S M L

सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में दंगल, पिक्चर अभी बाकी है

अदालतों के अन्दर और बाहर हो रही घटनाओं से यह स्पष्ट है कि सरकार, विपक्ष, वकील और जजों का ही न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा नही है तो फिर जनता अदालती सिस्टम पर कैसे भरोसा करे ?

Virag Gupta Virag Gupta Updated On: May 02, 2018 08:43 PM IST

0
सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में दंगल, पिक्चर अभी बाकी है

उत्तराखण्ड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ के नाम को केन्द्र सरकार के पास दोबारा विचार हेतु भेजे जाने पर कॉलेजियम में सहमति नहीं हो पाई है. जनता के विश्वास की अदालत और अग्नि परीक्षा के इस दौर में क्या न्यायपालिका विफल हो जायेगी ? अदालतों में हो रहे तमाम गड़बड़झाले को आइये इस तरह से समझें-

जजों की नियुक्ति पर केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप

संविधान के अनुच्छेद - 124 और 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति होती है. आपातकाल तक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज और केन्द्र सरकार परस्पर समन्वय से जजों की नियुक्ति का फैसला करते थे. इन्दिरा गांधी के शासन के दौर में राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर जजों की नियुक्ति होने लगी. राजीव गांधी के बाद गठबन्धन सरकार के दौर में 1993 के निर्णय के माध्यम से न्यायपालिका ने जजों की नियुक्ति पर एकाधिकार हासिल कर लिया.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनजेएसी कानून निरस्त

जजों की नियुक्ति प्रणाली में सुधार के लिए संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कानून को सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने सन 2015 में निरस्त कर दिया था. इस कानून में जजों की नियुक्ति के लिए 6 सदस्यीय आयोग के गठन का प्रावधान था जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 3 वरिष्ठ जजों के साथ 2 विधि विशेषज्ञ और केन्द्रीय कानून मंत्री शामिल होने थे. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अदालतों में सरकारी मुकदमों की संख्या बहुत ज्यादा है, इसलिए कानून मंत्री को आयोग का सदस्य बनाने से न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का हनन हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी कानून को संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध बताते हुए तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया और उसके बाद से ही अदालतों में राजनीतिक दंगल शुरू हो गया.

ये भी पढ़ें : जस्टिस जोसेफ के मामले में क्यों आधारहीन हैं सरकारी तर्क

एमओपी पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट में खींचतान

एनजेएसी कानून निरस्त होने के बाद 1993 से जारी कॉलेजियम व्यवस्था फिर बहाल हो गई, जिसके तहत 5 वरिष्ठ जज नियुक्तियों की अनुशंसा करते हैं. जजों की नियुक्ति के लिए केन्द्रीय कानून मंत्रालय ने एक प्रक्रिया का निर्धारण किया है जिसे मेमोरेण्डम ऑफ प्रोसीजर या एमओपी कहा जाता है. संविधान पीठ ने कॉलेजियम व्यवस्था की विकृतियों पर गम्भीर टिप्पणी की परन्तु एनजेएसी मामले में पूरी सुनवाई के बावजूद एमओपी में बदलाव का मामला कभी नहीं उठा.

govinda

केएन गोविन्दाचार्य ने मामले में अर्जी दायर करके एमओपी में बदलाव के साथ जजों को शपथ-पत्र देने की बात की जिसके लिए संविधान की अनुसूची-3 में प्रावधान है, परन्तु उस पर कोई कारवाई नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने मार्च 2017 में एमओपी में बदलाव के लिए अपनी सिफारिशें भेंजी जिसका सरकार ने अगस्त 2017 में जवाब दिया परन्तु कोलेजियम के सदस्य जस्टिस चेलमेश्वर इससे असहमत हैं. सरकार के अनुसार एमओपी में यह लिखा है कि किसी भी नाम को कॉलेजियम के पास पुर्नविचार के लिए भेजा जा सकता है, इसलिए जोसेफ के नाम पर केन्द्र सरकार की आपत्ति से नियमों का उल्लघंन नहीं हुआ है.

जजों की नियुक्ति पर कॉलेजियम का एकाधिकार

नई व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट के 5 वरिष्ठ जजों के कोलेजियम की द्वारा की गई अनुशंसा के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा जजों की नियुक्ति की जाती है. हाईकोर्ट में तीन वरिष्ठ जजों की समिति प्रस्तावित नामों को सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम के पास भेजती है. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम द्वारा भेजे गये नामों पर केन्द्रीय विधि और न्याय मंत्रालय द्वारा आंकलन के साथ इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा भी प्रत्याशियों की जांच की जाती है. जांच के बाद सरकार को यदि किसी नाम पर आपत्ति होती है तो उसे कॉलेजियम के पास पुर्नविचार के लिए भेजा जा सकता है. कॉलेजियम यदि किसी नाम पर आपत्ति के बावजूद उसे दोबारा अग्रसारित करे तो सरकार को नियुक्ति करनी ही पड़ती है. जस्टिस जोसेफ के मामले में कॉलेजियम भविष्य में जब भी उनके नाम की अनुशंसा दोबारा भेजे तो क्या सरकार उन्हें नियुक्त करेगी?

जजों की नियुक्ति पर विलम्ब

देशभर में हाईकोर्ट जजों के 1079 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 410 पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं. देश में 2.5 करोड़ से ज्यादा मुकदम लम्बित हैं. पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर तो जजों की नियुक्ति के मामले में इतना आहत हो गये कि सार्वजनिक तौर पर रो पड़े थे जिसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने परस्पर विमर्श से मसले को सुलझाने का आश्वासन दिया था.

मास्टर ऑफ रोस्टर का विवाद और सुप्रीम कोर्ट में राजनीतिक दंगल

जजों की नियुक्तियों पर विवाद से अदालतें अब राजनीतिक लड़ाई का नया मैदान बनने लगी हैं. सुप्रीम कोर्ट में कॉलेजियम के 4 वरिष्ठ सदस्यों ने चीफ जस्टिस के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कर डाली. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर हैं जिन्हें मुकदमों के आवंटन करने का अधिकार है.

shanti-bhushan

पूर्व कानून मंत्री शान्ति भूषण ने मांग की है कि कॉलेजियम के 5 जज मिलकर रोस्टर निर्धारित करें जिस पर फैसला आना बाकी है. मेडिकल कॉलेज केस में न्यायिक भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज से न्यायिक काम वापस ले लिया गया पर उन्हें महाभियोग के तहत नहीं हटाया गया. दूसरी ओर कांग्रेस और विपक्ष के सांसदों द्वारा चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग की नोटिस को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने निरस्त कर दिया.

महाभियोग और अपने से सम्बन्धित अन्य मामलों पर मुद्दों का आवंटन चीफ जस्टिस कैसे कर सकते हैं, इस पर विधि विशेषज्ञों में गम्भीर मतभेद हैं. दीपक मिश्रा के अक्टूबर 2018 में रिटायर होने के बाद उनके बाद क्या जस्टिस रंजन गगोई को चीफ जस्टिस बनाया जायेगा, इस पर भी अब सवालिया निशान खड़े किये जा रहे हैं ? अदालतों के अन्दर और बाहर हो रही घटनाओं से यह स्पष्ट है कि सरकार, विपक्ष, वकील और जजों का ही न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा नही है तो फिर जनता अदालती सिस्टम पर कैसे भरोसा करे ?

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Social Media Star में इस बार Rajkumar Rao और Bhuvan Bam

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi