Namita Singh Updated On: Apr 14, 2017 08:44 PM IST

0
जंगल की आग से निपटने के लिए इस बार ज्यादा तैयार है उत्तराखंड

उत्तराखंड 71 फीसदी हरे जंगलों से भरा एक खूबसूरत पहाड़ी राज्य है. लेकिन, उत्तराखंड को गुजरे कुछ सालों में जंगल में लगने वाली आग से जूझना पड़ा है.

हालांकि, इस हफ्ते एक अच्छी खबर आई है. केंद्र सरकार ने जंगल में लगने वाली आग को प्राकृतिक आपदा में शामिल कर लिया है.

इससे राज्य को फॉरेस्ट फायर की इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए सभी जरूरी सपोर्ट और संसाधन मिलेंगे. इन घटनाओं को प्राकृतिक आपदा के तौर पर देखा जाएगा.

फिर से मंडरा रहा है खतरा 

पिछले साल अप्रैल के अंत में उत्तराखंड के जंगलों में भयंकर आग लगी. जंगलों में लगी यह आग राज्य के करीब 4,000 हेक्टेयर में फैल गई. इसे बुझाने की सरकारी कोशिशें नाकाम रहीं और कई लोगों की जान इसमें चली गई.

इसके अलावा राज्य की वन संपदा और बायो डायवर्सिटी को भी भारी नुकसान पहुंचा. गुजरे 10 साल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि हर साल 2,200 हेक्टेयर जंगलों में आग लगती है.

उत्तराखंड में पिछले साल मई में आग की कुल 2,074 घटनाएं दर्ज की गईं. राज्य के 13 जिलों में फैली इस आग को बुझाने के लिए आर्मी और एयरफोर्स को लगाना पड़ा.

इस साल फिर से राज्य के अलग-अलग पहाड़ी इलाकों में तापमान फिर से ऊपर पहुंच गया है और मौसम का मिजाज पिछले साल जैसा रहने के ही आसार हैं.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहाड़ी जिले रुद्रप्रयाग में 31 मार्च को 37 डिग्री तापमान दर्ज किया गया. इसी तरह से पौड़ी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में भी तापमान 28 डिग्री से 30 डिग्री के बीच बना हुआ है. इससे संकेत मिल रहा है कि राज्य के वन विभाग के लिए यह साल काफी मुश्किल रहने वाला है.

अमेरिका में आग

गर्मी से पहले ही शुरू हो गई घटनाएं 

राज्य में गर्मी ने अभी तक दस्तक नहीं दी है, इसके बावजूद करीब 85 हेक्टेयर जंगल आग से प्रभावित हैं. इस साल 15 फरवरी से अब तक राज्य में जंगल में आग लगने की कम से कम 57 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं.

यहां तक कि ज्यादा ऊंची पहाड़ियों से भी, जहां कुछ दिनों पहल बर्फबारी हुई थी, फॉरेस्ट फायर की खबरें आ रही हैं. केदार घाटी में मौजूद वाइल्ड लाइफ रिजर्व, केदारनाथ वाइल्डलाइफ सेंचुरी में भी फॉरेस्ट फायर की घटनाओं की खबरें आ रही हैं. जोशीमठ के करीब मौजूद नंदादेवी नेशनल पार्क से भी इस तरह की तीन घटनाओं की रिपोर्ट हुई है.

शायद पिछले साल की घटनाओं से सबक लेकर नई बनी राज्य सरकार ने किसी बड़ी आग की घटना के होने से पहले ही इस पर सतर्कता दिखाना शुरू कर दिया है. राज्य की पिछली सरकार जंगल में आग की पिछले साल की घटना को संभालने में नाकाम रही थी, उसके पास इससे निपटने के लिए न तो पर्याप्त इक्विपमेंट थे न ही संसाधन.

आगजनी से निपटने को तैयार सरकार 

इस बार फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने कुछ ठोस उपाय करने की कोशिश की है. डिपार्टमेंट ने 40 मास्टर कंट्रोल रूम बनाए हैं, जिन्हें 1,312 क्रू स्टेशनों से लिंक किया गया है ताकि जंगलों में आगे की घटना सामने आते ही इस पर तत्काल कार्रवाई की जा सके.

इन सभी क्रू स्टेशनों और मास्टर कंट्रोल रूम्स पर वायरलेस कनेक्टिविटी सुनिश्चित की गई है. पहली बार उत्तराखंड फॉरेस्ट अधिकारियों ने गुजरे 10 साल के आंकड़ों के आधार पर 5 संवेदनशील जोन चिन्हित किए हैं. ये जोन गुजरे वक्त में आग लगने की कई घटनाओं से प्रभावित हुए हैं. ऐसे में इन जगहों पर खास निगरानी रखी जानी जरूरी है.

forest

राज्य का फॉरेस्ट एरिया चार जोन में विभाजित है. इसमें से 11,280 हेक्टेयर हाई रिस्क जोन में आता है. 15,410 हेक्टेयर जंगल मीडियम रिस्क जोन में आते हैं. इसी तरह से 11,144 हेक्टेयर लो रिस्क जोन में और 15,648 हेक्टेयर को नो रिस्क जोन में गिना जाता है.

सरकार ने फॉयर वॉचर्स की संख्या दोगुनी कर दी है. जंगलों में आग का पता लगाने के लिए ड्रोन तैनात किए गए हैं. साथ ही फॉरेस्ट अधिकारियों ने आग से प्रभावित होने वाले इलाकों तक पहुंचने के लिए वन पंचायतों की मदद लेने का प्लान भी तैयार किया है.

आगजनी रोकने के लिए किए जा रहे हैं खास उपाय 

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (प्लानिंग एंड फाइनेंस) का दावा है कि इस साल विभाग के पास फंड की कमी नहीं है. उन्होंने कहा कि फॉरेस्ट डिवीजनों को सरकार ने 10.50 करोड़ रुपए का फंड मुहैया कराया है.

हाईकोर्ट ने भी जंगलों में लगने वाली आग को लेकर गंभीर चिंता जताई है और सरकार को निर्देश दिया है कि वह बड़े पैमाने पर जल की उपलब्धता को सुनिश्चित करे और कृत्रिम जलाशयोंका निर्माण करे ताकि जमीन में नमी रहे जिससे इस तरह की आग की घटनाओं को रोका जा सके.

सरकार ने आग लगने की ज्यादा आशंका वाले इलाकों में खास उपाय करने के आदेश दिए हैं. सरकार ने इन जगहों पर देवदार के पेड़ों की पत्तियों के लिए उपाय करने को कहा है जो कि तेजी से आग पकड़ लेती हैं.

आम भाषा में देवदार की सूखी पत्तियों को पिरुल कहा जाता है. ये पत्तियां बहुत तेजी से आग पकड़ती हैं. कोई यात्री जलती हुई माचिस की तीली या सिगरेट का बट सड़क किनारे फेंक दे और ये इन पत्तियों के संपर्क में आ जाएं तो आग फैलने का खतरा पैदा हो जाता है.

मुख्य वन संरक्षक महाजन ने कहा, ‘हम गुजरे सालों में फैली भयंकर आग की घटनाओं को इस साल दोहराने नहीं देंगे और हम इसके लिए खास ऐहतियात बरत रहे हैं.’

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
गोल्डन गर्ल मनिका बत्रा और उनके कोच संदीप से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi