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फास्ट ट्रैक कोर्ट से भी ज्यादा तेजी से मामलों को निपटाती हैं ‘ग्रीन गैंग’ की अंगूरी

इस गैंग से जुड़ी महिलाएं समस्याओं के तुरंत यानी फटाफट निपटारे में यकीन रखती हैं और इन लोगों का भरोसा बिना किसी तरह के सवाल पूछे अपनी नेता के निर्देशों का पालन करने या समस्याओं को तत्काल निपटाने में है

Updated On: Aug 23, 2018 05:54 PM IST

Saurabh Sharma

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फास्ट ट्रैक कोर्ट से भी ज्यादा तेजी से मामलों को निपटाती हैं ‘ग्रीन गैंग’ की अंगूरी
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'जब अंगूरी की लाठी चलती है, तब किसी नेता का फोन और पुलिस का रौब काम नहीं आता है.’ यह बात कोई और नहीं बल्कि ग्रीन गैंग की संस्थापक अंगूरी दहदिया खुद अपने बारे में कहती हैं.

अंगूरी के गैंग से जुड़े सदस्यों को उनके अलग तरह के पहनावे और अलग अंदाज के जरिए आसानी से पहचाना जा सकता है- हरी साड़ी और हाथ में लाठी. 17 जुलाई 2018 को ग्रीन गैंग के तकरीबन 15 सदस्य कन्नौज जिला मुख्यालय से कुछ किलोमीटर की दूरी पर इकट्ठा हुए हुए. खबर मिली थी कि दहेज और अन्य मांगों के कारण एक नई शादीशुदा महिला को उसके सास-ससुर द्वारा ससुराल में प्रताड़ित किया जा रहा है. इसके बाद वे लोग उस जगह पर जमा हुए थे. यह ग्रुप भोलेश्वर मंदिर की तरफ बढ़ते हुए कुछ इस तरह का नारा लगा रहा था- 'ग्रीन गैंग जिंदाबाद, जो खुद को समझे गुंडा है, उसके लिए हमारे पास डंडा है.'

मामलों का फटाफट निपटारा कर देता है गैंग

इस गैंग से जुड़ी महिलाएं समस्याओं के तुरंत यानी फटाफट निपटारे में यकीन रखती हैं और इन लोगों का भरोसा बिना किसी तरह के सवाल पूछे अपनी नेता के निर्देशों का पालन करने या समस्याओं को तत्काल निपटाने में है. दहदिया उम्मीद भरे कदमों से गैंग के मार्च की अगुवाई करती नजर आती हैं और समय-समय पर गैंग के सदस्यों को फटकार भी लगाती हैं. इसके साथ ही, उनका आक्रामक अंदाज हमेशा कायम रहता है. अंगूरी दहदिया के चेहरे पर अक्सर गुस्सा बना रहता है और वह नहीं के बराबर मुस्कुराती हैं.

बहरहाल, कन्नौज इलाके के तिरवा चौराहे से तकरीबन दो किलोमीटर तक आगे बढ़ने के बाद अंगूरी की अगुवाई में यह गैंग पीड़िता के घर तक पहुंचता है. हालांकि, शुरू में गैंग के सदस्यों को पीड़ित महिला से मिलने की इजाजत नहीं दी जाती है, लेकिन दहदिया संबंधित महिला से मिलने की अपनी जिद पर अड़ी रहती हैं और आखिरकार नवविवाहिता के ससुराल वालों को गैंग की जिद के आगे झुकना पड़ता है.

जब ग्रीन गैंग से जुड़े सदस्यों की तरफ से पीड़ित महिला के चेहरे और शरीर पर दाग के बारे में पूछा जाता है, तो वह पहले अपने सास-ससुर और ससुराल परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा किसी भी तरह की प्रताड़ना से इनकार कर देती हैं. हालांकि, कुछ ही देर के बाद नवविवाहिता की आंखों से आंसू छलक उठते हैं. ऐसा देखकर दहदिया तुरंत हरकत में आ जाती हैं. अंगूरी ससुराल में प्रताड़ना झेल रही नवविवाहिता के पति पर नाराज होते हुए उसे थप्पड़ जड़ देती हैं. उसके बाद ग्रीन गैंग से जुड़े बाकी सदस्य भी अपनी नेता का अनुसरण करने लगती हैं. महिला रक्षकों के इस गैंग से अपमानित होने और मार खाने के बाद परिवार आखिरकार अपनी गलती स्वीकार करता है. साथ ही, इस परिवार के सदस्य पीड़ित नवविवाहिता को अपने बेटी की तरह मानने और कभी भी दहेज की मांग नहीं करने का वादा करते हैं. इस तरह से मामले का निपटारा कर दिया जाता है. ग्रीन गैंग कुछ इसी तरह से काम करता है.

जब अंगूरी का मकसद फूलन बनने का था

अंगूरी दहदिया ने साल 2010 में ग्रीन गैंग की स्थापना की थी. दरअसल, इससे पहले कन्नौज के कुछ रसूखदार लोगों ने उनके घर पर कब्जा कर उन्हें उनके घर से निकाल दिया था. उन्होंने बताया, 'हम पहले से गरीबी की वजह से मुश्किलें झेल रहे थे और इसी परिस्थिति में हमें अपने घर से निकाल दिया गया. हमारे पास प्रॉपर्टी का अपने नाम से रजिस्ट्रेशन कराने के लिए बिल्कुल भी पैसा नहीं था और यही हमारा एकमात्र गुनाह था. जिन लोगों ने हमें हमारे घर से बेदखल किया था, वे ताकतवर लोग हैं और अब भी यहीं रह रहे हैं. इन परिस्थितियों की वजह से मैंने तो पहले फूलन देवी बनने का फैसला किया.'

उन्होंने आगे बताया, 'मैं गुस्से में थी. मेरे पति मृत्यु शय्या पर थे और मेरे तीन बच्चे समेत मेरे तीन छोटे-छोटे बच्चे सड़क पर आ चुके थे. हमारे सर पर छत नहीं थी. उस मुश्किल भरी परिस्थिति में मैंने अपने परिवार के लिए भोजन का इंतजाम करने की खातिर पास के एक खेत से थोड़े से सरसों की चोरी की. इन तमाम परिस्थितियों के मद्देनजर मुझे लगा कि अगर मैं फूलन देवी बन जाती हूं, तो मेरे परिवार को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ेगा. इस बात को ध्यान में रखते हुए मैंने फूलन देवी बनने का आइडिया छोड़ दिया और इसकी बजाय ग्रीन गैंग शुरू करने का फैसला किया.'

दहदिया ने यह भी बताया कि तमाम मुश्किलों के बावजूद यह गैंग काफी तेजी से अलग-अलग इलाकों में आगे बढ़ रहा है. फिलहाल इस गैंग के 14,400 से भी ज्यादा सदस्य हैं. ग्रीन गैंग से जुड़े सदस्य उत्तर प्रदेश के 14 से भी ज्यादा जिलों में सक्रिय हैं. यह गैंग हर महीने औसतन करीब 4 से 5 मामलों को सुलझाता है.

गैंग में नई भर्ती के लिए ट्रेन से खूब यात्राएं करती हैं अंगूरी

दहदिया की मानें तो अपने गैंग में ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को भर्ती करने के लिए वह ट्रेन की यात्रा कर अनजान ठिकानों तक भी पहुंचने में संकोच नहीं करती हैं. वह कहती हैं, 'अजनबी लोगों से संवाद स्थापित करने के लिए ट्रेन सबसे अच्छी और उपुयक्त जगह होती है. लोग अक्सर मुझे पहचान लेते हैं और मैं उनसे अपने गांव की सबसे मुखर और अधिकारों को लेकर जागरूक रहने वाली महिलाओं से संपर्क स्थापित कराने का अनुरोध करती हूं. मैं उनसे इन मुखर महिलाओं से मिलवाने के लिए भी कहती हूं. उसके बाद मैं ऐसी महिलाओं से मुलाकात के लिए संबंधित जगहों पर जाती हूं और अपने गैंग के बारे में जानकारी मुहैया कराती हूं. जिन महिलाओं को हमारे इस अभियान में दिलचस्पी लगती है, वे हमारे गैंग का सदस्य बनती हैं. इसके अलावा, उनसे गैंग के लिए और सदस्य ढूंढने को भी कहा जाता है. हमारा गैंग सदस्यता ग्रहण करने या किसी तरह की समस्या को सुलझाने के लिए कभी भी पैसे की मांग नहीं करता है. हालांकि, हम चंदा या अन्य तरह की वित्तीय मदद स्वीकार करते हैं, क्योंकि हमें कुछ बिलों का भुगतान भी करना होता है.'

ग्रीन गैंग की संस्थापक अंगूरी दहदिया गैंग के सदस्यों को निर्देश देती हुईं

ग्रीन गैंग की संस्थापक अंगूरी दहदिया गैंग के सदस्यों को निर्देश देती हुईं

किसी सदस्य द्वारा गैंग की सदस्यता हासिल कर लेने के बाद उन्हें ग्रीन गैंग की बैठकों में हिस्सा लेने के लिए आने को कहा जाता है. साथ ही, जरूरी कामों में शामिल होने के बारे में बताया जाता है. इस तरह के कामों में मामलों को सुलझाने के लिए घटनास्थल पर पहुंचना या सर्वेक्षण किया जाना शामिल हैं. चूंकि दहदिया महिलाओं के सशक्तिरण में विश्वास रखती हैं, लिहाजा बाहर जाकर दिक्कतें सुलझाने के मामले में वह सिर्फ महिला सदस्यों को ही अपने साथ ले जाती हैं. अक्सर ऐसा देखा गया है कि जिन लोगों को गैंग की सेवाओं का लाभ हुआ है, वे इसका हिस्सा बन जाती/जाते हैं.

कई लोगों के लिए यह ‘गैंग लीडर’ फरिश्ता जैसी

मिसाल के तौर पर हम तिरवा की रहने वाली रश्मि यादव और उसके पति उमेश यादव के बारे में बात करते हैं. दहदिया ने रश्मि को अपने सास-ससुर की प्रताड़नाओं से मुक्ति दिलाने में मदद की थी. रश्मि के ससुराल वालों ने दहेज के लिए कथित तौर पर उन्हें मारा-पीटा था और 2016 में उन्हें घर से भी निकाल दिया था. इस सिलसिले में मदद मुहैया कराए जाने के बाद रश्मि और उनके पति उमेश यादव इस गैंग से जुड़ गए.

अपने मुश्किल भरे दिनों को याद करते हुए रश्मि कहती हैं, 'अंगूरी मेरे लिए माता-पिता से कम नहीं हैं. वह भगवान से कम नहीं हैं. मुझे याद है कि मेरे सास-ससुर ने मुझे फटे कपड़ों में घर से बाहर निकाल दिया था. पास-पड़ोस के तमाम लोग इस हालत में मुझे देख रहे थे. अंगूरी माई आईं और उन्होंने मुझे इस मुश्किल दौर से उबारने में हमारी मदद की.' रश्मि ने यह भी बताया कि वह और उनके पति, दोनों अन्य लोगों की की मदद करने के सिलसिले में ग्रुप की तमाम बैठकों में हिस्सा लेने से बिल्कुल भी परहेज नहीं करते हैं.

दहदिया कहती हैं, 'महिलाओं को एकजुट करना बिल्कुल भी आसान नहीं था. वे हमारे साथ अपनी समस्याओं को साझा करने या अपने घरों से बाहर निकलने से संकोच करती हैं.' उन्होंने आगे बताया, 'जब हम लोगों के घर जाते हैं और अलग-अलग परिवारों की महिलाओं को हमारे इस गैंग से जोड़ने का आग्रह करते हैं, तब वे कहते हैं कि बहनजी आपका ग्रीन गैंग आपको मुबारक हो.'

इसकी वजह महिला सशक्तिकरण के साथ आक्रामक निगरानी को मिलाने का इस ग्रुप का आइडिया हो सकता है, जो लोगों को असहज कर देता है. इस संवाददता से बात करते हुए अंगूरी ने एक ऐसे मामले के बारे में बताया, जहां उनके गैंग से जुड़े सदस्यों ने एक महिला की इसलिए पिटाई की, क्योंकि शादीशुदा होने के बावजूद उसके किसी अन्य विवाहित पुरुष से संबंध थे. उन्होंने इस घटना के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उनके मुताबिक, 'वह (जिस महिला की पिटाई की गई) वापस अपने ननिहाल आ गई थी और कई बार समझाने-बुझाने और अनुरोध किए जाने के बावजूद वह अपने पति के वापस नहीं जाने की जिद को लेकर अड़ी हुई थी. इस सिलसिले में हमारे गैंग से जुड़े सदस्यों की तरफ से की गई जांच में हमें पता चला कि उस महिला का दूसरे गांव के एक शादीशुदा शख्स से चक्कर चल रहा था.

महिला इस शादीशुदा शख्स के गांव जाकर उससे हर दूसरे दिन मुलाकात किया करती थी. हमने महिला को इस बात के लिए समझाने का भरपूर प्रयास किया कि पहले से ही शादीशुद दूसरे गांव का वह शख्स उसका (महिला) इस्तेमाल कर रहा है. हालांकि, वह अपनी जिद को लेकर पागल थी और उसने हमारी सलाह पर बिल्कुल भी गौर नहीं किया.'

अंगूरी के दावों के मुताबिक, 'चूंकि इस महिला की हरकत को लेकर परिवार में हर कोई परेशान था, इस वजह से हमने उसे सबक सिखाने का फैसला किया. मेरे तीन-चार थप्पड़ों और ग्रीन गैंग से जुड़े सदस्यों के कुछ मुक्कों के बाद आखिरकार वह सही रास्ते पर आ गई. वह महिला अब खुशी-खुशी अपने पति के साथ रह रही है और जल्द मां भी बनने वाली है. हाल में उस महिला ने मुझसे मुलाकात की थी. मुलाकात के दौरान उसने अपने पिछली गलतियों के लिए माफी भी मांगी.'

वह बताती हैं, 'जब हमें कोई केस मिलता है, तो मैं खुद से किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती. सबसे पहले मैं घटनास्थल पर एक टीम भेजकर उसकी जांच करवाती हूं. इसके अलावा दूसरी टीम को अंडरकवर (खुफिया) एजेंट की तरह काम करने के लिए उसी जगह पर भेजती हूं. जांच-पड़ताल की इन तमाम प्रक्रिया को अंजाम देने के बाद समस्या को सुलझाने के लिए गैंग हरकत में आता है. हालांकि, इन तमाम गतिविधियों के कारण मैं कई बार जेल जा चुकी हूं, लेकिन मुझे अब भी किसी तरह का डर नहीं है.'

अंगूरी दहदिया का कार्यालय

अंगूरी दहदिया का कार्यालय

अंगूरी ने बताया कि गैंग और उसकी महिलाओं के बारे में अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने पर उन्होंने एक बार एक सरकारी अधिकारी को थप्पड़ मार दिया था और उन्हें पेटीकोट, चूड़ी आदि पहनाकर उनका मेकअप कर दिया था. वह बेबाकी से कहती हैं, 'मैं महिलाओं के लिए इस लड़ाई को रोकने के मूड में बिल्कुल नहीं हूं.'

'गैंग के इलाके में महिलाओं पर होने वाले जुल्म के मामलों में कमी'

50 साल की अंगूरी बताती हैं, 'मेरे खिलाफ 6 एफआईआर दर्ज की गई थी, लेकिन आखिर में सभी आरोप खारिज हो गए. दरअसल, पुलिस वाले मेरे खिलाफ किसी तरह का कोई सबूत नहीं ढूंढ सके. मैं कभी भी गलत नहीं थी. हालांकि, यह जरूर था कि हम कई बार थोड़े से हिंसक हो जाते थे, लेकिन समाज की बेहतरी और पीड़ित लोगों के परिवार के लिए ऐसा किया गया. हम बिल्कुल भी डरे हुए नहीं हैं.'

इस गैंग पर पिछले कुछ साल से नजर रखने वाले यहां के स्थानीय पत्रकार पंकज श्रीवास्तव के मुताबिक, महिलाओं को सशक्तिकरण मुहैया कराने के मामले में दहदिया काफी अच्छा काम कर रही हैं. वह उस जगह पर या वैसी स्थिति में खड़ी होती हैं, जहां कोई अन्य शख्स खड़ा होने की हिम्मत नहीं दिखा पाता/पाती है. उन्होंने बताया, 'अंगूरी के साथ एकमात्र समस्या यह है कि वह शिकायतों को सुनने के दौरान या मामलों को सुलझाते वक्त मार-पिटाई पर उतर जाती हैं और इस वजह से उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ता है. वह एक अच्छी महिला हैं और हमेशा पीड़ितों के साथ न्याय करने की कोशिश करती हैं. हालांकि, अपने हिंसक यानी मारपीट संबंधी बर्ताव के कारण उन्हें कई बार गलत समझ लिया जाता है.'

कन्नौज के एसपी किरीट कुमार की भी अंगूरी दहदिया को लेकर कुछ इसी तरह की राय है. वह कहते हैं, 'समस्या तब पैदा होती है, जब वे लोग (अंगूरी और उनका गैंग) कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करते हैं. महिलाओं द्वारा लाठी उठाना महिला सशक्तिरण का संकेत माना जाता है, लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है. इस परिभाषा को बदलने की जरूरत है.' इसके अलावा, उनका यह भी कहना था कि ग्रीन गैंग से जुड़ी महिलाएं अच्छा काम कर रही हैं. कन्नौज के एसपी के मुताबिक, 'कई मौकों पर इस महिला और उसके गैंग ने पुलिस की भी मदद की है. जहां-जहां गैंग के सदस्यों की सक्रियता है, उन इलाकों में महिलाओं के खिलाफ जुल्म के मामलों में कमी देखने को मिल रही है. पुलिस के पास पहुंचने से पहले लोग ग्रीन गैंग की मदद से पारस्परिक सहमति के जरिये मामलों को सुलझाने की कोशिश करते हैं, जो एक तरह से अच्छा ही है.'

(लेखक लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार और 101Reporters.com के सदस्य हैं. यह पोर्टल जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का देशभर में फैला नेटवर्क है)

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